वाराणसी/उत्तर प्रदेश(रोशनी) 10 जून।कबीरदास के 625 वीं जयंती पर हिंदी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान एवं भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद के संयुक्त तत्वावधान में, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के मालवीय मूल्य अनुशीलन केंद्र में आयोजित तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का दिनांक 9/6/2023 को पहला दिन था। इस अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का विषय है : ” संत कविता में मानव धर्म: कबीर से कीनाराम तक। ” इस संगोष्ठी के संरक्षक काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो सुधीर कुमार जैन हैं। संगोष्ठी के परामर्श मंडल के सदस्यों में प्रो श्री किशोर मिश्र , प्रमुख कला संकाय , काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, प्रो अरुण कुमार सिंह , कुलसचिव, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, प्रो अभय कुमार ठाकुर, वित्त अधिकारी , काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान की प्रो अमिता दुबे सम्मिलित हैं।
स्वागत समिति के सदस्यों में प्रो चंपा सिंह , प्रो मनोज सिंह , प्रो नीरज खरे और डॉ . उर्वशी गहलौत शामिल हैं।
इस अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के संयोजक काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो सदानंद साही और सह संयोजक प्रो श्रद्धा सिंह एवं प्रो प्रभाकर सिंह हैं।
इस आयोजन के सचिव डॉ विवेक सिंह और कोषाध्यक्ष डॉ अशोक कुमार ज्योति हैं ।
कार्यकारिणी समिति के सदस्यों में डॉ प्रभात कुमार मिश्र, डॉ विंध्याचल यादव , डॉ प्रियंका सोनकर , डॉ सत्यप्रकाश पाल, डॉ हरीश कुमार , डॉ रविशंकर सोनकर और डॉ सत्यप्रकाश सिंह शामिल हैं।
इस तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में पहले दिन का कार्यक्रम आज दिनांक 9/6/2023 को चार सत्रों में पूर्ण हुआ। मुख्य वक्ता एवं अन्य वक्ताओं ने सर्वप्रथम मालवीय जी के मूर्ति के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित करके माल्यार्पण किया। संगीत कला संकाय की संगीत की छात्राओं ने विश्वविद्यालय का कुलगीत “मधुर मनोहर अतीत सुंदर ” का सुंदर लयबद्ध प्रस्तुतीकरण किया। संचालन कर रहे डॉ विवेक सिंह ने कहा कि यह कार्यक्रम अब तक के आयोजित कार्यक्रमों में परंपरा से थोड़ा हटकर होगा क्योंकि इसमें विश्वविद्यालय के सारे फैकल्टी मेंबर विद्यमान है। विदेश से आए विशिष्ट वक्तागण भी मौजूद है। संगीत मंच कला संकाय की डॉ संगीता पंडित , डॉ पंकज ने अपने छात्राओं सहित कबीर के दो भजनों ” मन लागो मेरो यार फकीरी में , कहां फिरत मगरूरी में ” और विदुषी अश्विनी द्वारा रचित सांस सांस में नाम लिखा है वृथा सांस मत जाय,सांसों की कर लूं माला , अजप जाप जपों भाई साधु । का तल्लीनता से स्वरबद्ध एवं लयबद्ध प्रस्तुतीकरण किया। भजन सुनकर वहां उपस्थित श्रोतागण भाव विभोर हो गए । पदों का गायन किसी भी संगोष्ठी के महत्व को बढ़ा देता है। मंचस्थ अतिथिगणों को उत्तरीय और स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया गया।
