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ग्रामीण जन-जीवन यथार्थ का नायक : झबुली

RKTV NEWS/आरा (भोजपुर)12 जून।” झबुली” साहित्यकार डॉ कृष्ण दयाल सिंह रचित एक भोजपुरी उपन्यास है जो इनकी प्रकाशित हुई पुस्तकों में पांचवे नंबर पर आती है।इस भोजपुरी उपन्यास का प्रकाशन दो बार हुआ एक बार वर्ष 2005 में इसका प्रथम संस्करण आया तो दूसरा संस्करण वर्ष 2007 में।
लेखक की इस रचना पर कई नामचीन साहित्यकारों ,लेखकों सहित समीक्षकों ने अपनी अपनी सकारात्मक टिप्पणी लिखी है जिसका प्रकाशन भी इस पुस्तक के प्रथम में किया गया है साथ ही लेखक ने भी अपनी बात को लिखा है।

टिप्पणियां

दुसरका संस्करण पर आपन बात

‘झबुली’ भोजपुरी उपन्यास के पहिलका संस्करण 2005 में प्रकाशित भइल रहे। दू साल के भीतरहीं एकर भंडार ओरिया गइल बाकिर आपूर्ति के मांग ना रूकल। ई सब पाठक लोग के नेह आ पढ़े के उत्सुकता के कारण भइल। ढेरों पत्र-पत्रिकन में समीक्षा भी छपल आ कुछेक मंचन पर चर्चा भी होत रहल। एह से हमरा उत्साह के बढ़ावा मिलल। पाठकगण के नेह-छोह से हम विभोर बानी। इहे कारण बा कि एकर दुसरा संस्करण तुरंते निकाले पड़त बा। एह में कुछ विद्वानन से प्राप्त प्रतिक्रिया के समेटल मात्र गइल बा।

उमेद बा राउर स्नेह आगे भी बनल रही।

आरा

13 नवम्बर 2007

राउर आपन डॉ० कृष्ण दयाल सिंह

‘झबुली’ भोजपुरी उपन्यास के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। भोजपुरी भाषा आज भारत में ही नहीं, विश्व के कई देशों में बोली जाती है, भोजपुरी जन भाषा है, अतः आपकी भोजपुरी में लिखी उपन्यास का स्वागत।

सस्नेह
कमलेश्वर

5/116 ईरोज गार्डेन, सूरज कुंड रोड, दिल्ली फरीदाबाद बोर्डर, नई दिल्ली-110 044

आपका लघु उपन्यास ‘झबुली’ छोटा अवश्य है परंतु इसका कथ्य कालजयी तथा विराट है। किसी भी सामाजिक उपन्यास से इसकी तुलना की जा सकती है। संक्षेप में लेखक ने समाज को कई प्रकार से सन्देश देकर अपने लेखन के उद्देश्य को सार्थक कर दिया है। आप लेखनी के धनी है। आपका लेखन कम भले हो परंतु वह गुणवत्ता में किसी से कम नहीं है।

डॉ० राजेश्वरी शांडिल्य संपादक ‘भोजपुरी लोक’ 14ए माल एवन्यू कॉलोनी, लखनऊ

आपकी इस कथावृति में भोजपुरी का लोकजीवन चित्रित है तथा इसमें प्रेमचन्द के ‘गोदान’ जयशंकर प्रसाद के ‘कंकाल’ तथा निराला के ‘चतुरी चमार’ और बिल्लेसुर बकरिह’ की भाँति ही उपेक्षित, वंचित, शोषित, मेहनतकश वर्ग के प्रति औपन्यासिक सामाजिक चेतना प्रवाहित हो रही है। युगीन यथार्थ, त्रासद आचलिक जन-जीवन का चित्रण आपके सक्षम साहित्यिक व्यक्तित्व का खुलासा करता है। संस्कृति में राजनीति, अर्थनीति, धर्मनीति के घालमेल के कारण हमारी मानवता का आधार दरकता नजर आ रहा है। नैतिकता के पाये हिलते नजर आ रहे हैं। ऐसे में ‘झबुली’ बहुत कुछ सार्थक कह जाता है।

