एक सवाल जिसने पूरा जिला बदल दिया—‘जब मदद सामने हो तो कोई क्यों मरे?’ जवाब के रूप में शुरू हुआ जनपद स्तरीय अभियान।

जिलाधिकारी अस्मिता लाल की पहल: ‘देखना काफी नहीं, अब हम जान बचाएँगे’—बागपत का मिशन देशभर के लिए उदाहरण”
अगर किसी को CPR आती होती… इसी पीड़ा से शुरू हुई पहल, अब लोग सिर्फ़ देखेंगे नहीं—मदद करेंगे।

बागपत जनपद ने कहा—किसी को इंतज़ार में नहीं मरने देंगे; यूपी की पहली Lifesaver Registry यहाँ होगी तैयार”
भारत में 2% को ही आता है CPR—बागपत का मिशन इसे बदलने का: 50,000 नागरिक बनेंगे जीवनरक्षक।

जहाँ लोग सिर्फ़ देखते थे, अब वहीं जिंदगी बचाएँगे—बागपत बनेगा देश का पहला ‘जीवनरक्षक जिला’।
RKTV NEWS/बागपत(उत्तर प्रदेश)12 दिसंबर।अक्सर यह देखने को मिलता है कि कोई व्यक्ति अचानक सड़क किनारे गिर पड़ता है—कभी दिल की धड़कन रुकने से, कभी साँस अटकने से, कभी किसी अनदेखी स्वास्थ्य समस्या से। दृश्य लगभग हर बार एक जैसा होता है। लोग तुरंत इकट्ठा हो जाते हैं, चारों तरफ़ चिंतित चेहरों का घेरा बन जाता है। सभी मदद करना चाहते हैं, हाथ काँपते हैं, दिल तेज़ धड़कता है, पर किसी को यह नहीं पता होता कि सहायता कैसे दी जाए। कोई पानी पिलाने की कोशिश करता है, कोई गाल थपथपाता है, कोई घबराकर मोबाइल निकालकर एम्बुलेंस बुलाता है। नीयत सबकी अच्छी होती है, लेकिन ‘गोल्डन मिनट्स’—वे कीमती शुरुआती मिनट जिनमें जीवन बचाया जा सकता है—धीरे–धीरे खिसकते जाते हैं। और अक्सर, जब तक चिकित्सा सहायता पहुँचती है, तब तक जीवन उस व्यक्ति से दूर जा चुका होता है।
ऐसे अनगिनत उदाहरण यह दिखा देते हैं कि समस्या चिकित्सा संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि नागरिकों के पास जीवनरक्षक कौशल न होने की है। और हर बार यह संकेत देती है कि अब तैयारी बदलनी होगी। “जब मदद सामने ही मौजूद हो, तो किसी को इंतज़ार में क्यों मरना पड़े?” यही प्रश्न इस अभियान की शुरुआत बना और इसी प्रश्न से जन्म हुआ जिले के साहसिक स्वप्न का: “जीवनरक्षकों का जिला।” यह वह पहल है जब एक जिला कहता है—देखना पर्याप्त नहीं। अब हम मदद करना सीखेंगे। क्योंकि देखने वाले बहुत हैं, लेकिन जीवन बचाने वाले बहुत कम। और अब बागपत यह अंतर समाप्त करना चाहता है।
भारत में हर वर्ष लाखों लोग कार्डियक अरेस्ट का शिकार होते हैं। 80% मामलों में यह अस्पताल के बाहर होता है। विश्व स्तर पर जहां CPR सीखने वालों की संख्या 40%–60% तक होती है, वहीं भारत में यह संख्या 2% से भी कम दर्ज की गई है। भारत में हर साल लाखों हृदयगति रुकने की घटनाएँ दर्ज होती हैं, जिनमें से अधिकांश इसलिए जानलेवा बनती हैं क्योंकि वहाँ खड़े लोग सिर्फ़ दर्शक रह जाते हैं—जीवनरक्षक नहीं बन पाते। यह संकट केवल किसी एक जिले, किसी एक शहर या किसी एक स्थिति का नहीं, बल्कि पूरे देश का है। सड़क हादसे में मरने वाले लोगों में से लगभग 30% समय पर प्राथमिक उपचार न मिलने के कारण दम तोड़ देते हैं। बच्चों और बुजुर्गों में choking, साँस रुकना और अचानक गिरने के मामलों में अगर पहले पाँच मिनट में सहायता मिले, तो जीवित रहने की संभावना पाँच गुना तक बढ़ सकती है। लेकिन यथार्थ यह है कि औसत भारतीय नागरिक को प्राथमिक उपचार तक की जानकारी नहीं होती।