स्वागत वक्तव्य देते हुए प्रो श्रद्धा सिंह ने कहा कि संत कविता का जन्म सामाजिक एवं दार्शनिक पृष्ठभूमि में हुआ । इनका स्वर विद्रोही है और प्रवृत्ति खंडनात्मक है। समाज में व्याप्त रूढ़ियों पर इन्होंने व्यंग्य किया। इसके अतिरिक्त इनके रचनात्मक पहलू भी है । इन्होंने खंडन के लिए खंडन नही किया अपितु मनुष्य के बीच विद्यमान विभेद के दीवारों को तोड़ने के लिए खंडन को अपनाया है। मानव मूल्य की प्रतिस्थापना इनका रचनात्मक पहलू है। इस संगोष्ठी से सामाजिक और अकादमिक दोनों जगत लाभान्वित होंगे। इससे अकादमिक समृद्ध होगा तो समाज में नैतिक मूल्य की सुगबुगाहट पुनः प्रारंभ होगी।
हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो सदानंद साही ने अपने बीज वक्तव्य में कहा कि भक्तिकालीन संत साहित्य इसी जीवन का साहित्य है केवल परलोक का ही साहित्य नहीं है। कबीर का पद इस बात को सिद्ध करता है ;
मुए पीछे मत मिलो कहे कबीर राम ,
जब लोहा माटी मिल गया पारस कउनो काम।
राम मिलना है तो इसी जन्म में मिलो। संतों की संगति ही बैकुंठ है। संतों की कविता मनुष्य की श्रेष्ठता का आख्यान करती हैं। मनुष्यता के संभव होने में हाथों की विशेष भूमिका है । हाथों से हम श्रम करते हैं। श्रम की प्रतिष्ठा हमारे संतों की कविता शुरू से अंत तक श्रम की प्रतिष्ठा करने वाली कविता है जो मनुष्य को मनुष्य बनाने का उद्योग है। प्रकृति के साथ धरती के साथ मनुष्यता को प्रतिस्थापित करने का एक विवेक संत कवि हमें देते हैं ।
उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रो अवधेश प्रधान ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में बताया कि रिलीजन ऑफ मैन पर रवींद्रनाथ टैगोर ने व्याख्यान दिया था इसके पीछे का साहित्यिक आधार था संतों और बाऊलों का साहित्य । सनातन धर्म नहीं मानव धर्म । मानव धर्म केवल पूर्व नहीं, पश्चिम नहीं, अतीत नहीं पूरे आगे के मानव जाति को ,समाज को भीतर और बाहर से संभाल कर रखता है। स्वामी विवेकानंद कहते हैं , ” I want man making religin and man making education .” मानव संसाधन है इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है । मनुष्य संसाधन नहीं है वह अपने चैतन्य से मनुष्य है । विज्ञान , अध्यात्म और संस्कृति को मिलाकर जो एक त्रिभुज बनता है इस त्रिभुज से ही मानव का स्वस्थ विकास हो सकता है। भक्ति आंदोलन शून्य से नहीं आता अपनी परंपरा से आता है । वहां से रस खींचता है । मनुष्य को ऊर्ध्वमुखी बनाने का कार्य हमारा भक्तिकालीन संत साहित्य करता है। मानव धर्म जिन तत्वों से बनता है वह है प्रेम और करुणा। मनुष्य केवल मनोदैहिक क्षेत्र में ही नहीं रहता है मनोसांस्कृतिक क्षेत्र में भी रहता है और इन क्षेत्रों से पार जाने की क्षमता भी रखता है।
उद्घाटन सत्र के मुख्य वक्ता प्रो गोपेश्वर सिंह ने बताया कि कीनाराम ग्रंथ विश्वविद्यालय प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है।इसमें बताया गया है कि आखिरी अघोर पंथ क्या है । यह पंथ समाज के सड़ी गली रीतियों के बीच से स्वस्थ रास्ता बनाने का उपक्रम है । रामानंद ने कहा था ,” जाति पांती पूछे नहीं कोई हरी को भजे सो हरी का होई “। आगे कहा गया भक्ति पंचम मार्ग है , पंचम वर्ण है जिसमें यह संकल्प है कि भेदपूर्ण समाज में अभेद की खोज का प्रयत्न भक्ति आंदोलन करता है। इसमें चार वर्ण न होकर एक ही वर्ण होगा। ए के रामानुजन ने कहा था कि भक्ति आंदोलन का चरित्र