डॉ० जनार्दन यादव लेखक/पत्रकार पो०-नरपतगंज (अररिया), बिहार

‘झबुली’ के अनेक खूबियन में मुख्य खूबी एक कथारस से लबालब भइल बा। भोजपुर के उर्वर माटी के सोन्ह गंध में मिठास से भरलआ देहाती मुहवरन अउर कहाउतन के सलमा सितारा जड़त पुस्तक के भाषा भी उपन्यास के सरस आ रोचक बनावे में अहम भूमिका अदा कइले बा। ‘झबुली’ ग्रामीण जिनगी के यथार्थ पूरक उपन्यास बा जवना में गवई संस्कृति आपन सम्पूर्ण विविधता आ खूबसूरती के साथे प्रतिबिंबित बाटे।

शिवपूजन लाल विद्यार्थी प्रकाशपुरी, आरा, बिहार

डॉ० कृष्ण दयाल सिंह ने अपने उपन्यास ‘झबुली’ में ग्राम्य जीवन की झलक को प्रस्तुत किया है। उपन्यास में आवश्यक सभी तत्व उपस्थित है, शैली कथारस से लबालब, प्रवाह भोजपुरी के खांटी शब्दों को यथा स्थान व्यक्त करते हुए आगे बढ़ता रहता है। वास्तव में कहानी शिल्प पर आधारित उपन्यास में जहां गंभीर विषयों को उठाने का प्रयास है वहाँ पर पाठक को बांधे रखने के लिए उपयुक्त विनोदमय वातावरण भी बनाया गया है।

कृष्ण देव चतुर्वेदी सचिव, भोजपुरी मित्र मंच
पंचशील नगर, भोपाल (म.प्र.)

डॉ० के० डी० सिंह रचित ‘झबुली’ उपन्यास में सामाजिकता, राष्ट्रीयता, धार्मिकता का समावेश सहज ढंग से हुआ है। उपन्यासकार ने ‘झबुली’ के बहाने देश और समाज में व्याप्त विभिन्न प्रकार की कुरीतियों का पर्दाफाश किया है। इसमें उपन्यासकार ने एक ही साथ राष्ट्रीय राजनीति से लेकर अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के उतार-चढ़ाव, दाँव-पेंच का भी भलीभांति चित्रण करने में सफलता हासिल की है। इसमें भोजपुरी की जीवंतता लक्षित होती है। इसमें अद्यांत एक प्रवाह है जिसमें मन रम जाता है। कहीं भी, कभी भी नीरसता एवं थकान महसूस नहीं होती। इसकी भाषा सरस, सरल एवं मिठासपूर्ण है।

डॉ० अयोध्या प्रसाद उपाध्याय स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग महाराजा कॉलेज, आरा (बिहार)

डॉ० के० डी० सिंह द्वारा रचित ‘झबुली’ उपन्यास एक सामाजिक एवं पारिवारिक कृति है। ‘झबुली’ एक नायक प्रधान रचना है। इसमें नायक की मनःस्थिति युवापीढ़ी की जनाक्रोश का प्रभावकारी अभिनायकत्व एवं साकारात्मक रूप है। ‘झबुली’ उपन्यास में उपन्यासकला के सभी तत्व अंशतः या पूर्णतः सामान्य एवं विशेरू रूप में विद्यमान हैं। ‘झबुली’ उपन्यास का नायक झबुली बचपन में प्रेमचन्द के ‘ईदगाह’ का हामिद और युवावस्था में ‘नमक का दारोगा’ का वंशीधर है। ‘झबुली’ की भाषा शैली कथोपकथन का रूप नागार्जुन के उपन्यास ‘पारो’ का प्रभाव है। ‘झबुली’ उपन्यास आधुनिक विचारों के जंजीर की एक सुन्दर कड़ी है।

डॉ०ओम प्रकाश सिन्हा एम०ए०, पी-एच०डी०, बी०एड० सहायक शिक्षक (हिन्दी)
हर प्रसाद दास जैन स्कूल, आरा, भोजपुर (बिहार)

झबुली’ उपन्यास त वास्तव में गागर में सागर बा। बहुते छोट कलेवर
‘ में रउरा बहुते कुछ कह गइल बानी। समाज के सभे समस्या आ विषय रउरा से छूटल नइखे। एतने ना पछिमी राष्ट्रन के शोषण आ धौंस का साथे वैश्वीकरन के पोल नीमने से लउका के खोलले बानी। राउर ई उपन्यास एक तरह से अन्तर्राष्ट्रीयों कहल जाई। राउर ई उपन्यास एह तरह से भोजपुरी साहित्य में मील के पत्थल साबित होई।

