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वीर कर्ण अवसान सोपान

वीर कर्ण अवसान सोपान

बजल नगाड़ा नधते रथ,
नभ गरज उठल अजबे सुनते।

मातल खीसी खखुअइले कर्ण,

दहाड़त रथ पर छउक बइठलें।

ढोल, शंख, गड़गड़ाये लागल,
वीर जोशे हहकारे लगलें।

कर्ण सेना के लेले बढ़लें,
जइसे सागर में लहर उठले।

बरसे लागल आग बाण से, बैरी पर,

सुखल लकड़ी अस धह-धह जरे लगले;
मुलायम मक्खन जस बैरी लागल,

छूरी के गति रोके ना पवले।

यमराज के रस्सा लोगन डाड़ में लागल,
सोझा कर्ण के चलती ना चल पावल।

ओसहीं पांडव के सेना बाण से,

घिरल त निकले ना पावल।

जेनहीं कर्ण झपाटा मारस,
बड़-बड़ योद्धा भागे लगले;

खिसीआइल बाज के झप्पटा से,

भूचेंगी अस सब के सब भगलें।

रण में उतरल आज ठीक का बडुवे ?
सोच-सोच पछताते रहले;
दूरे से देखत कर्ण के,
भय के मारे सब काँपत रहलें।

रण के जंगल के बकुअइले छीलत,

लगले-लगले ऊ गरजत रहन;
बैरी धमक के शोर सुनते,
झूडे के झूडे हीलत रहन।

दुश्मन में मचल बेचैनी देख के,
कर्ण के छाती दुगुनाइल रहे;
जतने उद्वेग बढ़त रहे,
पीछा से सेना ओतने उमड़त रहे।

कड़कत कर्ण, शल्य से कहलन,

देखिह आज का करत बानी;

अर्जुन-केशव दुनहूं के,
जीअते आजे बान्हत बानी।

आज सांझे समर भूमि में
दुर्योधन के जय तिलक लगावल जाई;
डंका पिटवावत जितला के,
एहिजे बेखटके बजवावल जाई।

टेढ़ किस्मत के उकसवला अस,

अतने में सोझे धर्मराज भेंटइलन;

दाँत पिजावत टूटलें कर्ण उनका पर,

यम अस जइसे बाज के काक भेंटाइल।

लेकिन जबर-अबर के ईहो लड़ाई,

जादे देर ना टीकल;
सधुआइल धर्मराज के कोमल देह,

घनगर चोट ना सहल।

जसहीं भगलन छोड़ लड़ाई,
कर्ण झपट के गरदन धइले’;
कहलन कर्ण, कि महाराज,
कोमल गरदन रउवा कहाँ भेंटाइल।

रउवा डरपोक ना बानी,
बाकिर कोमल कह के छोड़त बानी;

आगे रउवा का करब,
एगो छोटहन अकिल बतावत बानी।

बाबाजी हई त कवनो वन में,
गांछी त बइठ के पूजा करीं;
कवन काम बा साधु लोग के,
जे एह जानमारवा युद्ध में ठहरी।

झुठहूँ के योद्धा बन के ना कबहूँ,
रण के आग में झकोराई;
लौटी गरूड़ के झपटा में मत,
आपन जान गँवाई।

लाजे डूबते उतराते,
समर भूमि से भगलन धर्मराज;

फिकिर में पड़ले, कोई का कही,

हमरा के बीरन के समाज।

काहे ना जान ले लिहलन,
मान त तबहूँ बाँचल रहित;
शरम सहे खातिर जीनगी भर,
ई पापी ना जीवन के दिहित।

बुझ ना सकले, काहे कर्ण,
उनकर जान ना लिहलें;
गरदन पर आइल तलवार के,
काहे अचके लौटा ऊ लिहलें।

टॉकल जे बा धरम भाग्य में,
देल बात कुन्ती के पालन कइलन;

छीन के मुँह-कवर तलवार के,

जन्मना माँ के अंचरा में रखलन।

जब तक कर्ण समर में रहलन,
कतना निरमल चरित्र बा उनकर;
माँ कुन्ती के चेहरा मन धइले,
देलका बात याद समर में उनकर।

कतना बार अपना काबू में,
सहदेव, नकुल, युधिष्ठिर, भीम के कइलें;
हँसी-हँसी में छोड़त गोइलें,
बचन पालन भाव जब भीतर अइले।

भागत ‘देख छोड़ला पर भीम के,

सारथी शल्य कर्ण से कहलन;

अचरज करत निहारत शल्य,
कुछ कड़ा बात के बोललन।

रे सूत के पुत कवना दिन खातिर,

धेनुहा बाण के धइले बाड़े;
जब मारहीं के नइखे तब
बीरन के छेंक-छेंक काहे पकड़त बाड़े।

असहीं का गधबेरा तक,
एह युद्ध के जीते पइबऽ ?
बैरी के बिन मरले छोड़बऽ,
त अपने ही मर जइबऽ।

अजबे खेल एह रण के
कुछ हमरा नाहिं बुझाता;
डरपोक कहीं के पार्थ के अवते याद,

का डर उभरल आवत बा?