इसके लिए जिला प्रशासन ने एक व्यापक सर्वे कराया। परिणाम चौंकाने वाले थे। बड़ी संख्या में आबादी ने कभी फर्स्ट–एड प्रशिक्षण नहीं लिया था। अधिकांश, आशा–आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, युवाओं ने केवल किताबों में जीवनरक्षक तकनीकें पढ़ी थीं, अभ्यास कभी नहीं किया। यह भी पाया गया कि ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशिक्षण की कमी के कारण मौत का जोखिम 40% तक बढ़ जाता है। ऐसे में यह पूरी तरह से नागरिकों पर निर्भर है कि वे उस महत्वपूर्ण समय में सही प्रतिक्रिया दें या नहीं। आँकड़ों ने यह साफ कर दिया कि भारत में हम बच्चों को गणित सिखाते हैं, लेकिन जीवन बचाना नहीं; हम लोगों को करियर के लिए तैयार करते हैं, लेकिन संकटों के लिए नहीं; और हम समाज को शिक्षित तो करते हैं, पर उसे तत्पर नहीं बनाते।
इसी चुनौती को स्वीकार करते हुए बागपत ने यूपी की पहली “Lifesaver Registry” तैयार करने की दिशा में काम शुरू किया — एक ऐसी व्यवस्था जहाँ हर प्रशिक्षित नागरिक की जानकारी दर्ज होगी और जहाँ साधारण लोग आपात स्थिति में असाधारण काम कर सकेंगे। इस रजिस्ट्री का लक्ष्य है—पहले चरण में 10,000 से अधिक प्रशिक्षित नागरिक और आगे चलकर 50,000+ जीवनरक्षक नागरिक तैयार करना, जो किसी भी कोने में हों—बागपत, दिल्ली, मेरठ या देश के किसी शहर में—वे हर जगह जीवन बचाने की तैयारी लेकर चलेंगे। यह रजिस्ट्री एक ऐसे नेटवर्क का निर्माण करेगी जो आपातकाल में एक क्लिक पर उपलब्ध होगा। इससे पूरे जिले की प्रतिक्रिया–क्षमता का वैज्ञानिक आंकलन किया जा सकेगा और समय के साथ इसे मजबूत किया जाएगा।
इस ऐतिहासिक अभियान का शुभारंभ राजकीय कन्या इंटर कॉलेज में हुआ। प्रशिक्षित अधिकारियों ने जैसे ही छात्रों से पूछा कि CPR का अभ्यास कौन करेगा, जिलाधिकारी अस्मिता लाल ने स्वयं आगे बढ़कर लाइव CPR का अभ्यास किया। जिलाधिकारी को देखकर छात्राओं की झिझक खत्म हो गई और कार्यक्रम के बाद सैकड़ों छात्राओं ने मैनिकिन पर CPR का अभ्यास किया।
इंडियन रेड क्रॉस सोसाइटी के सहायक आयुक्त गोल्ड मेडलिस्ट फर्स्ट एड ट्रेनर एवं जीवन रक्षक पदक विजेता डॉ अरुण कुमार ने वॉलंटियर अमन कुमार की सहायता से सीपीआर का प्रशिक्षण दिया एवं सभी बिंदुओं पर विस्तार से जानकारी दी। CPR की प्रक्रिया, हाथों की स्थिति, चेस्ट कम्प्रेशन की गहराई, गति (100–120 compressions प्रति मिनट), choking में राहत देने की विधि और इमरजेंसी रिस्पॉन्स के बुनियादी सिद्धांतों को बेहद सरल भाषा में समझाया। वरिष्ठ पत्रकार कमलकांत घोष ने अपनी व्यक्तिगत पीड़ा साझा की—उनके प्रियजन की मौत सिर्फ़ इसलिए हुई क्योंकि उस समय मौजूद भीड़ को CPR नहीं आती थी। उनका यह वाक्य—“अगर वहाँ खड़े सौ लोगों में से किसी एक को भी CPR आती, तो शायद वह आज जीवित होते”—ने हर व्यक्ति को यह समझा दिया कि CPR केवल कौशल नहीं—एक मानवीय जिम्मेदारी है।
हर घर में हो कम से कम एक जीवनरक्षक।
जिलाधिकारी ने कहा कि इस अभियान का लक्ष्य दर्शक मानसिकता को बदलना है। “अब लोग केवल देखेंगे नहीं — मदद भी करेंगे।” यह अभियान नागरिकों के भीतर बसे जिम्मेदार नागरिक को अभिव्यक्ति का अवसर देगा। सभी नागरिक सीपीआर को एक लाइफ स्किल के रूप में सीखेंगे और स्कूल, बाजार, सार्वजनिक स्थानों पर इमरजेंसी स्थिति में तुरंत पीड़ित व्यक्ति को मदद कर जान बचाएंगे। सीपीआर तकनीक में किसी दवाएगों की जरूरत नहीं होती बल्कि यह एक आसान अभ्यास है। कार्यक्रम के दौरान संयुक्त राष्ट्र की आपदा–आधारित डॉक्यूमेंट्री दिखाई गई, जिसमें आग, भूकंप, सड़क हादसे, भवन ढहने जैसी परिस्थितियों में घबराए बिना तुरंत प्रतिक्रिया कैसे दी जाए, यह सिखाया गया। डॉक्यूमेंट्री के बाद छात्रों और नागरिकों ने महसूस किया कि संकट में खुद को और दूसरों को सुरक्षित रखने की क्षमता भी उतनी ही आवश्यक है जितनी आधुनिक शिक्षा। जिला प्रशासन ने आगे की विस्तृत योजना भी तैयार की है।