लव शर्मा ‘प्रशांत’ ग्राम- रघुनाथपुर पो०-मोतिहारी (पूर्वी चम्पारण) बिहार 845 401

हमार समझदारी

एके बइठकी में हम झबली उपन्यास पढ गइनी। उपन्यास के परिभाषा ई ना ह कि बहुते मोट होखे। खूबे मोट होखे उहे आदमी कहाई, कवनो जरूरी नइखे । तब दुबर-पातर आ नाट आदमी के का आदमी न कहल जाई। असली बात बा कि झबुली के माध्यम से उपन्यासकार आपन अन्तरात्मा के गुथल सौगात खुला मंच पर कइसे परोस रहल बाड़न, ई साफे लउकत बा। कवनो जरूरी नइखे कि पढ़ल-लिखल आदमी ही अपना विचार के सुगन्ध से सगरो सुबासित कर सकेला। अगर एह तरह के बात रहीत त बाल्मीकि के केहू ना जान पाइत। एह उपन्यास में कइसे एक अनपढ़ व्यक्ति झबुली अपना साहस आउर भुजवल से भरल सभा में कृष्ण के अईसन ओह असहाय लईकी के दाग के लाज से बचा लेत बाड़न। कइसे झबुली घोष दादा के प्रेतन के हथकंडा से छोड़ा लेत बाड़न।
उपन्यासकार के ई बात “जे खुद आदर ना दे सके ऊ दोसरा से का उमेद राखी”। आदत बड़ बात बा। कानी अंगुरी के छोट न समझे के चाहीं। अउर कुछ ना त हाथ के शोभा त बा। झबुली बिल्कुल अनपढ़ बाड़न बाकिर कतना उनुका अनुभव बा। का अनुशासन इहे बा, जेकरा जबे मन में आई तबे दफ्तर जाई आ दफ्तर से चल जाई। झबुली के माध्यम से उपन्यासकार आपन अनुशासित जीवन शैली के दोसरे के अपनावे खातिर कहत बाड़न।

झबुली अशिक्षित बाड़न बाकिर उनुकर समाजिकता, राष्ट्रीयता, धार्मिकता अउर सहजता केकरा के नइखे झकझोर देत। बाँह में गोली लागल बाकिर उमंग कहाँ कम बा। पनपातो अनपढ़ बाड़ी। देशभक्ति कतना उनुका में बा। जब झबुली के बाँह में गोली लागत बा त साफे उनुकर औरत कहत बाड़ी कि एकरो से बेसी जब त्याग के जरूरत पड़े देश खातिर त उहो देला में शिर ऊँचा होई।
बहुत सा बात एह उपन्यास में उभरिके सामने आइल बा। जवन देश के राह देखावे में अगुआई कर रहल बाटे। नौकरी के समस्या, सरकारी दुर्व्यवस्था के बारे में भी झबुली के माध्यम से कहवावल बाटे। (गरीबी जीवन में संघर्ष करे के राह बतावेला) ई डॉ० के०डी० सिंह के मुँह से झलक मात्र नइखे। पनपातो के अइला से, अथक परिश्रम कइला से, घर चमक उठता। इत्यादि।

अंत में हम इहे कहब कि डॉ० के०डी० सिंह के उतार-चढ़ाव, मन में घर कइल कठिनाई साफा दस्तावेज के रूप में बराबर देत रही समाज के। बस एही शुभकामना के साथ।