शल्य से हँसते कहलन कर्ण,
पार्थ से डर त उनका होई;
नश्वर अल्पायु जीर्ण देह पर,
जेकरा तनिका ममता होई।

ई चार दिन के जीनगी
एकरा ना कुछुवो बुझींला;
जवने भीतर से बढ़िया लागे,
ऊहे हरदम हम करीं ला।

आपन भूखल तीर के तीतर,
भूखहीं छोड़ भगायी ला;
भीतर के आत्मा सुख खातिर,

हँसते-हँसते हम दान दिहींला।

अपना घर भीतर के कथा,
बाहर नाहिं बतावे लायक;
बचन निभावे में दुख पावल,
धरम हेतु बा सुख लायक।

आन्हर होके लोग लडेला,
खाली एही लोक में जीते खातिर;

लेकिन जे लड़े ना एहिजा खातिर,

ढूँढ़ लेला घर बड़ अपना खातिर।

जइसे सब कीचड़ में डुबलें,
हमरो पाँव का ओसहीं डूबी ?
लालच के फूटल गगरी से,
का आत्मा के तेज ना टूटी?
ई देह माटी में मिलिहे,
एकर कवन भरोसा बा;
छोड़ देह सरग जाये के चाहीं,
ईहो अब उड़ के बा।

सरग में सीढ़ी लगावे खातिर,
कतना जुगाड़ जुटवले बानी;
बचन व्रत के पालन खातिर,
देव पर चार फूल चढ़वले बानी।

चार फूल चार पांडव,
कवनो भिक्षुक के आँख के पानी;

बचन दान चार फूल ना तोड़व;

ई कवनो तप बल के ह पानी।

चार फूल ना चाहीं हमरा,
बाद ई, बड़का कामे अइहें;
चार फूल चढवला पर,
भगवानो हँसते होइहें।

ई बात शल्य तू जनबऽ ना,
ई काम तपल करमजरू के ह,
जीतहू से बड़का खेल के मतलब बा,

ई काम मतवाला रवि तनय के ह।

एकर स्वाद त ऊहे जनिहे’,
जे सुतला में अमृत पीहे;
दुनिया में रहिहें भले मगर,
दुनिया से अलगे रहिहें।

अतनो पर शल्य समझ ना पवलें,

कहलन कर्ण से, बकवास मत करऽ;

हिम्मत होखे त करऽ युद्ध,
बल होखो त धेनुहा धरऽ।

ल देख बजरंग पताका,
दूरे से कइसन लउकत बा;
रथ पर पार्थ के धमक दूर से,
कइसन कान भीतर पड़त बा।

रथ के घोड़न के टाप का बडुवे,

बिजली के तेज लजाइल बा;
आगे के सेना फाटल जाय,
पाछे गरदा के बादल आइल बा।

काल पास में आइल बा कर्ण,
अब आपन बाण चढ़ावऽ तू;
जेकरा खातिर तड़पत रहऽ,
लालसा आज पुरावऽ तू।

देखते रथ पर पार्थ, कर्ण के,
छाती दुगुना फूले लगले;
बिजली अस क्रोध के मारे,
ईहो अब यमराज अस लगलें।

बोललन कर्ण, जवन काम खातिर अर्जुन,
ब्रह्मा हमनी के गढ़लन;
जवना खातिर हमनी के सुभाव में

कवनो अंगोरा बा सुलगल।

जवना दिन खातिर हमनी के,

हथियार बटोरले बानी;
बहुत दिनन के हिसाब फरियावे के,

घड़ी आज भाग्य से मिलल बा।

अब लपकत आग में घी डाल के,

हम दूनों जयकारी बोलीं जा;
हम छेदी तोहरा के भा तू हमरा के,

एक दोसरा के आदर दींहीं जा।

लेकिन चेतल तू रहिह,
फिर ना भागे पड़ी;
हमनी में से केहू के,
आजे इहवाँ मरे के पड़ी।

बहुत देर हो गोइल बा,
आज हिसाब फरियावे के होई;

आपन ‘नाहिं त दुश्मन के माथ,
आजे काटु चढ़ावे के होई।

अभिमानी कर्ण के देखते,
पार्थ हिरदा में तितकी उठल;
अर्जुन उठलन बोल कर्ण से,
सारथी सुत साँचे सब ठनल।

केकर जान बच पाई आज,
ई हे बतलावत अब बानी;
तोहरा धड़ से लागल माथ,
लगले अभी हटावत बानी।

कहते कहत धेनुहा खींच के,
अर्जुन छोड़लन लमहर बाण;
मन में बन्हले एही से,
निकली दुसमन कर्ण के प्राण।

