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कोहबर से आगे : भोजपुरी दृश्य-संस्कृति

*वंदना श्रीवास्तव द्वारा सृजित विभिन्न अवसरों के भोजपुरी चित्र*

RKTV NEWS/वंदना श्रीवास्तव,17 जनवरी।भोजपुरी लोकचित्रकला और भित्ति कला का संसार कोहबर तक सीमित नहीं है। कोहबर भले ही सबसे अधिक चर्चित और प्रतीकात्मक हो लेकिन उसके इर्द-गिर्द और उससे परे एक पूरा दृश्य-संस्कृतिक ब्रह्मांड फैला हुआ है, जो ग्रामीण जीवन, विश्वास, श्रम, स्त्री-अनुभव और सामुदायिक स्मृति से रचा गया है। भोजपुर अंचल की भित्तियाँ केवल दीवारों पर उकेरी गई आकृतियाँ नहीं हैं, वे गाँव की सामूहिक चेतना की दृश्य भाषा हैं।

कोहबर मुख्यतः विवाह से जुड़ा चित्रकर्म है, जिसमें सृष्टि, उर्वरता, वंश-वृद्धि और दाम्पत्य की कामना निहित रहती है। इसके बाहर भी भोजपुरी लोकचित्रकला के कई रूप हैं, जिनका संबंध जीवन के अन्य अवसरों, त्योहारों, देवी-देवताओं और सामाजिक अनुभवों से है। उदाहरण के लिए चौक पूरना ( अरिपन या अल्पना परंपरा) , जो घर के आँगन, चौखट और पूजा-स्थलों पर बनाई जाती है। भोजपुरी समाजों में इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है लेकिन इसका स्वरूप समान है—चावल के घोल या मिट्टी से बनी रेखाएँ, जिनमें वृत्त, त्रिकोण, कमल, पाँव के चिह्न और ज्यामितीय आकृतियाँ होती हैं। यह कला स्त्रियों द्वारा रची जाती है और उसमें शुद्धता, आमंत्रण और मंगल की भावना होती है।
इसी तरह संझा या संझौती से जुड़ी भित्ति-चित्रकला भी भोजपुरी क्षेत्र में प्रचलित रही है। क्वार मास में किशोरियाँ दीवारों पर प्रतिदिन नई आकृतियाँ बनाती हैं—पेड़, पक्षी, सूर्य, चंद्र, देवी-रूप। यह कला केवल धार्मिक नहीं बल्कि स्त्री-सामूहिकता, अनुशासन और सौंदर्य-बोध का अभ्यास भी है। दीवार यहाँ कैनवास नहीं, संवाद का स्थल बन जाती है।
सोहर चित्रकला का एक और महत्त्वपूर्ण रूप है जो बच्चे के जन्म से जुड़ी है। जिस घर में संतान जन्म लेती है, वहाँ दीवारों पर गाय, बछड़ा, पालना, सूर्य, चंद्र और कभी-कभी लोक-देवताओं के चित्र बनाए जाते हैं। ये चित्र मातृत्व, संरक्षण और जीवन-चक्र के आरंभ का दृश्य उत्सव होते हैं। यहाँ रंग सीमित होते हैं—पीला, लाल, काला—लेकिन भाव गहरे होते हैं।
गोधन कुटाई और गोवर्धन पूजा से जुड़ी भित्ति सज्जा भोजपुरी लोककला का हिस्सा है। इसमें गोबर, मिट्टी और रंगों से गाय, बैल, खेत, हल और अनाज के प्रतीक बनाए जाते हैं। यह कला सीधे कृषि-जीवन से जुड़ी है और श्रम की पवित्रता को दृश्य रूप देती है। यहाँ कला और श्रम अलग नहीं, एक-दूसरे में घुले होते हैं।
देवी-देवताओं से संबंधित भित्ति कला भी भोजपुरी अंचल में व्यापक रही है। माँ दुर्गा, काली, शीतला, भगवती और लोकदेवता जैसे भैरव या ब्रह्म बाबा—इनके चित्र घरों की बाहरी दीवारों, चौराहों और पीपल के पेड़ों के पास मिलते हैं। ये चित्र औपचारिक मूर्तिकला जैसे नहीं होते बल्कि सरल, कभी-कभी असंतुलित रेखाओं में बने होते हैं। इन्हीं असंतुलनों में लोक की आस्था और भय दोनों बसे रहते हैं।
एक विशेष उल्लेख व्रत-कथा चित्रण का भी किया जाना चाहिए। करवा चौथ, छठ, तीज जैसे व्रतों के समय दीवारों पर सूर्य, छठी मइया, घाट, नदी और प्रसाद की आकृतियाँ उकेरी जाती हैं। छठ पर्व से जुड़ी भित्ति कला भोजपुरी लोकचित्रकला की सबसे सशक्त परंपराओं में है। इसमें सूर्य केवल खगोलीय पिंड नहीं, जीवनदाता के रूप में उपस्थित होता है। नदी की लहरें, डूबता और उगता सूर्य—ये सब अत्यंत सरल रेखाओं में, लेकिन गहन भाव के साथ चित्रित होते हैं।
भोजपुरी भित्तिकला का एक और पक्ष है : लोक-कथात्मक चित्रण। रामायण, कृष्ण-कथा या स्थानीय लोककथाओं के दृश्य—जैसे राम-सीता का वनवास, कृष्ण की बाल-लीलाएँ—गाँव की दीवारों पर मिल जाते हैं। ये चित्र किसी शास्त्रीय परंपरा का अनुसरण नहीं करते, बल्कि लोक-स्मृति के अनुसार रूप ग्रहण करते हैं। पात्र कभी अनुपात में नहीं होते, लेकिन भाव स्पष्ट होते हैं।
इन सभी रूपों में एक बात समान है—इन कलाओं का रचयिता प्रायः स्त्री है। भोजपुरी लोकचित्रकला स्त्री की दृश्य अभिव्यक्ति का सबसे सहज माध्यम रही है। जिन स्त्रियों के पास लिखित भाषा नहीं थी, उन्होंने दीवारों पर अपनी इच्छाएँ, डर, कामनाएँ और विश्वास दर्ज किए। इसलिए यह कला केवल सजावट नहीं, एक प्रकार का मौन लेखन है। समकाल में यह परंपरा तेजी से सिमट रही है। पक्के मकान, पेंट, बाज़ारू डिज़ाइन और बदलती जीवन-शैली ने इन भित्तियों के लिए जगह कम कर दी है।
कोहबर अब भी किसी हद तक जीवित है लेकिन चौक पूरना (अरिपन) , सोहर, संझा और अन्य रूप धीरे-धीरे स्मृति में बदलते जा रहे हैं। इसके बावजूद, ये कलाएँ आज भी भोजपुरी समाजों की सांस्कृतिक पहचान की गहरी परतों में धड़कती हैं।
भोजपुरी लोकचित्रकला और भित्तिकला दरअसल देखने की नहीं, समझने की परंपरा है। यह कला यह बताती है कि सौंदर्य केवल संग्रहालयों में नहीं, मिट्टी लगी दीवारों पर भी होता है। कोहबर उसके केंद्र में अवश्य है लेकिन उसके चारों ओर जीवन के अनेक रंग, रेखाएँ और कथाएँ फैली हुई हैं—जो मिलकर भोजपुरी लोक-संस्कृति की संपूर्ण दृश्य भाषा रचती है।

वंदना श्रीवास्तव
(लेखिका :ख्यात भोजपुरी चित्रकार,भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की वरिष्ठ फेलो एवं साहित्य कला परिषद दिल्ली सरकार की पूर्व सदस्य है)

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