आरा, 23-6-04

रउरे – होरा प्रसाद ठाकुर आर०एम०एस० आरा, बिहार

“झबुली” के कथा-विन्यास

“झबुली” बाबू के०डी०सिंह जी के पहिला भोजपुरी लघु उपन्यास ह। भोजपुरी में ऊहाँ के इ एगो निमन प्रयास बा। झबुली सीमांत किसानन के प्रतिनिधि बाड़न। सीमांत किसानन के जवन आर्थिक सामाजिक जद्दोजहद होला उहे झमेलन के बीच जलखर नाम के किसान घरे झबुली के जनम होत बा। ऊनुकर मन पढ़ाई-लिखाई में इचको नइखे लागत। ऊ आपन अज्ञानता आ नटखटपन में अपना गुरुजी के गोड़ हँसुआ में फँसा के घवाहिल कर देत बाड़न। बाद में कोलकत्ता भाग जात बाड़न। कुछ दिन एगो बंगाली भद्रलोक के घर में रसोइया के काम करत-करत सेना में भर्ती हो जात बाड़न। कश्मीर में आतंकवादी हमला में घायल हो जात बाड़न। बाकिर दुश्मन से बहादुरी का साथे मुकाबिला करे का वोजह से उनका सेना में पदोन्नति हो जात बा। सैनिक सेवा से रिटायर होके गाँव लवटि आवत बाड़न। कहानी सामान्य लागल बिया, बाकिर कुछ गहराई से सोचला प लागत बा कि आरे इ त एक ओर गाँव के जे सामान्य किसान बा, ओकरे बेटा झबुली देश के एकता आ अखंडता खातिर देश के सीमा पर लड़त बा। एह दिशाई सोचला प उपन्यास के एगो नया पाठ भेद खुलत बा। एगो बड़हन आ मजीगर कथ्य के कथानक पेहम बा एकरा में। सामान्यता में एगो असामान्यता के दर्शन कइल जा सकेला। “झबुली” के जवन कथा-संसार बा ओह कथा-संसार के अजगुत नाम बा पात्रन के जैसे झबुली, जलखर, मनफूला, झोरन, भूलेटन, भरोसा, पनपातो, राकस काका, राम आसरे साव, रेशमी, लोरकर, जियराखन, जहीर चच्चा। उपन्यास के कथाभूमि भोजपुर बा। भोजपुर के कथाभूमि में उपन्यास के पात्रन के नाम में उत्तर आधुनिक महानगरीय नामन के अजब खिल्ली उड़ावल गईल बा। एह तरह से भी भूमंडलीकरण के खिलाफ रचनात्मक विरोध दर्ज कइल जा सकेला। भोजपुरी समाज में आत्मनिर्भर बने के रचनात्मक प्रयास बा। घरेलू उद्योग-धंधा के विकास से भी वैश्वीकरण के मुकाबला कइल जा सकेला। झबुली के दुलहिन पनपातो झांपी में बंद रहे वाली महिला ना हई। उ परिवार के आर्थिक स्थिति सुधारे खातिर घरे में अदौरी पापड़ बनावे के शुरू कर देत बाड़ी। ससुर थोड़ा पिछड़ा मानसिकता के बाड़न त उनका के समझा लेवे में पनपातो सफल होत बिया। उपन्यास में पनपातो के चरित्र सुलझल स्त्री के चरित्र बा। पनपातो के ठीक उलटा जिराखन के दुलहिन बिया। जवन दिनभर श्रृंगार-पटार में बाझल रहत बिया। ओकर ननद ओकर नाँव बरकट्टी (बाँब हेयर) रखले बिया। गाँव में किसानन के बीच भी ईर्ष्या-द्वेष बा। ऊहाँ के समाज भी कौनो निर्द्वद्व समाज नइखे। सोनाझारो फुआ बाड़ी, जेकरा आनंद एही में बा कि केकर बियाह कटि गइल। राकस काका लेखा खनिहार भी बाड़न। बाकि राकस काका में पर्याप्त हास्य-विनोद भी बा। राम आसरे साव नियर कंजड़ के भूत बनि के खूब छकवलन।

दरअसल, “झबुली” लमहर कहानी के शिल्प में लघु उपन्यास बा। एकरा में भरपूर कथारस बा। हास्य-विनोद भी बा। बौद्धिक बहस भी बा। पढ़े के आरंभ करीं त अंते करि के छोड़बि। इ एकर खूबी बा। एगो सीमा भी बा। कथा-विधा में एगो महत्त्वपूर्ण पात्र होला, कथावाचक, जे लागी कि पाठक से सभ कथवा उहे कहता। कथावाचक में रचनाकार के व्यक्तित्व समाइल रहला। रचनाकार एह से रचनाकार होला कि ऊ अपना पात्रन के मूर्त्ति गढ़ला। सभ पात्रन के मूर्त्ति एके लेखा ना होखे के चाहीं। मदारी के जमूरा छत्तीसगढ़ के मंत्री-नेता (अजीत जोगी) से लेके सी०बी०आई०, संसदीय समिति के नाम जानत बा। खुद मदारी प्रेमचंद के कथा साहित्य से अवगत बा। लोरकर अपना पत्नी से कहत बाड़न “तू का जनलू, जमाना बदल रहल बा। उदारीकरण, मशीनीकरण, भूमंडलीकरण हो रहल बा….।” लोरकर के पत्नी कम नइखी “रोजगार चल जाई टेम्स अमेजन में नहाये।”
इ सभ संवाद कथावाचक, रचनाकार, लोरकर आ ऊनकर पत्नी के अंतर मिटा देत बा। अइसने संवाद येह रचना के सीमा बा।