चोख बाण के सहते-सहते,
कर्ण, महाकाल अस हँसले;

कर्ण-दहाड़ बीच डूबल शोर,
बस उनके गरजन छवलें।

कहले, वाह, वाह ए अर्जुन,
तोहरा से बड़ सम्मान मिलल;
बाकिर लागी ना बढ़िया सुनत,
तोहरो बाण बेकार भइल।

कवच-कुण्डल नइखे त का,
देहिया के कोमल कमल मत बूझऽ;
तप से तपल बडुवे छाती कठोर,
कड़ईल बाण देह छुवते टूटिहें बूझऽ।

अब हमरो पाहूर केलेल,
एही से यमलोक सीधे तू जइबऽ;

सँउसे जीनगी के स्वाद,
एके बार में पइबऽ।

खिसिअइले राधेय तब,
ओठ के दाँते दबलें;
मारे खातिर गरजत,
विकराल बाण धेनुहा पर धइलें।

जब तक चेतस अर्जुन,
केशव, रथ थोड़िका दूर हटवलें;

अतनो पर रथवे के भीतर,
वाण छेदला से पार्थ मुरझइलें।

वीरतई कर्ण के दे खाते,
समर भूमि बीच हाहाकार मचल;
का पार्थ के प्राण पखेरू उड़ले,
सब लोग चिन्ता में पड़ल।

मरते-मरते बचला पर
अर्जुन भइलन गंभीर;
खीसी में मातल हाथी अस,
भीड़ गोइलन ई वीर।

घन गरजन अस एक दोसरा पर,
मारे लगलन गोहिडा मार;
केहू ना तनिको झुकत रहे,
समझ ना आवे केकर जीत भा केकर हार।

एने कर्ण आग के गोला,
ओने पार्थ यमराज समान;
रण में प्रलय आके बीच,
खाड़, बेफिकरे साक्षात ।

अचरज में सेना घबड़ाइल,
लड़ल भीड़ल सब छोड़लें
देखत रहले बिन झपकवले पलक,

होते युद्ध हलाहल पीयलें।

युद्ध देखे के ना लोभ तोपाइल,

कवनो देवता गण से;
समर भूमि कुरूक्षेत्र के ऊपर,
गगन में तिल भर ना बाचल देव विमानन से।

पत्ता डोलल रूक गोइलें,
रचना के सब जीव थथमले;
सूरज के रथ रूकल रहल,
बहत पानी नदी के रूकल रहलें।

अतने में वाण खींचही बेरि,
कर्ण, तरकश ओरे तकले;
कवनो उग्र विषधर साँप,
तरकश से फुफकारे लगले।

कहलन कर्ण से, हम अश्वसेन,
नामी साँपन के मालिक हई;
,जनमें से अर्जुन के दुश्मन,
हर हाल तोहरा हित में हई।

अपना बाण के नोंक पर,
एक बार चढ़ जाये दीहीं;
अर्जुन अस घोर बैरी के,
मरघट में हमे सुतावे दीहीं।

जीनगी के बटोराइल जहर उगले दीही,
बदला बस फेरे दीहीं;
थोड़िका मदद बस दीहीं,
पार्थ के जान लेबे दीहीं।

हँसते बोललें कर्ण, अरे दुष्ट,
अइसन बात तू काहे कहले;
जीत खातिर सबसे बड़ हथियार,

आपन भुजाबल ह, ऊ कहलें।

फिर साँप से दोस्ती करके,
काहे हम मानव से लड़ब;
जीनगी भर के कइल तपस्या,
काहे अब हम भंग करब।

तोहरे उधार बल से अगर,
अचके रण के जीतिओ जायीं;
कवन मुँह देखाइब मानव के,
जे आगे दिन रोवत रह जायी।

दुनिया गरिआई जीनगी भर,
कि करनी के धोवल भइस लेवॉड़े पड़ल;

जोड़गर दुश्मन के मारे खातिर,
ई पापी, सांप के बात में पड़ल।

रे सर्प राज, तोहरे कुल अस नाग,

लोगन बीचे कतना छीपल बाड़े;

जंगल के त बाते छोड़ ऽ,
कतना, गाँव नगर के भीतर बाड़े।

साँपन लेखा लोग,
मानवता-राह पर विष बरसावस;

अपने अस योद्धा के डॅसहू खातिर,

ओही साँपन के पूजा करस।

कहीं अइसन मत होखे कि,

उनके लेखा हमरो नाग में नाम लिखाय;

हमरे नाम के घंटी बन्हले,
लोगन के, पापी में रोजे नाम लिआय।

मान लेनी अर्जुन दुश्मन हवन,

बाकिर ऊ आदमी हवन सांप ना हवन;
एही जीनगी भर के बैरी हवन,
दोसर जनम ना ऊहो रहिहन।

तब आवे वाला जीनगी,
काहे अपने आप बिगाड़ी;
सांपन के बाँही में जाके,
काहे मानव के अबहीं मारीं।

