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भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के अमर सेनानी बाबू कुँवर सिंह के विजयोत्सव 23 अप्रैल पर विशेष।

RKTV NEWS/(साभार डॉ’गांधी जी राय) 23 अप्रैल।बाबू साहब ‘ और ‘तेगवा बहादुर ‘ जैसे आदरसूचक नामों से लोक-प्रसिद्ध जगदीशपुर (आरा) के राजा बाबू कुँवर सिंह भारत की पहली आजादी की लड़ाई के ऐसे बिहारी सपूत हैं जिन्होंने अपने अपूर्व शौर्य और बलिदान से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनायी । 1857 और बाबू कुँवर सिंह पर सबसे अधिक लिखने वाले इतिहासकारों में सबसे आगे अंग्रेज लेखक हैं । अंग्रेज इतिहासकार ‘हाल ‘ जो उन दिनों स्वयं आरा में मौजूद था ,अपनी पुस्तक ‘Two Months in Arrah ‘ में बाबू कुँवर सिंह को यशोधन व्यक्ति बताते हुए लिखा है कि अंग्रेजों ने उनके साथ न्याय नहीं किया था। ब्रिटेन के तत्कालीन प्रखर राजनेता ‘डिजरैली ‘ ने भी ब्रिटिश संसद में दिए गए अपने व्याख्यान में 1857 के संग्राम के विभिन्न पहलुओं पर विचार करते हुए कहा था कि ” भारत की वर्तमान अशांति एक फौजी बगावत नहीं , एक राष्ट्रीय विद्रोह है। सिपाही उसके केवल सक्रिय साधन हैं ।” डिजरैली ने अपने इसी व्याख्यान में भारतीय परंपराओं, संस्कृति और धार्मिक विश्वासों में ब्रिटिश शासन के हस्तक्षेप की ओर स्पष्ट संकेत करते हुए कहा था कि ” गोद लेने का नियम हिन्दू धर्म में है ।उसको नष्ट करना वैधानिक नहीं था ।”

अँग्रेजी राज की ज्यादतियाँ —

भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने शासन के प्रारंभिक दिनों से इतनी अधिक ज्यादतियाँ कीं , जिसका उदाहरण विश्व-इतिहास में नहीं मिलता है । क्लाइव के शासनकाल से डलहौजी के समय तक जिस ढंग से अंग्रेजों ने महत्वपूर्ण वादों एवं दस्तखती संधियों की अनदेखी कर भारत के विभिन्न राजकुलों को पददलित किया तथा उनकी रियासतों को एक-एक कर अपनी सल्तनत में सम्मिलित किया, जिस ढंग से हमारे उद्योगों को नष्ट कर लाखों भारतीयों से उनकी जीविका छीनी, जिस ढंग से असहाय बेगमों और रानियों के महलों में घुस कर उन्हें अपमानित करते अपनी निर्लज्जता का परिचय दिया, लाॅर्ड मैकाले ने जिस ढंग से भारत की शिक्षण संस्थाओं को समाप्त किया, हमारी संस्कृति/ सभ्यता /परंपराओं को बर्बाद किया तथा पूरे भारत के राजाओं–दिल्ली के मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर से लेकर झांसी की रानी लक्ष्मीबाई जैसे प्रायः सभी को अपमानित किया ।अन्य रियासतों की तरह आरा ( जगदीशपुर ) के 80 वर्षीय बीर बाँकुडे बाबू कुँवर सिंह ने अंग्रेजों से लड़ने और देश की स्वाधीनता के लिए कमर कस लिया और जन -सहयोग से ( क्योंकि उनके पास बड़ी सेना नहीं थी ) हर लड़ाई जीतते हुए आगे बढ़ते रहे , जिस क्षेत्र में पहुँचे वहाँ आजादी घोषित हुई और व्यवस्था स्थापित कर आगे बढ़ते रहे । उनका यह सिलसिला उनकी मृत्यु 26 अप्रैल 1858 तक चलता रहा और 23 अप्रैल 1858 को जगदीशपुर गढ़ की पुनः विजय भौतिक रूप से उनके जीवन की अंतिम विजय थी । देश के शेष हिस्सों में जब अंग्रेजों के भय से क्रान्ति की ज्वाला दब गई थी,तब भी एकमात्र शाहाबाद ( जगदीशपुर) क्षेत्र ऐसा था जहाँ बाबू साहब की मृत्यु के बाद भी उनके भाई अमर सिंह की अगुवाई में 1859 तक अंग्रेजों के विरुद्ध क्रान्ति की ज्वाला सुलगती रही ।

