नव नालंदा महाविहार के जन्म-शताब्दी समारोह में नामवर सिंह के साहित्य, इतिहास, मिथक और विचार के अंतर्संबंधों पर गंभीर विचार-विमर्श हुआ।
RKTV NEWS/नालंदा (बिहार)27 जुलाई।हिंदी आलोचना के प्रखर साहित्य-चिंतक नामवर सिंह की जन्म-शताब्दी के अवसर पर नव नालंदा महाविहार में आयोजित समारोह में उनकी आलोचनात्मक दृष्टि और वैचारिक विरासत का व्यापक पुनर्मूल्यांकन किया गया। आचार्य नागार्जुन संकाय भवन स्थित सप्तपर्णी सभागार , नव नालंदा महाविहार में आयोजित संगोष्ठी में वक्ताओं ने नामवर सिंह को केवल हिंदी आलोचना के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर के रूप में नहीं, बल्कि साहित्य, इतिहास, दर्शन, मिथक और आधुनिक बौद्धिक विमर्श के बीच संवाद स्थापित करने वाले चिंतक के रूप में रेखांकित किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन और पुष्पार्पण के साथ हुआ। कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने मुख्य अतिथि डॉ. गया सिंह को सम्मानित किया, जबकि संकायाध्यक्ष प्रो. रवींद्र नाथ श्रीवास्तव ‘परिचय दास’ ने कुलपति का सम्मान किया। डॉ. धम्मज्योति, एसोसिएट प्रोफेसर, पालि ने मंगल पाठ प्रस्तुत किया। संस्कृत विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. नरेंद्र दत्त तिवारी ने स्वस्ति-वाचन किया।
स्वागत एवं प्रस्तावना में प्रो. रवींद्र नाथ श्रीवास्तव ‘परिचय दास’, संकायाध्यक्ष, पालि एवं अन्य भाषा संकाय ने कहा कि नामवर सिंह के लिए आलोचना किसी रचना पर बाहर से सुनाया गया फैसला नहीं थी। वह रचना के भीतर प्रवेश करके उसके अर्थ, समय, सामाजिक संदर्भ और मानवीय जटिलताओं को समझने की प्रक्रिया थी। उन्होंने कहा कि नामवर सिंह ने साहित्य को किसी एक विचारधारा या पूर्वनिर्धारित निष्कर्ष की सीमाओं में बंधने से बचाया। उनके लिए साहित्य निरंतर प्रश्न, बहस और पुनर्विचार की जीवंत प्रक्रिया था।
उन्होंने कहा कि नामवर सिंह की दृष्टि में साहित्य न तो केवल सौंदर्य का स्वतंत्र क्षेत्र था और न किसी विचारधारा का घोषणापत्र। वह मनुष्य और उसके समय के बीच निरंतर चलने वाला जटिल संवाद था।
उन्होंने कहा कि नामवर सिंह की आलोचना साहित्य को उसके व्यापक सामाजिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भों में देखने की दृष्टि प्रदान करती है। उनके चिंतन में इतिहास और मिथक, साहित्य और दर्शन, रचनात्मकता और आलोचना तथा परंपरा और आधुनिकता के बीच गहरे संबंध दिखाई देते हैं। वक्ताओं ने यह भी कहा कि मिथक को केवल अतीत की कथा या धार्मिक आख्यान के रूप में देखना उसके व्यापक सांस्कृतिक अर्थ को सीमित कर देता है। मिथक सामूहिक स्मृति, सांस्कृतिक अनुभव और ऐतिहासिक चेतना के बीच एक महत्त्वपूर्ण कड़ी का निर्माण करता है।
मुख्य अतिथि वरिष्ठ आलोचक एवं रचनाकार डॉ. गया सिंह ने नामवर सिंह के आलोचनात्मक व्यक्तित्व पर विस्तार से विचार करते हुए कहा कि उनकी आलोचना की सबसे बड़ी विशेषता उसकी जीवंतता थी। वे साहित्य को किसी संग्रहालय में सुरक्षित वस्तु की तरह नहीं, बल्कि अपने समय से लगातार संवाद करने वाले जीवित अनुभव के रूप में देखते थे। उनकी आलोचना में साहित्यिक संवेदना और बौद्धिक कठोरता का अद्भुत संतुलन दिखाई देता है।
डॉ. गया सिंह ने कहा कि नामवर सिंह की आलोचना को समझना साहित्य को जीवन और समाज से जोड़ने वाली एक व्यापक बौद्धिक परंपरा को समझना है। उन्होंने हिंदी साहित्य को भारतीय और वैश्विक बौद्धिक संदर्भों से जोड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। साहित्य और दर्शन को अलग-अलग खाँचों में रखकर नहीं समझा जा सकता। भारतीय साहित्यिक चिंतन की अपनी स्वतंत्र परंपरा है, जिसे आधुनिक सिद्धांतों के साथ संवाद करते हुए उसकी सांस्कृतिक और दार्शनिक पृष्ठभूमि में भी समझना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि नामवर सिंह की आलोचना संवाद, असहमति और पुनर्विचार की परंपरा को आगे बढ़ाती है।
अध्यक्षीय वक्तव्य में कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने कहा कि नामवर सिंह के चिंतन में परंपरा और आधुनिकता एक-दूसरे के विरोधी ध्रुव नहीं थे। परंपरा उनके लिए वर्तमान से संवाद करने वाली जीवंत शक्ति थी, जबकि आधुनिकता प्रश्न करने, पुनर्विचार करने और बौद्धिक उत्तरदायित्व निभाने की क्षमता। उन्होंने कहा कि नामवर सिंह की आलोचना पाठक को तैयार निष्कर्ष नहीं सौंपती, बल्कि उसे सोचने और प्रश्न करने के लिए प्रेरित करती है।
उन्होंने कहा कि आलोचना स्वयं एक रचनात्मक कर्म है। आलोचक का कार्य केवल किसी रचना को अच्छा या बुरा घोषित करना नहीं, बल्कि उसके भीतर सक्रिय इतिहास, समाज, संवेदना और विचार को पहचानना है। इसी कारण नामवर सिंह की आलोचना ने हिंदी साहित्य में बहस की परंपरा को जीवित रखा और एक विशिष्ट बौद्धिक संस्कृति का निर्माण किया।
कार्यक्रम का संचालन हिंदी के अतिथि प्राध्यापक विकास सिंह ने किया। धन्यवाद-ज्ञापन हिंदी की अतिथि प्राध्यापक शिवानी जायसवाल ने किया। राष्ट्रगान के साथ समारोह का समापन हुआ।
वक्ताओं ने कहा कि नामवर सिंह की जन्म-शताब्दी केवल एक महान आलोचक के स्मरण का अवसर नहीं है, बल्कि उनके विचारों को नए संदर्भों में पढ़ने और समझने का अवसर भी है। उनकी वास्तविक विरासत प्रश्न करने, बहस करने, असहमति को स्वीकार करने और साहित्य को व्यापक मानवीय संदर्भों में देखने की आलोचनात्मक परंपरा में निहित है। गंभीर पाठ और नए प्रश्नों के साथ यह विरासत आज भी निरंतर जीवित और प्रासंगिक बनी हुई है।