भाग, भाग मानवता के बैरी,
हमरा से मत यारी कर;
कवनो हालत में आपन मुँह ना,
काल करब तनिको भर।

छुट्टी देके सर्प राज के,
कर्ण, समर में गरजत बढ़लें;
देवन के उड़न खटोला डोलल,
नभ में झन-झनाहट हो उठले।

दुश्मन के ढकेल आगे बढ़ले,
जइसे कवनो तुफान चलल हो;

ज्वार उठल होखे सागर में,
पानी के आगे ऊ ठेलले हो।

डर के मारे पांडव सेना,
जेने जेने भागे;
जतने कर्ण खादेरले चलस,
पांडव सेना ओतने भागे।

रण जीते के केकरो मन में,
तनिको सा आसरा ना रहे;
केशव बोललें पांडव के देख,
डरे जब सब अकुलाइल रहे।

हई देखऽ पांडव सेना पर कइसे,

कर्ण खखुअइले टूटत बाडे,
पांडव सब के वीरतई के कइसे,
ऊहो बखिया उघारत बाड़े।

अइसन लागत बा चारो ओर,
कर्णे के बाण लउकत बा;
दोसरा के बोली गुम भइल बा,
बस उनके हुंकार सुनाता।

कइसन मर्दानगी भयंकर,
उनकर भुजवन में आइल बा;

कइसन मतवाला हाथी अइसन,
रण में घूम रहल बा।

किला के किला टूट रहल बा,

आखड़ा उझंख भइल बा;
का कवनो कमल बाग के,
हाथी रौंद रहल बा?
एह शेर सपूत के लड़ल देख,
हमरो नैन जुड़ाता;
तनिको तीत मत जनिह कहल,
एक छीपल राज कहाता।

कर्ण के बल आ तोहरो बल,
हम त खूबे बूझत बानी;
बाकिर अपना मन में तोहरा के,

बड़का वीर हम मानत बानी।

कर्ण के भरल ताकत के देखते,
ईहे बात हम सोचत बानी;
अतहत धनुधारी के जीते खातिर,

कवनो दोसर वीर ना जानी।

यदि चक्र सुदर्शन हमहूँ धरी,
आ तुहूँ गाण्डीव के तनबऽ;
भागे जोगे आज कर्ण के;
साइत तबहूँ संघरब।

खाली देहिया के बल ना उनकर,
रवि के तेज भरल बा;
दूनों मिल के लहक रहल बा,
अतना ऊ धधकत बा।

छोटहन वीर ऊ नाहीं,
बड़ा तपी व्रतधारी बाड़े;
सरगे में उनकर तेजी के,
घंट टंगाये लायक बाड़े।

जीते के मन बन्हले ऊहो,
यमराज बन लड़त बाड़े;
कवन तेज बल भीतर लेके,
ई निडरे ही घूमत बाड़े।

जबे देखाऽ कवनो दुश्मन पर
नजर गड़वले बाड़े;
आपनो देही पर मूंडी बडुवे,
लागत बा ऊहो भुलाइल बाड़े।

जतना बल तोहरा में बा अर्जुन,
सब के सब जेहन में लावऽ;
जतना गुण के सिखले बाड़ ऽ,
सब के सब जेहन में लावऽ।,

जतना बल तोहरा में बा,
सबके अब तू बाहर करऽ,
अब त कुछ तुहूँ विचितर करऽ,

झटके कर देखलावे पर पड़ऽ।

घनघोर लड़ाई देखते,
जसहीं दिन कुछ ढले लागल;
अचके में राधेय गरजलें,
कवनो जोम में भूलल।

प्रलय भी सोझा अइहे त
उनको के चीरते बढ़ब;
मरहूँ के होई त,
तोहरा के काटत बढ़ब ।

मृत्यु से के डरत बा ?
मुट्ठी में बान्हब काल त उनको काल नियराई;
काल त अपने मुट्ठी में बडुवे,
चाहीं जबहीं हम सरगे जाई।

सारथी शल्य, घोड़न के तेज हाँध,

ओह जगहा रथ के पहुँचावऽ;

अर्जुन-कृष्ण पास ले चलऽ,
संउसे वीर जुटल बा जहँवा।

जाँवा होखे झनझनात हथियार,

हाथी चिंग्घाड़त होखे जहँवा;
रण बड़ा भयंकर कह के
लड़वइया ललकारत होखे जहँवा ।

मूड़ी पर मूड़ी कटत होखे,
तनिका में पूका फाटत होखे ,
झनझनात तलवार उठल हो
बाणन के छुटला से अन्हार होखे जहँवा।

ध्वंस देह धर सोझहीं में,
काल के जाँवा भी छमकत हो खो;