सिंगुलर नहीं प्लूरल है । इसका चरित्र बहुवचनात्मक है । भक्ति काव्य का कोई एक पाठ नही हो सकता है यह इतना वैविध्यपूर्ण है जो एक सम्पूर्ण भारत बनाता है। एक सम्पूर्ण जीवन बनाता है। संभुनाथ ने अपनी पुस्तक में भक्ति आंदोलन को भारतीय उदार मन का सतरंगा इंद्रधनुष कहा है। एवरी नंदन हिल कहते है कि कबीर की कविता में उद्योग और अध्यात्म का मेल है । भक्ति आंदोलन के सामाजिक पक्ष को इतना खींच दिया जाता है कि उसकी आध्यात्मिकता प्रभावित हो जाती है। कबीर झीनी झीनी बीनी रे चदरिया में उद्योग और अध्यात्म का मेल करते दिखाई देते हैं। कबीर से प्रभावित होकर गांधी ने चरखे का संगीत नामक लेख लिखा । कबीर का अध्यात्म श्रमशील अध्यात्म है ।हजारी प्रसाद द्विवेदी की मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य पंक्ति सबसे अधिक संत कवियों की कविता में लागू होती है।
इस उद्घाटन सत्र के विशिष्ट अतिथि गणों में से प्रो सच्चिदानंद मिश्र ने कहा कि जब हम संत साहित्य का अध्ययन करते हैं तो पाते हैं कि संत कवियों ने भारतीय परंपरा को हिला देने का कार्य किया । यह बीज हमें कबीर की कविता में प्रखर रूप में मिलता है। योगी पत्थर से बने देवों को नहीं पूजते हैं। मनन करने वाले का देवता उसके हृदय में विद्यमान है। भारतीय परंपरा कोई एक रेखीय परंपरा नहीं है । भारतीय परंपरा अनेक रेखीय परंपरा है। मनुष्यता के लिए आचरण का विश्लेषण करना आवश्यक है । भक्तिकालीन संत कविता आचरण के विश्लेषण की कविता है। संतों की कविता भारतीय परंपरा में एक ऐसा आदर्श है जो भेद को मिटाकर समानता की स्थापना करता है । भारतीय परंपरा तर्क को ऋषि की संज्ञा से अभिहित करती है और यह तर्क संत कविता में गहरे विद्यमान है।
प्रो रंजन कुमार सिंह ने कहा कि कबीर को पढ़ना यानि जीवन को पढ़ना है ।
भारतीय परंपरा में मोक्ष के तीन मार्ग बतलाए गए हैं ,ज्ञानमार्ग, भक्तिमार्ग एवं कर्ममार्ग । भक्तिमार्ग पर चलते हुए कबीर परमत्यागी हुए। ” पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ पंडित भया न कोय ।” संतों को ज्ञात था कि ज्ञान पाने के पश्चात और कुछ पाने की आवश्यकता नहीं होगी। मनुष्य की अनुभूति को पूर्णता की अनुभूति में परिणत करने का कार्य संतों की कविता करती है। कबीर पूरे ब्रह्मांड को एक इकाई के रूप में देखने के साथ साथ पूरे समाज को भी एक इकाई में देखते हैं । ” मोको कहां ढूंढे बंदे मैं तो तेरे पास में। ना मैं मस्जिद ना मैं देवल ना काबे कैलाश में ।”
प्रो अनीता दुबे ने बताया कि 5 दिसंबर 1976 को उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान की स्थापना इस उद्देश्य से की गई थी कि यह साहित्य के साहित्यकारों को , साहित्य को सम्मानित करके उसे पुनर्बलन प्रदान करना है ताकि वह सदैव सक्रिय रहे। आगामी 25 जुलाई को परशुराम चतुर्वेदी के जयंती पर लखनऊ उत्तर प्रदेश में एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया जाएगा।
इस सत्र के संचालनकर्ता डॉ विवेक सिंह थे।
इस संगोष्ठी के दूसरे चरण में विशेष सत्र का आयोजन अपराह्न 12 से 1 तक हुआ । इस विशेष सत्र का विषय था :
‘ सुंदर का स्वप्न ‘। इसके तहत स्वागत वक्तव्य देते हुए प्रो प्रभाकर सिंह ने कहा कि संत साहित्य में मानवता पर बातचीत करते हुए सहज जीवन की प्राप्ति की बात करते है । सहज की प्राप्ति करना आज के दौर में कठिन है । संत साहित्य हमे सहजता को प्राप्त करने का मार्ग बताता है।
