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वेलेंटाइन डे: अंतरात्माओं के मिलन का उत्सव!

RKTV NEWS/अजय गुप्ता “अज्ञानी” 14 फरवरी। आज के बदलते परिवेश में प्रेम शब्द की व्याख्या और इसकी सार्थकता में समय दर समय एक परिवर्तन सामाजिक स्तर पर निरंतर प्रगतिशील है। प्रेम का दर्शन आंतरिक आंखों से होने चाहिए बाहरी आंखें तो अक्सर भटका देती है।
प्रेम आकर्षण का मुहताज नहीं होता प्रेम में लगाव होता है जिसका संबंध आत्मा से है जो रूह को रूमानियत देता है एक दूसरे के लिए परवाह,रक्षा,संरक्षण,स्थायित्व का भाव देता है। प्रेम वो भाव है जिसके सामने सब तुच्छ लगता हैं बेमोल बेमतलब लगता हैं।
प्रेम किसी दिवस, महिनें, साल के अधीन नहीं बल्कि एक सुन्दर एहसास है जो आंखों के रास्ते दिलों में उतरता है और अतृप्त मन को सरस सुगंधित कर देता है। जो अधर पर मुस्कान बन कर बिखर जाती है। “हमारी सभ्यता संस्कृति की आत्मा है प्रेम”। एक निश्छल निर्बाध सरिता है प्रेम। प्रेम जो जीवन के उबर खाबड़ राहों से शिक़ायत नहीं रखता धारा प्रवाह बहता रहता है सांसों के अंत होने तक।
“हमारी भारतीय परम्परा में प्रेम दर्शन का वस्तु रहा है कभी प्रदर्शन का वस्तु नहीं रहा।”प्रेम में स्वार्थ नहीं, चाह नहीं,बस त्याग है, रक्षा है, सहारा है, लगाव है, संरक्षण है,परवाह है,आत्मिक लगाव है। सावित्री ने प्रेम किया था सत्यवान से, मीरा की प्रेम कृष्ण से। आरूणी ने प्रेम किया था गुरु से, कृष्ण ने प्रेम किया था सुदामा से। राजा हरिश्चंद्र ने प्रेम किया था सत्य से, कर्ण ने प्रेम किया था मित्र दुर्योधन से।भीष्म ने प्रेम किया था प्रतिज्ञा (वचन)से। “प्रेम कोई विपरीत लिंग का गुलाम नहीं है केवल शारीरिक सुख पाने का मात्र कोई साधन नहीं है।”
प्रेम का अर्थ ही है समर्पण,रक्षा जिसके प्रति प्रेम होता है उसके प्रति गहरा परवाह होता है हम उसे हमेशा बचा कर रखना चाहते हैं। हम उसका बुरा नहीं चाहते उसका क्षय नहीं चाहते उसे हमेशा सहेज कर रखना चाहते हैं।
मगर हम समय के चक्र के साथ बदलते गये नयापन को अंगिकार करते गये प्रेम का भी पश्चिमीकरण होता गया और “हम प्रेम के दरिया को छोड़ कर प्यार का सागर बनते गये जहां तृप्ति की कोई गुंजाइश शेष बची ही नहीं।”
आज आधुनिक दिखावटी युग ने प्रेम की परिभाषा ही बदल कर रख दी है। प्रेम को इच्छा पूर्ति का साधन बना कर रख गया है। नये प्रेम में त्याग की नहीं उपभोग की प्रधानता है।”इसमें आत्मिक लगाव कम शारीरिक लगाव ज्यादा दिखता है। इस नये प्रेम में आकर्षण की उत्कंठा है और चाह पुरा करने की तीव्र प्रबलता है। आज कहीं ना कहीं हम शारीरिक सुख को ही प्रेम मान चुके हैं। इसलिए प्रेम की निशानी कभी नीले ड्रम में, कभी बोरों में कभी फ्रिज में लाशों के शक्ल में मिलने लगे हैं। ये हमारी गिरी हुई समाजिक मूल्यों के उदाहरण ही नहीं मरी हुई संवेदना,असीम चाह व मनमानी का प्रकाष्ठा भी कहे जा सकते हैं।
“हमारी सभ्यता संस्कृति ऐसे प्रेम को स्वीकार नहीं करती जो वेग युक्त हो जहां दिखावा हो, जश्न हो, प्रदर्शन हो, क्षणभंगुरता हो, प्रेम निर्दोष होता है स्थायित्व होता है, इसमें त्याग होता है। चाह की कोई गुंजाइश नहीं होती। प्रेम सुख दुख में साथ जीना सिखाता है, सुख दुख बांटना सिखाता है,सहायता करना सीखाता है, साथ निभाना सीखता है,”प्रेम कोई खिलौना नहीं की खेला दिल बहलाया और टूट गया तो फेंक दिया।” प्रेम किसी दिन और तारीख का मुहताज नहीं। प्रेम में कोई उपहारों की चाह नहीं प्रेम को कभी नवीनीकरण की आवश्यकता नहीं होती। प्रेम नित्य है निश्छल है त्यागी हैं परवाह है शांति शूकून है स्थायित्व है जिवंत है इसलिए इसे कभी नवीनीकरण करने की आवश्यकता नहीं होती। भारतीय दर्शन इसी प्रेम को स्वीकार करता है।
“प्रेम एक सुखद एहसास है जो सांसों के उम्र तलक हृदय में जीवित रहता है।

अजय गुप्ता “अज्ञानी” 

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