नाचल शोर जहाँ,
जोर के गरज बीच डूबल होखे।

ले चल जहाँ घमसान मचत होखे;

जाँवा सर्वनाश के खोला होखो,
जान जाये तका बीच में रथ के रख;

जहवाँ घमासान मचत होखे ।

शल्य बात समझ ना पवलें,
बाकिर घोड़न के चाबुक देलें;

भगवान पास रथ के पहुँचवलें,
विकट अनजान राह पर लवलें।

बा विकट राह तबहूँ गम नइखे
भाग्य के अजब सुघड़ तैयारी बा,
का न्याय जानेली ओकरे जे कपटी बा।

जेकर हर समय धरम चमकत होखे,

सूरज अस करम दहकत होखे;
जे बे रोकले दान बाँटत होखो,
पृथ्वी के अनुपम जे शोभा होखे।

भूखल धरती ओकरे के खायी;
का कहीं धरती ओइसने फूल खायी,

खून के पाकों में बा रथ धसल,

बुझिह धरती चक्का धर बैठायी।

घोड़ा रहलें हिन-हिनात जोर से,

तबहूँ जमीन चक्का ना छोड़लख;

सारथी शल्य के अकिल भुलाइल,

रथी कर्ण के लाचारी ना छोड़लख।

कहलें शल्य, बात बड़ा गजब बा कर्ण,
पीतर कवनो खीसिआइल बाड़े;

तनिके कीचड़ में रथ अटकल बा,

चक्का जादे फंसल बाड़े।

निकलत नइखे जोर लगइलो पर,

अब सब अकिल हेराइल बा;
तनि तुहूँ ढकेल के देखख त,
कि रथ कतना धसल बा।

हँसते विचार राधेय के आइल,
साँचे एह दुनिया में;
अचरज हमरे ही साथे होला,
किस्मत के मार भी दुनिया में।

ठीके जब करमे जरल होखखे,
जब धरती ही रथ जकड़ले होखे;
तेज बली कर्ण छोड़ दोसरा के,

निकाले में बल का होखे ?

छउक के नीचे उतरते,
चक्का दुनों हाथ से धर के;
उठावे जोर से लगलें,
सीधे कबो झकझोर करके।

धरती डोलल, संउसे सागर डोलल,

लागल भूमंडल तक डोलल;
बस खाली चक्का ना डोलल,
नीचे धसत जाये ना छोड़ल।

कर्ण आफत में पड़लें
धेनुहा बाण अलगे छितरइले;
देखते देखते पार्थ के, भगवान जगइलें,
चुपे ललबबुआ काहे के भइलऽ।

ईहे नीक समय बा मारे के तीर,
ई बेरा फिर लौट ना आयी;
मारऽ बाण जे गरदन के छेदे,
दुश्मन कर्ण के ततले प्राण उड़ायी।

अतुराइल मन जीते के बडुवे त,

भगवान के हुकुम मान के सुन ल;

मने मन तनिका डर भीतर में अइले,

जोड़, हाथ पार्थ ई कहलें।

का एह से धरम धूमिल ना
अइसन करम का अच्छा होई
केशव मुस्काते कहलें जादे जीद मत कर
अबहीं तोहरा का धरम बुझाई ?
जे कहले रहन फिर देलन समुझाई ,
जे कहलीं ऊहे मानऽ ईहे धरम ह,

उहा पोह में फंसलऽ त फंसलऽ,
काल के गाल गोइल ना नीमन ह।

काहे खाली पार्थ काल गाल में जइहें ?
काहे खाली ईहे बोझ उठइहें ?
भगवान भरोसे सब कुछ छोड़ के,

एही सलाह पर ध्याने दीहऽ।

मारे लगले बाण कर्ण के पार्थ,

आफत में फंसल शत्रु के मारे लगलें;

बाण से देह के छेदे लगले’,
निहत्था पर बरिआर बने लगलें।

एने पार्थ बाण छोड़े में लवलीन,

ओने राधेय बे अवलम्बे रथहीन;
मुँह सिअले सब जन देखत रहन,

गजब नव धर्म के रण देखत रहन।

ना देखलें जब पार्थ के सुधरल,
कि धरम टुकिओं में हिरदा ना घुसल;

बिगड़ल घड़ी मतें धीरज धइलन,

कहलें राधेय काहे पार्थ बड़ा भारी बनलऽ।

आदमियत से काम ल अबहूँ,
बहुते खेललऽ ठंढा तू अबहू ऽ;

फसल रथ तनिका निकाले द,
उठा धेनुहा-बाण धरे द अबहूँ।

तनि तीर चलावल थाम्ह
प्राण लीहऽ उड़ा,

धेनुहा धइला पर गर सकिह।

आश्रय अर्जुन के ना चाहीं ला,
धरम के लड़ाई हम चाहीं ला;
नाम आपन बदनाम करऽ मत,

तनिका जेहन में खेयाल करऽ अब।

देह जीतल पल भर के खेला ह,

चमक एहिजे तक एकर ह;
माटी पर के जीतल माटी में मिलिहें,

फिर का होइहे गड़हा में गिरके।

बाँचल रही धरम त चमकी,
आखिर में नीमने करम पनपी;