16 नवम्बर 04

जितेन्द्र कुमार मदन जी के हाता

आरा-802301

झबुली के झरोखा से

ई भरम पालल कि उपन्यास काय कलेवर में मोट-झॉट होला, एकदम निराधार बा। उपन्यास कद काठी में दुबर पातर भी हो सकेला। असल चीज बा कि उपन्यास के तत्वन के रचना में कहाँ तक समावेश भइल बा आ उपन्यास धर्म के कइसे निर्वाह कइल गइल बा। एह दृष्टि से विचार कइला पर ‘झबुली’ के निर्विवाद रूप से उपन्यास के श्रेणी में राखल जा सकेला।

डॉ०के०डी० सिंह जी के लघु उपन्यास ‘झबुली’ के मुख्य पात्र झबुली के व्यक्तित्व के निर्माण, अनुभव के कार्यशाला में भइल बा। भले झबुली कम पढ़ल लिखल बा बाकिर ओकरा उत्तम-मधिम के ज्ञान बा, नींक-जबून के पहचान बा। अइसन लोग के कमी नइखे जे अच्छर ज्ञान से अनजानो रहला पर अपना बुद्धि-विवेक आ सूझ-बुझ से बड़-बड़ अकिलवंत लोगन के माथा खुजलावे पर विवश कर देला। एह संचार क्रांति आ सूचना प्राद्योगिकी के जमाना में चौबीसो घंटा दूरदर्शन पर अनवरत घटत घटनन के दृश्य देखिये सुन के समझे बूझे के सुविधा प्राप्त बा तब झबुली जइसन आदमी अपना पास परिवेश आ देश दुनिया के खबर से कइसे अनजान रह सकेला। एह से झबुली के बात के हलुक मान के हवा में ना उड़ावल जा सके आ ना ओकरा ज्ञान पर प्रश्न चिह्न लगावल जा सके।

लेखक के मनोभूमि सदा से आम आदमी के भावभूमि के करीब रहल बा। ‘झबुली’ में भी लेखक गाँव-गवई के लोगन के साथे खड़ा दिखाई पड़त बा। जवना समस्या से आज लोग जूझ रहल बा ओकरा के झबुली के माध्यम से पुरजोर ढंग से उठावे के प्रयास भइल बा। क्षेत्रवाद के जहर आ बाजारवाद के कहर के रूप में नित्य फैल रहल प्रदूषण के प्रति आगाह करत भीषण परिणाम के आशंका व्यक्त बा। अगर एकरा पर अंकुश ना लागल त समाज टूट जाई, देश बिक जाई। ई कुल्ह चीज झबुली के माध्यम से लेखक बड़ा सहज ढंग से कह जाता।
उपन्यासकार के हवाई उड़ान में विश्वास नइखे ओकर पाँव मजबूती से जमीन पर जमल बा। झबुली में कल्पना के उड़ान के अपेक्षा जिनगी के यथार्थ के ज्यादा झलक मिलत बा। जवना खुरदरा जमीन पर लेखक मेहनतकश लोगन के साथ निभवले बा, एह रचना में ओकर बू बास आइल स्वाभाविक बा। एकरा के लेखक के खूबी आ लेखन प्रति इमानदारी ढेर कविता, कहानी, लिखाइल बा पर उपन्यास भाषा साफ सुथरा आ सुलझल बा जवना में कहल जा सकेला। भोजपुरी में के अबहियों बहुत कमी बा। भोजपुरी माटी के सोन्ह गंध मिलत बा।