” सहज सहज सब कोई कहे , सहज न होय कोय।
तत्पश्चात डॉ दलपति सिंह राजपुरोहित यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास अमेरिका , डॉ योगेश प्रताप शेखर दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय , एवं सरिता माली जिन्होंने अनवरत कठिन साधना के पश्चात अमेरिका के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में हिन्दी साहित्य में शोधरत हैं ; इन्हें हाल ही में सुमन राजे के साहित्य पर इन्हें डॉक्टरेट की उपाधि मिली है। इनके बीच बातचीत हुई। इस विशेष सत्र के संचालनकर्ता डॉ प्रभात कुमार मिश्र थे। डॉ योगेश प्रताप ने मध्यकालीन साहित्य की ओझल परतों की खोज शीर्षक से सुंदर के स्वप्न पुस्तक पर एक लेख लिखा है। यहां लेखक और समीक्षक आज दोनों आमने सामने हैं । डॉ योगेश्वर कहते हैं कि संतों की भूमिका है परीक्षा करना । इस किताब को आप पढ़ेंगे तो पाएंगे हिंदी साहित्य के मध्यकाल के साहित्य का पूरा आभास आपको मिलेगा। पहला अध्याय प्रारंभिक आधुनिकता से संबंधित है। पूरी दुनिया में यूरोप के आधुनिकता से इतर देशज आधुनिकता क्या है इस विषय में यह पुस्तक हमें बताता है। यूरोपीय आधुनिकता के मूल्यों से इतर भारतीय आधुनिकता के वो कौन से मूल्य है जो यूरोप की आधुनिकता से अलग है ? इसमें लेखक ने एक शीर्षक संत होने की पुनः परिभाषा में बताता है कि असली संत वह है जो वर्ण आश्रम व्यवस्था मानता है ।ये कैसे संभव है ? इस तरह इस सत्र में कई सारे सवाल जवाब का क्रम चलता रहा । इस पुस्तक में दलपत ने यह भी बताया है कि प्रेस और प्रिंट के आने के बाद हमारे भक्तिकालीन कविता की संवेदना कैसे प्रभावित हुई । पहले कविता सुनी जाती थी अब कविता पढ़ी जाती है। कबीर आदि संत कवि कामिनी स्त्री की निंदा करते हैं लेकिन जब राम को पाना होता है तो उसी की भूमिका में उपस्थित होते हैं ।ऐसे अंतर्विरोध के क्या कारण रहे हैं ? दलपत जी ने सवालों का मुक्कमल जवाब दिया। आधुनिकता को हम ब्रिटिश के आने से जोड़ देते हैं। मध्यकाल नाम को ध्यान में रखकर हम जड़ता का काल समझ लेते हैं। प्रारंभिक आधुनिकता को काल से जोड़ कर देखना चाहिए।
1500 के आस पास सामुद्रिक मार्ग की खोज , वैश्विक स्तर पर शक्तिशाली साम्राज्यों की स्थापना , नई तकनीकी का विकास , अमरी फसलों का दुनिया भर में प्रसार , भूमि पर नई कल्टीवेशन की प्रक्रिया शुरू हुई। प्रारंभिक आधुनिकता इनके अनुसार सबसे पहले एक काल है।वेबर कहते हैं कि आधुनिकता एक दिन मनुष्य के विरुद्ध खड़ी होती है। यहां की प्रारंभिक आधुनिकता बहुधार्मिक थी यूरोप की तुलना में । यहां की आरंभिक आधुनिकता बहुभाषी थी , मल्टी लिंगुअल थी , मल्टी डायरैक्शनल थी।
सुंदर ने वर्णाश्रम की वैसी खिलाफत नहीं की जैसा कबीर ने किया था । सुंदरदास वर्णाश्रम व्यवस्था को तुलसीदास की तरह मानते है। गोपेश्वर सिंह ने कहा कि भक्ति कविता का लिंग परिवर्तित हो जाता है । पुरुष कब स्त्री की भूमिका में आ जाता है पता नहीं चलता । माया , सती और विरहिणी नारी के तीन रूप मिलते हैं।