गोहारत न्याय दुश्मन के देखाते,
मन मरले पार्थ, केशव ओर निहरलें।

मगर केशव ना थोडिको डोललन,

क्रोध में बात कड़ा कर्ण के बोललन;

रे मुँहफट धरम धुरन्धर बने वाला,

बड़ आस्था से सत्कर्म करे वाला।

न्याय ताक पर रख,

जब का अभिमन्यु के मरले रहन;
का ओह दिन तोहरो,
धरम तब ताखा पर रखाइल रहे?

आग जब लाह घर में लागल रहे,

धरम का धरती पर दाँत निपोरले रहे?
लंगटपन द्रोपदी के साथ मजलिस में,
दुर्योधन जाँघ पर बैठाते सभा में;

नारी जाति के कइसन रहे मिलल आदर,
सत्कार कइसन भइल रहे ए आन्हर।

काई सब नीमन बड़ काम रहे ?

अइसने चमक खातिर का धरम मंजात रहे?
जवन दिन जुआ में पांडव,
घर द्वार सब रहन हारल,
पहन योगी के चोंगा
जे दिन पांडव बन घूमत रहन।

जंगल पेठावल का धरम रहे ?
का शकुनी के ऊ छल ना रहे ?
तरह साल बिता जब अइलें,
का तबहूँ धरम गँवा ऊ अइले ?
का मांगल राज बड़ पाप’ रहे उनकर?
माँगल का अन्याय रहे उनकर,
का जतना हार पांडव के भइल,
सब हीं का धरमें भइल रहे?

जे दुश्मन के अइसे तड़पा के मारे,

का ऊ पापी कभी ना रहे ?
का खाली धरम के कुंड में,
हमहीं अकेले जरब ?
देखत टुकुर-टुकुर का
खाली हमहीं सब सहब ?
कि दोसरो लोग धरम के कान्ह दीहन ?
निरदयता, छल दोसर लोग काहे ना छोड़ दीहन?
कतना कतना दुख कौरव ना देलन,

घिनौना करम कतना ना कौरव कइलन।

बाकिर ईहो सब का,
तोहरा धरमे बुझात बडुवे;
बेनीमन आपन यार के,
काम का नीमने बुझात बहुवे ?
करनी के फल जब लउके लागल,
ब्राह्मण के गाय मरला के फल रथे पड़ल।

रण में ढूँढे धरम का आइल बाड़ऽ;
झुठहूँ दोसरा के अपराध बतावे आइल बाड़ऽ।

मन तनिको उदास मत करिह पार्थ,
धरम-अधरम के फेरा में कायर मत बनिह पार्थ।

कलेजा काठ के कर के
बाण से तुरते हनऽ इनका;
धेनु हा पर बाण चढ़ा,
लगले प्राण के हनऽ इनका।

सुनते कर्ण ठठाके कहलन
काहे अब देर भइल बा ?
अइसन भल काम में,
काहे देर भइल बा?
कुछ छुटल हो खो त,
ऊहो खोज बतलाई;
, काहे ना सुदर्शन तड़ाके
आप अपने हाथ उठाई।

साँच हउवे सब बात,
जतना भी रउवा कहली;
मगर आपन फिकिर में,
हमहूँ ना कबहुँ रहलीं।

पछतावा सुयोधन खातिर,
ही खाली अबहू बडुवे ;
जितवले बिना अब,
हमरा जाये के बडुवे ।

कबो भी देले बा?

दुर्योधन कल खाड़ रहन जहवाँ,

का पांडव आज खड़ा बाड़न ना उहँवा?

कवनो पाप ईहो का छोड़लन ?

के का कहल ई सब
पूछल बे मतलब बा;
का केहू धरम के थूम्हीं
कबों भी देले बा,
दुर्योधन कल खाड़ रहन जहवा
का पांडव खड़ा बाड़े उहवा
कवनो पाप ईहो का छोड़लन?
नीच करम का एको छोड़लन
गिनावल ठीक ना होई,
जे रउवा जानत बानी;
जगत के पाठ पढ़ावे वाला,
रउवा के जानत बानी।

साड़ी शिखण्डी के
पहनवल अर्जुन;
छल से भीष्म के
मरवईलन अर्जुन।

ऊ का खाली
सब सत्कर्म रहे ?
कह दीहीं भगवान
की ऊहो धरमे रहे।

सात्यकि के जान,
बचावल का धरम रहे ?
भूरिश्रवा के पूजा पर,
मारल का धरम रहे?