अंग्रेजों के साथ आरा में लड़ाई ( महाराजा कॉलेज आरा के प्रांगणमें
1857 के संग्राम में एक तरफ दिल्ली में अंतिम मुगल सम्राट 80 वर्षीय बहादुरशाह जफर अपने काँपते हुए हाथों से पत्र लिखकर समस्त भारत के देशी नरेशों को संग्राम में भाग लेने के लिए आह्वान कर रहे थे तो दूसरी तरफ करीब उसी उम्र के वीर बांकुड़े बाबू कुँवर सिंह तलवार हाथ में लेकर राजपूती शान का प्रदर्शन करते हुए अपने जनपद सहित सभी देशवासियों को कुर्बानियों के लिए तैयार कर रहे थे। मेरठ, दिल्ली एवं देश के अन्य भागों की क्रांति दानापुर छावनी में भी सुनाई पड़ रही थी। कमिश्नर टेलर दानापुर के सैनिकों को शस्त्र-विहीन करना चाहता था जिससे हिंदू-मुस्लिम सैनिक उत्तेजित हो उठे और 24 जुलाई 1857 को बगावत करते हुए अपनी वर्दी उतार कर आरा के लिए चल पड़े । दानापुर छावनी की तीन पालटनों (7, 8 एवं 40) का विद्रोह ब्रिटिश सत्ता के लिए खुली चुनौती थी । दानापुर के क्रांतिकारी सेना के जगदीशपुर पहुंचते ही बूढ़े कुँवर सिंह की रगों में जवानी का नशा चढ़ गया । अपने महल से निकलकर उन्होंने क्रांतिकारी सेना का नेतृत्व उसी तरह ग्रहण किया जैसे 11 मई 1857 को मेरठ से आए दो हजार घुड़सवार सैनिकों का नेतृत्व 80 वर्षीय मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर ने किया था । दानापुर छावनी के विद्रोही सेना के साथ कुँवर सिंह आरा पहुंचे और जेलखाने के कैदियों को रिहा कर अंग्रेजी दफ्तरों को ध्वस्त कर दिया । महाराजा कॉलेज परिसर में अवस्थित छोटे से किले- ‘आरा हाउस’ को घेरकर उसमें छिपे अंग्रेजों और सिक्ख सेनाओं को हथियार डालने के लिए उन्होंने बाध्य किया ( वर्तमान में महाराजा कॉलेज आरा के परिसर में स्थित ‘ आरा हाउस ‘ का चित्र संलग्न) । करीब 7 दिनों तक तक ‘आरा हाउस’ का युद्ध चलते रहा । जब किले में पानी की कमी हुई तब सिक्ख सैनिकों ने 24 घंटे के अंदर एक नया कुआ खोदकर तैयार कर लिया । उस समय ‘आरा हाउस ‘(ब्वायर कोठी) के अंदर आधुनिक हथियारों से सुसज्जित 50 सिक्ख एवं 16 अंग्रेज सैनिक थे जो इसमें शरण लिए अंग्रेजों एवं उनके परिवारों की रक्षा के लिए तैनात थे । आरा हाउस (ब्वायल कोठी) की लड़ाई ही बाबू साहेब की अंग्रेजी सल्तनत के साथ आरा की लड़ाई थी और यह लड़ाई करीब एक सप्ताह चली ।
अब पूरे आरा पर बाबू कुँवर सिंह का शासन हो गया और वे राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के 5000 क्रांतिकारी सिपाहियों के सर्वमान्य नेता तथा समस्त भोजपुरी भाषी जनता के कंठहार बन गए । जनता ने ‘तेगवा बहादुर’ की पदवी से उनका यशोगान किया । बसंतकाल में आज भी भोजपुरी भाषी अपने झोपड़ों-चौपालों और गांव के खेत-खलिहानों में गा उठते हैं–