सरिता माली जी ने कहा कि हिंदी साहित्य में स्त्री रचनाकारों को लेकर जो पसरा हुआ सन्नाटा नजर आता है वो सन्नाटा आज भी पसरा हुआ है। अनामिका लिखती हैं न कि अनदेखा कर देने के अपने आनंद हैं । गार्सा द तासी से लेकर आचार्य रामचंद्र शुक्ल , रामविलास शर्मा से लेकर सुंदर के स्वप्न तक में स्त्रियों के विषय में जो बात लिखी गई है वो मात्र खानापूर्ति है । जनाबाई क्यों आजीवन नामदेव की दासी ही बनकर रह जाती है ? सुमन राजे अपने साहित्येतिहास में स्मृत साहित्य इतिहास पर जोर देती हैं। हिन्दी साहित्य का इतिहास स्मृत इतिहास बनाम शिक्षित जनता के चित्तवृत्तियों के इतिहास के द्वंद्व के रूप में उभरता है। मध्यकाल में हम स्त्रियों के परिप्रेक्ष्य में जाति और लिंग को कैसे देखते हैं ? यह भी एक सवाल है। इस सत्र के संचालन कर्ता प्रभात कुमार मिश्र ने कहा कि दरअसल ये समस्याएं भक्तिकाल के उदय और अवसान से संबंधित है। दलपत जी उत्तर देते हुए कहा कि कोई किताब पूर्णतः अपने आप में पूर्ण नहीं होती यह उसकी सीमा है।
इस संगोष्ठी के अकादमिक सत्र एक का आयोजन अपराह्न 1 बजे से 2:30 बजे तक चला। इस सत्र का विषय था : ‘भारतीय चिंताधारा और भक्तिभावना। ‘
इस सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रो माधव हाड़ा ने कहा कि इस नगर में भारतीय मनीषियों का बुनियादी हिस्सा रहा है।
भक्ति आंदोलन पार्थिव चिंताओं का , पार्थिव इच्छाओं का , पार्थिव कामनाओं का साहित्य है। भक्ति साहित्य को सांस्कृतिक पारीस्थितिक में समझने की कोशिश करनी चाहिए। हमारे सारे संत भक्त कवियों की पहचान उपनिवेश काल में बनी।पहचान बनाने वालों में कुछ पादरी थे और कुछ प्रशासक भी थे । उत्तर उपनिवेश काल में आपको बाइनरी में जाकर सोचना ही पड़ेगा। सारे पश्चिमी साहित्य का कला रूप चर्च के अनुशासन में है। सबसे बड़ी दुर्घटना यह हुई कि उन्होंने धर्म को रिलीजन में बांध दिया। विश्व के किसी भी सभ्यता या संस्कृति में धर्म जैसा व्यापक शब्द नहीं है। संस्कृति धर्म का एक हिस्सा है।मीरा पर इन्होंने पुस्तक लिखी तब मीरा के लिए’ संत भक्त ‘ विशेषण का प्रयोग किया। मीरा पर इनकी पुस्तक है : पंचरंग चोला पहन सखी री। अपार्थिव पार्थिव का एक्सटेंशन है। ईश्वर गुरु का एक्सटेंशन है। सहजोबाई कहती हैं राम तजो पर गुरु न तजो। भक्तिकाल का मरम हमारे लोक स्मृति में है। ईश्वर के आने पर सहजो ने कहा कि मैं आपको कहां बिठाऊं मेरे अंतर में तो मेरे गुरु निवास करते हैं। आप दान हैं और मेरे गुरु दाता हैं वो आपको आसानी से मेरी झोली में डाल देंगे फिर भी आप स्थान चाहते हैं तो जब मेरे गुरु आएं तो पंखा झलिएगा। मनुष्य की महिमा का इतना बड़ा आख्यान कहां मिलेगा।
काशी विद्यापीठ के प्रो निरंजन सहाय ने एक कहानी सुनाई कि एक अंधी मां का अंधा बेटा नंदू को कोड़े मारकर इसलिए मौत के घाट उतार दिया गया क्योंकि वो कबीर का पद गा रहा था । सेना , पीपा और कबीर दौड़े दौड़े आते हैं फिर कहते हैं कि क्या इन पदों को गाना बंद कर दिया जाए। निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि नहीं कार्य के दरम्यान प्रभाती का प्रारंभ करते हैं । ” हमन है इश्क मस्ताना , हमन