झबुली के बाद सबसे सशक्त पात्र पनपातो में एगो सजग आ जगल नारी के चरित्र के दर्शन होत बा, जवन अपना उद्यम, साहस, कर्मठता, जुझारूपन आ पक्का इरादा के बल से परिवार के बदहाली के खुशहाली में बदल देत बिया। जब पनपातो आपन पति आ घायल फौजी झबुली के जल्दी ठीक होखे के मंगलकामना करत बाड़ी त उनकरा हृदय में हिलकोरा भारत राष्ट्रभक्ति के भाव शब्द के स्वरूप ग्रहण कर लेता ‘देश खातिर अतना का, एहू से बड़ आहुति देबे के पड़े त करे के चाहीं’।
मदारी वाला आ तमूरा के चरित्र में गजब के उभार बा। समाज आ सरकार पर तमूरा व्यंग के अइसन छूरा चलावता कि मन कट के रह जाता। अपना बोल से सबके पोल खोल देता। सरकारी गोदाम में अनाज सड़ रहल बा तबो केतना लोग आम के आंठी खाये पर मजबूर बा। ई एके पांति जिनगी के सच्चाई से रूबरू करावत आदमी के झकझोर के रख देता। साथे-साथे व्याप्त भ्रष्टाचार आ कुव्यवस्था के ओर भी संकेत करत बा।
झबुली आ पनपातो के अलावे राकस काका, जलखर, भूलेटन बाबा आदि तेजी से विकसित हो रहल गवई समाज के जीवंत पात्र बाड़े जवन अपना-अपना चरित्र के बड़ा सशक्त ढंग से निर्वाह कइले बाड़े। फलस्वरूप ढेरों उक्तियन के सुक्तियन के रूप मिल गइल बा। यथाः-
झबुली कगजीहा पढ़ाई भले मत पढ़ले होखस मगजिहा पढ़ाई के जेहन में उतार लेले रहन।
रेल में जे ढेर पइसा देके टिकट लेला ऊ बइठ के जाला।

कम पइसा वाला के असहीं खड़े-खड़े रगड़ाते जाये के पड़ेला….।

गरीबी जीवन में संघर्ष करे के राह बतावेला।

ईहे तिलक दहेज त पूरा समाज के डूबावत बा।

जे जतने पढईत बा ऊ ओतने घटीहई करत बा।

समाज के सुलगत सवालन से दु-चार हो रहल झबुली के पास घृणा के जगह प्रेम, अलगाव के जगह समता, क्षेत्रीयता के जगह भारतीयता, साम्प्रदायिकता के जगह स‌द्भावना, कुटिलता के जगह नेकनियती, निरक्षरता के जगह साक्षरता के अनुभव, विदेशी के जगह स्वदेशी, दहेज के जगह बालिका के निपुनता तथा नरसंहार के जगह मानवाधिकार के पक्षधर बाड़े, पोषक बाड़े। हर समस्या के निदान के हरदम औजार गढ़े वाला बाड़न। एकरा के भारत के उज्जवल भविष्य के पूर्व संकेत मानल जा सकेला।
देश के दसा के दरसावत समाज के दिशा देबेवाला ‘झबुली’ के रचनाकार के हम साधुवाद देत बानीं आ आशा करत बानीं कि अगहूँ लेखक के कलम से दमदार रचना अइहें स।

दिनांक

11-04-04

रामायण सिंह

अध्यक्ष, भोजपुरी साहित्य विकास मंच महाराणा प्रताप नगर, आरा (बिहार)

ग्रामीण जन-जीवन यथार्थ का नायक : झबुली

हिन्दी कथा-साहित्य में ग्रामीण जन-जीवन यथार्थ का आंचलिक भाषा में चित्रण सर्वप्रथम आचार्य शिवपूजन सहाय लिखित ‘देहाती दुनियाँ’ से होता है। परवर्ती साहित्यकारों मसलन नागार्जुन, फणीश्वरनाथ ‘रेणु’, डॉ० राही मासूम रजा, डॉ०शिवप्रसाद सिंह, विवेकी राय प्रभृति ने इस उज्ज्वल उर्वर भूमि पर आंचलिक क्रान्ति की। किन्तु, भोजपुरी कथा-साहित्य की आधार भूमि तो गाँव-गँवई की सोंधी मिट्टी ही होती है। इस मिट्टी पर भी समुन्नत कथा-साहित्य की सृष्टि अवाध गति से हो रही है, जिसकी मिठास अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय हो रही है। भोजपुरी औपन्यासिक जगत् में प्रथम तिलक के रूप में श्री रामनाथ पाण्डेय का बहुचर्चित उपन्यास ‘बिन्दिया’ सुशोभित है।