“बाबू कुंवर सिंह ‘तेगवा बहादुर’
बंगला में उड़ेला अबीर”।

कुँवर सिंह के नेतृत्व में ब्रिटिश सल्तनत के विरूद्ध में आरा का यह विद्रोह अब पूरे शाहाबाद क्षेत्र में राष्ट्रीय क्रांति का रूप ले चुका था । अंग्रेजों के लिए आरा नगर सैनिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण स्थल था । वे हर हालत में आरा को बचाना चाहते थे । परिणामस्वरुप, आरा हाउस में घिरे अंग्रेजों की प्राण रक्षा के लिए 500 यूरोपियन गोरे सैनिकों एवं सिक्खों की एक टुकड़ी के साथ कैप्टन डनवर 29 जुलाई 1857 को दानापुर छावनी से आरा के लिए रवाना हुआ । आरा पहुंचने से पूर्व ही रात में बाबू कुँवर सिंह के सैनिकों से कैप्टन डनवर की फौज का मुकाबला हुआ जिसमें 500 सैनिकों में से सिर्फ 50 घायल होकर और केवल तीन जीवित अधिकारी दानापुर पहुंचे। कैप्टन डनवर सहित अन्य सभी सैनिक मारे गए।
कैप्टन डनवर की पराजय के बाद आरा पर पूर्ण रूप से बाबू कुँवर सिंह का अधिकार हो गया और पूरा शाहाबाद स्वतंत्र हो गया । अब बाबू कुँवर सिंह ने आरा में पूर्वी पश्चिमी थाना स्थापित कर गुलाम महिया को दोनों थाने का मजिस्ट्रेट नियुक्त किया । मिल्की मुहल्ले के शेख मुहम्मद अजीमुद्दीन पूर्वी थाने के जमादार नियुक्त किए गए। दीवान शेख अफजल के दोनों पुत्र तुराव अली एवं खादिम अली इन थानों के कोतवाल बनाए गए ।

बीबीगंज की लड़ाई
कैप्टन डनवर के मारे जाने के समाचार से मेजर विंसेंट आयर 2 अगस्त 1857 को आरा की ओर कूच कर ही रहा था कि बाबू कुँवर सिंह के सैनिकों के साथ बीबीगंज में उसका भीषण संग्राम हुआ। अंततः मेजर आयर 3 अगस्त 1857 को आरा पहुंचकर कुँवर सिंह के कब्जे से आरा को मुक्त कराया ।

मेजर विंसेंट आयर का आतंक आरा और जगदीशपुर पर कब्ज़ा–
उसके बाद मेजर आयर की विशाल सेना का मुकाबला दुलौर में बाबू कुँवर सिंह के सैनिकों के साथ हुआ । 12 अगस्त को मेजर आयर की सेना जगदीशपुर पहुंची जहाँ कुँवर सिंह के साथ कई दिनों तक संग्राम होता रहा। अंततः मेजर आयर ने 14 अगस्त को जगदीशपुर गढ़ में आग लगा दी, सामान्य लोगों के मकान ध्वस्त कर बड़े पैमाने पर जगदीशपुर के आम लोगों की हत्या कर दी । शिवमंदिर का भी विनाश करते हुए उसने गर्व से कहा, “मैंने नए हिंदू मंदिर को नष्ट इसलिए किया, क्योंकि ब्राह्मणों ने भी कुँवर सिंह को युद्ध के लिए प्रोत्साहित किया था” (जी. डब्ल्यू फॉरेस्ट, ए हिस्ट्री ऑफ इंडियन म्यूटिनी, भाग-3, पृष्ठ 455)। उल्लेखनीय है कि दुलौर से जगदीशपुर जाने के क्रम में मेजर आयर ने रास्ते में आतंक मचाते हुए मीलों तक घायल लोगों को सड़क के किनारे पेड़ों पर टांग-टांग कर फांसी देकर लटका दिया । जो भी विप्लवी दिखाई पड़ा, उसे मार डाला गया । कड़ी शराब पीकर अंग्रेजों ने ऐसे राक्षसी कार्य किया (मार्टिन, इंडियन एम्पायर, भाग-2, पृ 406)। इसके बाद कैप्टन लाॅ इस्ट्राजे ने बाबू कुँवर सिंह का जितौरा गढ़ नष्ट कर दिया । लेफ्टिनेंट सैक्सन ने कुँवर सिंह के दलीपपुर एवं मीठहां के मकानों को भी नष्ट कर दिया । दानापुर छावनी के 40 नंबर पल्टन के बचे 100 सैनिकों को संगीनों और गोलियों से उड़ा दिया गया। गुलाम महिया, अब्बास अली और वन्दे अली को क्रांति के असफल होने पर गोपाली चौक पर फांसी दी गई । भेखू जोलहा, चकवरी कहार भी कुँवर सिंह के समर्थक होने के चलते मारे गए ।
बाबू कुँवर सिंह का जगदीशपुर महल सहित पूरा जगदीशपुर पूर्ण रूप से नष्ट हो गया ।