को होशियारी क्या ” सत्ता के लोग नीरू और नीमा के घर में आग लगवा देते हैं। लोई से कबीर की शादी करा दी जाती है ताकि घूमना बंद करें । कबीर ने पूछा लोई से की तुमने मुझे कभी देखा था , लोई ने कहा हां देखा था , तुम तो साधु थे , तुम्हें गंगा में फेंक दिया गया था जब तुम्हारा शरीर गंगा घाट लगा तो मेरे पिता ने तुम्हें बचाया था । मुझे संतों से भय लगता है। मेरा मन तो साहूकार के बेटे से लगा था लेकिन मेरे मां बाप ने मेरी शादी तुमसे कर दी। कबीर ने लोई को मुक्त कर दिया लेकिन लोई लौट आई और कहा कि तुम इतने अच्छे हो कौन छोड़ना चाहेगा । कबीर के काव्य के पीछे ये सब पृष्ठभूमि भी काम कर रहे थे। ये सब सूत्र है जो कबीर की बानी को खोलने में सहायता प्रदान करते हैं। कबीर का नाता श्रवण परंपरा से है।
प्रो संध्या सिंह ने बताया कि किस भांति सिंगापुर में भी कबीर के , तुलसी के पद उसी भांति विद्यमान है जैसे यहां काशी में , भारत में है। गुजराती समुदाय इन पदों को लोक में प्रतिष्ठित करने का कार्य आज भी कर रहा है। न्यूजीलैंड , ऑस्ट्रेलिया , अमेरिका , कनाडा ,श्रीलंका आदि देशों में इनके पदों का गायन होता है । कई सारे मंडलिया, सत्संग , संस्थाएं मौजूद है। ये देश छोटे छोटे संगोष्ठी के माध्यम से आज भी इनको प्रचारित करने का कार्य करता है । सिंगापुर के अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालयों में इन पर श्रम से कार्य कराया जाता है , नाटक कराया जाता है , साहित्यिक आयोजन कराया जाता है। मानव मूल्य को हम वास्तव में जीवन में उतारने का काम कर रहे हैं ? ये कार्य व्यवहारिक स्तर पर सिंगापुर में कराया जाता है। चाहे चीनी विद्यार्थी हो या मलय विद्यार्थी हो इसे सुनते हैं , गुनते है और इसके माध्यम से भारत को जानने की कोशिश करते हैं। सिंगापुर में टेंपल ऑफ फाइन आर्ट्स है जो पिछले साल कबीर को लेकर भव्य आयोजन को अंजाम दिया था। न्यूजीलैंड में कहत कबीर नाम से वेब पोर्टल है ।
इस सत्र का संचालन डॉ विंध्याचल यादव ने किया।
इस संगोष्ठी की अगली कड़ी में अकादमिक सत्र दो का आयोजन शाम 3 बजे से 5 बजे तक हुआ । जिसका विषय था : ‘ संत भक्ति कविता का सामाजिक परिप्रेक्ष्य। ‘
इस सत्र के वक्ताओं में शामिल प्रो रेणु सिंह ने कहा कि कबीरा खड़ा बाज़ार में , आज के बाजारीकरण के दौर में बाजार केंद्र में है , हम बाजार के गुलाम न बन जाए इसका भान हमे संत साहित्य कराता है। संत कवियों का विरोध सत्ता के वर्ग चरित्र का विरोध है और ये वर्ग चरित्र आज भी अपना पैर पसार रहा है।
प्रो नीरज खरे ने कहा कि भक्ति आंदोलन एक जन आंदोलन का रूप धारण करता है। धार्मिक सहिष्णुता के मामले में संत काव्य अव्वल है । संत सांप्रदायिकता का खंडन करते हैं। कबीर के यहां और अन्य संत कवियों के यहां एकता का स्वर दिखाई देता है। आज का जो सामाजिक परिदृश्य है उसमें धर्मविहीन धार्मिकता में इजाफा हुआ है। धर्म आजकल पापों से मानसिक सुरक्षा का साधन हो गया है । इस संकट के समय में संत कवियों की बानियों की प्रासंगिकता बढ़ गई है। पंथ निरपेक्षता का एक सेकुलर नारा भी दिया।
डॉ चंद्रभान यादव ने कहा कि संत काव्य पर बोलने से पहले हमें इस बात पर सोचना चाहिए कि आज इसकी क्या प्रासंगिकता है । भक्ति काव्य में परस्पर विरोधी प्रवृत्तियां भी है। परस्पर विरोधी समाज को भी भक्तिकाव्य की कविता में
स्थान मिलता है।भक्ति कविता क्षेत्रवाद को भी तोड़ती है।
इस कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन का कार्य हिंदी विभाग के सहायक आचार्य डॉ रविशंकर सोनकर ने संगोष्ठी के सार को प्रस्तुत करते हुए किया