ऊ काम का
चंडाल के ना रहे ?
नीचतई का ऊ,
पांडवन के धरमें में रहे?
अभिमन्यु के कथा
का कहले बानी ?
पर छुपल राज काहे ना खोलत बानी?
छल प्रपंच नरो वा
कुंजरो कह कर के;
शिथिल पड़ला पर,
मार देलन द्रोण से छल करके ।

पांडव त बहुते
नीचे गिरल बाड़े,
खाली चार भाई के
जीवन दान पवले बाड़े।

कवनो पुण्य का
जोखहूँ भर उनकर बडुवे ?
ढूढ़ी पाप के गठरी
पहिले केकर खूलल बा;
सबके जहर के गठरी
अब खूल रहल बा।

जहर से जहर
खंगरा रहल बा;
बेकार बा पूछल
के कतना कुराही बा।

जहर के पांकी में,
जब सभे लेटाइल बा;
जब पाप के चादर से,
पाप ढंपाइल बा।

फिर दोष दोसरा के,
देखल ना अच्छा हउवे;
झूठे घंमड में फूलल,
का अच्छा हउवे ?
करनी के फल,
दुर्योधन के मिलत बा;
बैर के आग के फल,
टेढ़ मिल बा।

मगर पैर पांडव के,
कहाँ बढ़त बा?
भयंकर वासना के,
आग में जल रहल बा।

ढेर पाप आगे,
करबइहें ऊहो;
अंत उनका के
डुबइहें ऊहो ।

ना मालूम का ऊहो
एही जहर में जलिहे;
कि कवनो बर्फ में।

सुयोधन धोवल रहन
कि रहन लेटाइल;
गरिमा भरल वीर से,
हमरो यारी भेंटाइल।

नीमन रहे काम,
ऊ कइली,
यारी के धरम,
हम खूब निबहलीं।

भीतर हिरदा पर
गरदा नइखे ऽ
सुबरन से कम
ऊ चमकत नइखे ।

मन के ज्ञान निरमल
बा अबहूँ;
एके दुख बाचल
बा पासे हमरो अबहूँ।

द्रोपदी के चिर हरण
काहे ना रोकलीं,
दुर्योधन के पाप काहे ना,
ओह दिन रोकलीं।

एकर जवाब कुछ
ढुढलो पर ना मिलत बा;
एकरे आग में खउरात,
जीनगी जा रहल बा।

आपन लोग के जीत
दिखलाईब हे केशव।
ढीला मत करस मन पार्थ
ओने बाड़न केशव,
बेखटके दुश्मन के
अंग छीलत जास
कवनो फेर का बा,
फाटऽ हे धरती,
निगल जा हमरो रथ।
आत्मा खोज लिहि
गगन में दोसर रथ
रथ काठ के बा
लीलबू त भले लील
शील शोभित वीर के
तू का पइबू लीले ?
सरग के घड़ी
अब आवत बा
रथ तप के
काठ से बनल बा
जप योग के
औजार कसल बा
करनी के एह में
घोड़ा नाधल बा।

तेज के घूघुरू
ही गाँथल बा,
पुण्य के असनी,
लटकावल बा।

ज्ञान के फूल
ओह पर काढल बा
दया, दान, निष्ठा, पुण्य से,
अपने हम गढ़ले बानी;
रथ के आपन धरम से,
गढ़ नीक बनवले बानी।

हमरे प्राण अस निरमल बा,
कइल बा उपाय एहसे ऊँचा बा;