बाबू कुँवर सिंह का जज़्बा और अन्यत्र मोर्चाबंदी —
अंग्रेजों द्वारा जगदीशपुर गढ़ पर कब्जा के बाद बाबू कुँवर सिंह ने महल की स्त्रियों और 12 सौ सैनिकों के साथ जगदीशपुर से निकलकर अन्यत्र मोर्चाबंदी कर अंग्रेजों से बदला लेना चाहा । अंग्रेजों की विशाल सेना के चलते भले जगदीशपुर पर उनका कब्जा हुआ हो, लेकिन अत्यल्प साधनों के बावजूद मात्र जन-समर्थन के बल पर आधुनिक शस्त्रों से सुसज्जित ब्रिटिश सेना का मुकाबला जिस रूप में कुँवर सिंह ने किया, वह स्वाधीनता-संग्राम में स्वर्णाक्षरों में अंकित है और यही शौर्य और वीरता उन्हें देश के अन्य स्वतंत्रता संग्रामियों की तुलना में विशिष्ट स्थान प्रदान करती है ।। जगदीशपुर की पराजय के पश्चात बाबू कुँवर सिंह अपने समर्थकों एवं सिपाहियों के साथ सासाराम की पहाड़ियों की ओर चल पड़े, जहाँ उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ भावी संग्राम की योजना बनाकर स्वतंत्रता आंदोलन की चिनगारी को प्रज्वलित रखा । स्वतंत्रता आंदोलन के बाबू कुँवर सिंह प्रथम नायक बने जिन्होंने बहादुरशाह जफर के सपने को साकार किया । उल्लेखनीय है कि अंग्रेजी सेना द्वारा गिरफ्तार हुए मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर ने मेजर हडसन को ललकारते हुए कहा था,

“ग़ज़ियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की,
तख्त ये लंदन तक चलेगी तेग हिंदुस्तान की।”

आरा (जगदीशपुर) में अंग्रेजों के साथ बाबू कुँवर सिंह के युद्ध का प्रभाव मुजफ्फरपुर, गया, संथाल परगना, हजारीबाग, चतरा, सिंहभूमि, पलामू तथा छपरा में जबरदस्त दिखाई दिया ।

बाबू कुँवर सिंह का विजय-अभियान-‘विजयोत्सव’