बहरहाल, हिन्दी-भोजपुरी साहित्य सृजन क्षेत्र में डॉ० के०डी० सिंह का प्रादुर्भाव उपेक्षित, वंचित समाज के दुःख-दर्द, व्यथा-विवेचन, चिन्तन-मनन एवं लेखन से होता है। यत्र-तत्र, अनायास, यथावत, ‘तपल करमजरू’ की ख्याति से उत्स्पहित उनकी नवीन औपन्यासिक कृति ‘झबुली’ भोजपुरी औपन्यासिक जगत् में ‘बिन्दिया’ से बढ़कर ‘मंगलसूत्र’ है, जिसकी शुभ्र ज्योति बहुत देर और दूर तक शोहरत फैलायेगी। भोजपुरी माँटी की सोंधी खुशबू एवं इसकी सांस्कृतिक मिठास के साथ उत्तर भारत की ग्रामीण-संरचना, रहन-सहन, रीति-रिवाज, परम्पराएँ, रूढ़ियाँ, अंधविश्वास इत्यादि से होते हुए स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना तक की प्रगति-यात्रा-वर्णन तथा शिक्षा-ज्योति को व्यावहारिक धरातल पर घर-घर पहुँचाने, कुटीर उद्योग को बढ़ावा देने, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा आर्थिक गुलामी की संभावना को रोकने, राजनीतिक पार्टियों की सत्तालिप्सा को सशक्त चरित्रों के माध्यम से प्रासंगिक परिवेश-सृष्टि एवं पात्रोचित शब्द-प्रयोग कर कथानक को डॉ० सिंह ने व्यापक फलक देते हुए अत्यन्त सूक्ष्मता से बुना है, जिसके गुम्फन में कहीं बिखराव नहीं है। ग्रामीण जीवन-यथार्थगत शीर्षक ‘झबुली’ नवीन भावभूमि पर निराला के ‘चतुरी चमार’ तथा ‘बिल्लेसुर बकरीहा’ की याद ताजा कर देता है। संभव है उनके इस प्रथम प्रयास में हमें एक या दो जगह स्पीड ब्रेकर मिलें, लेकिन दरअसल वे अवरोधक कथानक में गुम्फित उस इलाके की भीड़-भरी बस्ती रूपी विसंगतियों से साक्षात्कार कराने के लिए हैं ताकि पाठक की दृष्टि राजमार्ग से हटकर पगडंडी पर भी पड़े। पगडंडी से राजमार्ग का सफर भारतीय संस्कृति के ज्यादा करीब है। डॉ० सिंह की रचनाधर्मिता इसी डगर पर अग्रसर है। फिलवक्त, भोजपुरी साहित्य-संसार को इनसे असीम अपेक्षाएँ हैं। अस्तु! शुभकामनाओं सहित।