पंचभूत के नइखे फिकिर तनिको,

सगरो सोजहग राह बनल बा।

जे डर-भय छोड़ गगन में घुमिहें
ऊहे कीर्ति के झूला झूलिहें।

हऊ देखाऽ
चमकत रथ धमकत बा;
जवन कइले बानी पुण्य,
ऊहे क्षण पहुँचल बा।

सूरज के शोभा के गीत
आज गायीं जा;
इनकर ज्योति के
उनका से मिलायी जा।

कान्ति के झुंड मिलके,
झनकार लायी जा
ज्वाला जगत के द्वार,
आज खोल राखी जा।

तपस्या के गुलाल
आज लवले बानी;
किरण के डोर पर
आज चढ़ल बानी।

नभ में नैन
टिका के देखीं
डूबत कर्ण के
सूर्यास्त देखी।

नरेटी में लागल
एक बाण ऊहाँ बडुवे।

मुंड छितरा के
धरती पर गिरल बा
तप के तन, धाम से
अलगे विलग बा।

छिंटाइल ज्योति
तन सेजे उड़ल बा
मिल एक ताप से,
सूरज ही भइल बा।

हो रहल जय पार्थ के
जय बीच रण में,
मचल घनघोर
हाहाकार रण में।

सुयोधन लइका अस
रोवत बाडन;
पागल बन भीम
हँसत बाड़ न ।

गगन से देवगण
विमान ले भगलें,
लटकवले मुँह,
सब देव गगन से भगलें।

दुखित सूरज आपन
मुँह बदरी बीच छिपवलें,
धरती पर गम आपन
चादर खोल बिछवले।

लागल भय से युधिष्ठिर के
जान बांचल;
एह कठिन जीत से
उनको मन फुदकल।

खुशी के आँसू नयन से,
धर्मराज के टपकल,
अकुलइले हरि पास
ऊहो आसन डललन।

कहलन, हे केशव,
हमरा बड़ा डर लागत रहे,
अइसनों भी होइहें
हमरा आसरा तक ना रहे।

कि अर्जुन ईहो ,
संकट झेल लीहन,
रण में कर्ण के
ऊहो मार दीहन।

एही डर से हम
पसिनाइल रहीं,
बनवास तक में
डेराइल रहीं।
कबहूओ फिकिर
जान का छोड़लख,
तेरहों साल नींद
तक रहे उखड़ल।

बड़ विकट बरियार
योद्वा कर्ण रहलन,
केशव, ऊ साक्षात
काल अस रहलन।

बाण जहर पिआवल
उनकर रहे,
ताकत चोटिआवे में
पत्थर अस उनकर रहे।

ई अवसर कइसे,
मिलल भयहारी केशव,
जीत अस भारी केशव।

यदि आज रण में
ऊ सुतावल ना जइते,
समर के रुप कुछ
दो सरे हो जइते।

गम से भरल,
भगवान ई बोललें,
जीत पा के युधिष्ठिर
तनिका मत भूलऽ ।

पराक्रम के पहचान
खाली जीत ना हउवे,
हनत बेरि शील छोड़ल,
कवनो पुनीत ना हउवे।

जानत नइखे ऽ जीत के
ठहराव कहँ वा होला,
हरदम जीत के
शोभा कहँवा होला।

का तोहरा ठठइला में
जीत छिपल बा?
कि कर्ण के खून के
घरे ऊहो घुसल बा।

का आज रण में
जे भइल ईहो ना जनलऽ?
केकरा माथ पर सेहरा,
जीत के बा बान्हल ना जनलऽ?
का मिलल हमनी के ?
का हमनी के देनी ?
किमत जे चुकवलीं
फिर भी चीज का लेली?
शील के गीत गावल,
अब गंभीर बनल बा;
समझें में चेहरा के
पानी उतरल बा।

चिन्ता छोड़ के
मन ठहर ना पावत बा;
अबे फेंकी अबे ओकरे
के बटोरत बा।

जवने होखस कर्ण,
बड़को से बड़ का रहन;
बाण में ही अगहर ना,
धरमों में ऊँचा रहन।

तप में तपल साँच के साँचा ढरल,

व्रत में बढल रहन,
ब्रहम्त्व पूजक रहन,
बह्मचारी आ योगी ऊ रहन।

ना कपट हिरदा में,
करम में बहुते निरमल रहन,
दलित के आँख के पुतली,
करत नारी के आदर रहन।

दानी में अस अगहर,
दयालु ओतने बड़गर रहन,
जनिह युधिष्ठिर,
कर्ण के अजबे कलेजा रहे।

भल केकर ना ऊ कइलन,
ईहो का छिपल बा?
चुपे दान कवन ना देलन,
ईहो का छिपल बा?

जगत खातिर आपन
सब कुछ गँवा ऊ देलन,
रण बीच मरलो पर केहू का
कहिहें कि कुछ लेलन?
जग के तारे खातिर,
बन प्रकाश ऊ आइल रहन;
पैदा वीर ऊ अइसन कि,
कबहुँ हारल ना रहन।

सब कुछ लुटवलन,
दोसरा के दान देवे में;
सुयश बस पास में रहे,
गुजरलन जन कल्याण करे में।

दुश्मनों पर दया करके,
ऊहो बचावत रहन;
दोस्तपर मगन हो,
आपन प्राण चढ़ावत रहन।

धरती के निरबल करके,
कर्ण उडलन आज;
बाकी बचल ना बल वा तनिको,

मानव समाज में आज।

याद कर ल युधिष्ठिर,
कर्ण बहुत भयंकर रहन,
बैरी रहन बाकी हम सबके;
काल ऊ रहन।

बाकिर चलन में चरित्र में,
कतना ऊ नमनीय रहन;
दया धरम में कइसन,
हरदम निरत ऊ रहन।
द्रोण अस गुरू मान
उनकर पूजा करऽ
पितामह भीष्म अस मान,
आदर से शीश धरऽ ।

समझिह मानवता
आज अठल बा
चमक दुनिया के देबे वाला,
नेता आज उठल बा।

डॉ कृष्ण दयाल सिंह (रचनाकार)
(उक्त कविता डॉ कृष्ण दयाल सिंह रचित कविता संग्रह “तपल करमजरू” से ली गई है,लेखक वर्तमान में आरा के वरिष्ठपुरी में निवास करते है,संपर्क:9570805395)

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