अपने साथियों एवं समर्थकों के अदम्य उत्साह और शौर्य से उत्साहित बाबू कुँवर सिंह का नया विभामय रूप भारतीय इतिहास में प्रकट हुआ । जगदीशपुर के पतन के बाद उनका क्षात्र तेज उमड़ पड़ा और वे अब पूरी भारतीय राष्ट्रीयता के अग्रदूत बनकर विदेशी सत्ता को मिटाने के लिए कृतसंकल्प हो गए। सासाराम के शाह कबीरूद्दीन ने अंग्रेजों की सहायता में बाबू कुँवर सिंह का जबरदस्त विरोध करते हुए उन्हें आगे बढ़ने से रोकना चाहा । बाबू कुँवर सिंह 26 अगस्त 1857 को रोहतास छोड़ते हुए अपने हजारों अनुयायियों के साथ आगे बढ़ते रहे । मिर्जापुर जाने के क्रम में उन्होंने जी. टी. रोड पर अधिकार किया । मिर्जापुर में बाबू कुँवर सिंह का अधिक प्रभाव था। घोरावत, शाहरोत होते हुए 30 अगस्त 1857 को कुँवर सिंह नेवारी और 9 सितंबर को 600 सैनिक और 5000 लोगों के साथ कटरा पहुँचे । 10 सितंबर 1857 को कुँवर सिंह ने रीवां में प्रवेश किया जहाँ हस्मत अली एवं हरचन्द्र राय ने उनका भरपूर सहयोग किया । रीवां के बाद बाबू कुँवर सिंह बांदा गए जहाँ के नवाब ने उनकी भरपूर सहायता की । 20 अक्टूबर को उनकी सेना कालपी पहुंची । 21 नवम्बर को वे ग्वालियर की क्रांतिकारी सेना, देशी सेना तथा अपने समर्थकों के साथ कानपुर पहुँचे । कानपुर के बाद अपनी सेना के साथ वे लखनऊ के लिए रवाना हुए जहाँ उनका स्वागत किया गया । लखनऊ में अवध के नवाब ने उनकी सहायता करते हुए उन्हें आजमगढ़ की ओर जाने के लिए शाही फरमान दिया । 15 अगस्त 1857 से 10 फरवरी 1858 के दौरान बाबू कुँवर सिंह ने स्वाधीनता की लड़ाई जारी रखी।

मिलमैन तथा डेम्स की पराजय

22 मार्च 1858 को आजमगढ़ से 25 मील दूर अतरौलिया नामक स्थान पर कुँवर सिंह ने मिलमैन की विशाल सेना को तथा 28 मार्च 1858 को कर्नल डेम्स को पराजित कर आजमगढ़ पर अधिकार किया ।