8/1/2005

डॉ० रणविजय कुमार

प्राध्यापक, हिन्दी विभाग, जैन कॉलेज, आरा

कुछ आपन बात

बाजारवाद के फैलत जाल, शहरीकरण के अंध दौड़ के वादो भारत के आत्मा अभियो देहाते में बसल बा। देहातन के बईठकी में, दादी-नानी के कहल कहानीयन में ढ़ेरका भाव छीपल रहेला। तब अजबे पढ़ाई पढ़ावल जात रहे जवना के असर जिनगी भर रहले रह जाला। अब त लोग शिक्षा के ढोल पीट रहल बा, साक्षरता स्तर के औसत ऊँचा बता के आपन पीठ अपने ठोक रहल बा। पहिले के लोगवन के निरक्षर, भोदु बतला रहल बा। जंगल-जंगलात काट के महल बन रहल बा, लेकिन का नदी-नाला सूखाईल नइखे जात बरसा के अभाव में? एटम पर हाथ रखा रहल बा, निर्माण खातिर कम, विध्वंस खातिर ढेर। फोन आ विमान के बाग सजा के, कहाता कि दुनिया के दूरी घट रहल बा। बाकिर का दिल के दूरी बढ़ल नइखे जात? छीना-झपटी, लूट-मार कर के अकूत वैभव केनहूँ बटोरात बा आ केनहुँ अभाव के ढेर लोग मर रहल बा। दहेज-दानव से बचे खातिर गरभे में बेटी के हत्या कइल जात बा। विदेशी माल प लोग इतराता। त सवाल बा, का करे के चाहीं? जरुरत बा अनौपचारिक, व्यवहारिक शिक्षा के समझे के, बढ़ावे के, अपनावे के। कालीदास, कबीर, रहीम, सूर, तुलसी, भिखारी ठाकुर कवनो स्कूल, कॉलेज, के का मोहताज रहन? परशुराम जी पहाड़तली में कर्ण के पढ़ावत रहन, त लव-कुश के बाल्मीकी जी जंगल में पढ़इलन, कबीर के त रामानन्द जी तलाब के सिढ़ी पर सब पढ़ा देलन। कहे के माने खुला विद्यालय ‘ओपेन स्कूल’ के अवधारणा तबो रहे, पढ़ाई खुला आकाश के नीचे प्रायोगिक होत रहे, आज से बढ़ीया रहे। का गाँधी, विनोवा विदेशी माल खातिर तरसत रहन? का लाल बहादुर शास्त्री, लोहिया राष्ट्र खातिर कुर्बानी देबे में कवनो कोर कसर छोड़लन? अरमान ठीक रहे के चाहीं, नियत साफ होखे के चाहीं। अभाव त संघर्षशील बनावेला । झबुली पनपातो के माध्यम से इहे सब कहे के कोशिश बा। तमूरा-मदारी खाली नाचते नइखे, सब नंगा नाच देख भी रहल बा। राह उबड़-खाबड़, कंटगर देखे में लागत बा लेकिन सस्ता, सुविहता अभियो बा। एहतरी करजा-गुलामी में अधुराये के ना पड़ी, आत्म दाह के नौबत ना आयी। इहे सब कारण देख के ‘झबुली’ उपन्यास में एक तरफ हमरा झबुली पनपातो के आ दोसरा तरफ लोरझर के बेटा, पतोह के उपस्थित करा के सोझा लावे पड़ल। एगो आउर उद्देश्य बा कि इ बात खेत-खलिहान, बाग-बगइचा, आर-पगार के लोगन तक पहुंचे, ना कि सोफा सेट आठर महलन के दहलीज त सिमट के कैद रह जाय। अब जादे बढ़ा के आपन बात लम्बा नइखी कइल चाहत। रचना रउरा हाथ में बा, रउवा लोग से विचार करे निहोरा बा कि समाज के, राष्ट्र के बिखराव, अलगाव के रोके में ई राह निमन बा कि…… हमरा समझ से अबहियो जब आधा से जादे आबादी अभावग्रस्त बा त इ राह ठीक बा। रउवा सभे आपन विचार से अवगत कराइब जा। कुछ गलत बुझाय त सुझाव भी देब जा।

रचना में सहयोग खातिर आपन साथी आ सहयोगी रघुवर तिवारी के जतना भी आभार देब कम लागत बा। हम आभार देब, रामायण सिंह के, डा० परशुराम सिंह, डा० ओम प्रकाश सिन्हा के, हीरा प्रसाद ठाकुर के, जितेन्द्र कुमार जी के। कम्जोजिंग/डिजाइन खातिर, अजय, राज कुमार के। डा० रण विजय कुमार के स्नेह भी भूला ना सकब। हम आपन पत्नि यशोदा के भी याद कइल कइसे छोड़ी जे हमार रचना के कंठस्थ कर लेले बाड़ी।

वउरहउ के भल जइसे होखे विवाह, ई बैला, मड़ई के छोड़बे ना करिहें।

गउरा भी तप करते रहिहें,भले नित दिन भंगिया घोटात रहिहें। धूल-धूसर, राख, भस्म लगवले रहीं, छोड़ी संतूर, हाथे डमरु धइले रहीं।

अइसन तांडव करीं कि देह पसीनाये लागे,
पसीना के ही बूँद से खेतवन के दरार भरे लागे।
शिव-शिवा अब इहे, दक्ष के पक्ष ध्वस्त हो जइहें,
झबुली-पनपातो के बुझी, राष्ट्र इनके से वचिहें।

आरा

21 दिसम्बर 2004

राउरे आपन कृष्ण दयाल सिंह

रचनाकार: डॉ कृष्ण दयाल सिंह
(लेखक वर्तमान में आरा के वरिष्ठपुरी में निवास करते है,संपर्क:9570805395)

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