सीएचसी बागपत के अधीक्षक डॉ. विभाष राजपूत ने बताया कि आशा–आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, पंचायत प्रतिनिधियों, माय भारत स्वयंसेवकों, स्काउट–गाइड इकाइयों, एनसीसी, यूथ क्लब और स्वयंसेवी संगठनों को भी प्रशिक्षण दिया जाएगा ताकि यह कौशल घर–घर पहुँच सके। इस अभियान की खास बात यह भी है कि इसमें कोई आयु सीमा नहीं है—12 वर्ष के बच्चे से लेकर 70 वर्ष के बुजुर्ग तक सभी प्रशिक्षण ले सकते हैं। इससे हर वर्ग, हर क्षेत्र और हर समुदाय इस सुरक्षा–चक्र का हिस्सा बनेगा।
इस पहल से आने वाले समय में कई बड़ी समस्याओं का समाधान होगा। दुर्घटना के बाद मदद मिलने में होने वाली देरी कम होगी। दिल का दौरा और कार्डियक अरेस्ट में जीवन बचाने की बेहद कम दर में सुधार होगा। भीड़ का केवल खड़े होकर देखना और वीडियो बनाना जैसी सामाजिक प्रवृत्तियाँ बदलेंगी। प्राथमिक उपचार के अभाव में बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं की अनावश्यक मौतें कम होंगी। आपात स्थितियों में घबराहट और भ्रम की जगह एक प्रशिक्षित, शांत और तैयार प्रतिक्रिया विकसित होगी। और सबसे महत्वपूर्ण—समुदाय में मदद की संस्कृति को मजबूती मिलेगी, जो आज तेज़ी से कमजोर पड़ रही है।
इस अभियान से जो परिवर्तन होंगे, वे केवल कौशल तक सीमित नहीं रहेंगे। नागरिकों में आत्मविश्वास बढ़ेगा। समुदाय घबराएगा नहीं—तत्पर रहेगा। भीड़ अब दर्शक नहीं, सहयोगी बनेगी। घर–घर में जीवन–बचाने वाले कौशल पहुँचेंगे। आपातकाल का जवाब तेज़, प्रभावी और संगठित होगा। इससे सामाजिक ताने–बाने में वह भरोसा लौटेगा, जहाँ लोग एक-दूसरे के लिए खड़े होते हैं।
और सबसे अनोखी बात यह है कि यह आंदोलन बागपत तक सीमित नहीं है। जो भी नागरिक यहाँ प्रशिक्षण लेगा, वह जहाँ भी जाएगा—दिल्ली, गुजरात, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, बेंगलुरु—वह हर जगह जीवन बचाने की क्षमता अपने साथ ले जाएगा। यही इस पहल की सबसे बड़ी ताकत है। यह किसी भूगोल की सीमा में बंधी नहीं—यह एक मानसिकता का निर्माण है। यह लोगों को भीड़ से अलग करता है—क्योंकि जहाँ भी वे होंगे, वहाँ वे केवल दर्शक नहीं, बल्कि पहले उत्तरदाता होंगे। यह अभियान नागरिकों को “crowd-watcher” नहीं, बल्कि “nation-ready lifesaver” बनाता है।
यह अभियान अपनी तय गति से आगे बढ़ एक वर्ष में 50,000 से अधिक प्रशिक्षित नागरिक तैयार करेगा—जो उत्तर प्रदेश ही नहीं, पूरे देश के लिए एक उदाहरण बनेंगे। जैसे स्वच्छता, टीकाकरण और शिक्षा अभियानों ने भारत की सोच बदली, वैसे ही यह पहल नागरिक–कर्तव्य, संवेदनशीलता और सामुदायिक तत्परता की नई संस्कृति स्थापित अब बागपत न सिर्फ़ “जीवनरक्षकों का जिला” कहलाएगा—बल्कि यह देश को यह दिखाएगा कि एक जिले की दृढ़ इच्छाशक्ति कैसे पूरे समाज की सोच बदल सकती है। यह कहानी बागपत की है—लेकिन इसका संदेश पूरे भारत का है। जहाँ नागरिक केवल देखने नहीं, बल्कि जीवन बचाने के लिए आगे बढ़ते हैं — वहीं से एक नया भारत शुरू होता है।
इस अवसर पर इंडियन रेड क्रॉस सोसाइटी बागपत के चैयरमैन पंकज गुप्ता, कार्यक्रम समन्वयक मयंक गोयल, स्वास्थ्य विभाग से सीएमओ डॉ तीरथ लाल, डॉ विभाष राजपूत, विद्यालय से डॉ वंदना, अंकुर सहित अन्य मौजूद रहे।