जगदीशपुर की ओर

अब वे अपनी पैतृक रियासत जगदीशपुर को भी स्वतंत्र करना चाहते थे । इसी बीच उन्होंने लुगार्ड एवं डगलस को पराजित करते हुए 22 अप्रैल 1858 को जब बलिया के शिवपुर घाट पर गंगा पार कर रहे थे तब उनकी भुजा में गोली लगी जिसे काटकर उन्होंने गंगा में फेंक दिया । सावरकर ने कहा है कि वीरत्व की यह चेतना स्वतंत्रता-संग्राम के इतिहास में अविस्मरणीय बनी रहेगी । 22 अप्रैल 1858 को बाबू कुँवर सिंह 1000 पैदल सैनिकों एवं घुड़सवारों के साथ जगदीशपुर महल पहुंच गए । अपनी कटी हुई बांह तथा चोटिल जांघ के बावजूद उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध कर अपनी मातृभूमि जगदीशपुर में अपने अपूर्व रण कौशल का प्रदर्शन किया । 23 अप्रैल को जगदीशपुर में कैप्टन लीग्रैण्ड की सेना से बाबू कुँवर सिंह की सेना का मुकाबला हुआ और अंग्रेजों की पराजय के साथ-साथ कैप्टन लीग्रैण्ड भी युद्ध में मारा गया । युद्ध में अंग्रेजों की पराजय के बाद प्रसिद्ध इतिहासकार चार्ल्स बाल ने युद्ध में सम्मिलित एक अंग्रेज ऑफिसर के लेख को उद्धृत करते हुए लिखा है, “वास्तव में इसके बाद जो कुछ हुआ, उसे लिखते हुए मुझे अत्यंत लज्जा आती है । युद्ध का मैदान छोड़कर हमने जंगल में भागना शुरु किया…. अफसरों की आज्ञाओं की किसी ने परवाह नहीं की । चारों ओर आहों और रोने के सिवा कुछ नहीं था । मार्ग में अंग्रेजों के गिरोह के गिरोह गर्मी से गिरकर मर गए । अस्पताल पर कुँवर सिंह ने पहले ही कब्जा कर रखा था । 16 हाथियों पर सिर्फ हमारे घायल साथी लदे हुए थे….। हमारा इस जंगल में आना ऐसी ही हुआ जैसा पशुओं का कसाई खाना में जाना । हम वहाँ केवल बध होने के लिए गए थे।”
लीग्रैण्ड की पराजय के बाद 25 अप्रैल 1858 को वीर बांकुड़े बाबू कुँवर सिंह ने अपने ध्वस्त पैतृक महल में अंतिम सांस लेकर भारतीय स्वतंत्रता के लिए युवा पीढ़ी को बड़ा संदेश दिया । विनायक दामोदर सावरकर ने लिखा है, “क्या कोई इससे भी पावन मृत्यु है, जिसकी अपेक्षा कोई राजपूत करेगा ।” सुंदरलाल ने लिखा है, “वीर कुँवर सिंह की मृत्यु के समय स्वाधीनता का ‘हरा ध्वज’ उनकी राजधानी पर फहरा रहा था।”
पराधीन भारत को ब्रिटिश सत्ता के बंधन से मुक्त करने का जो अदम्य संकल्प वृद्धावस्था में बाबू कुँवर सिंह ने लिया था, वह भारतीय इतिहास का स्वर्णिम अध्याय है । 1857 के आंदोलन के अविस्मरणीय अनेक योद्धाओं में बहादुरशाह जफर, नाना साहेब, तात्या टोपे, रानी लक्ष्मीबाई आदि का अंत वीर बांकुड़े बाबू कुँवर सिंह जैसा सुखद नहीं था ।
23 अप्रैल 1858 भारतीय इतिहास का वह स्वर्णिम ‘विजयोत्सव दिवस’ है जिसका उदाहरण विश्व इतिहास में नहीं है । अपना सर्वस्व बलिदान कर अंग्रेजों द्वारा ध्वस्त जगदीशपुर महल पर पुनः विजय पताका फहराकर उसमें अंतिम साँस लेना उनके अदम्य उत्साह एवं संकल्प का परिचायक है । आजमगढ़ से गंगा पार करने तक तथा लीग्रैण्ड के साथ उनकी युद्ध की समीक्षा करते हुए भले उन्हें ‘गुरिल्ला युद्ध का अप्रतिम योद्धा’, ‘शाहाबाद का शेर’, ‘बिहार का स्वाभिमान’ तथा ‘तेगवा बहादुर’ कहा गया हो, लेकिन सही अर्थ में वे समस्त भारतवासियों के लिए प्रेरणास्वरूप हैं । जहाँ बाबू कुँवर सिंह देश के स्वाभिमान के प्रतीक के रूप में देश का गौरव बढ़ा रहे हैं, वहाँ 23 अप्रैल का विजयोत्सव उनके शौर्य एवं बलिदान की गौरवमयी गाथा से देशवासियों को उत्प्रेरित कर रहा है । वे सिर्फ जगदीशपुर, बिहार के ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए मान, अभिमान और स्वाभिमान के प्रतीक हैं । उन्होंने समाज के सभी वर्गों के साथ मिलकर 1857 में अंग्रेजों से युद्ध किया था । देश के लिए अपना सर्वस्व बलिदान देने वाले वीर स्वतंत्रता सेनानियों को सम्मानित करने के लिए नरेंद्र मोदी सरकार ने आजादी के 75वें वर्ष को बाबू कुँवर सिंह के शौर्य के प्रतीक 23 अप्रैल को ‘अमृत महोत्सव’ के रूप में मना कर ‘तेगवा बहादुर’ बाबू कुँवर सिंह को सर्वोत्तम श्रद्धांजलि तो दिया ही है, वीरंगना रानी लक्ष्मीबाई की जयंती को ग्वालियर में ‘अमृत महोत्सव’ का दर्जा देकर अपने राजधर्म का अनुपालन भी किया है, जिनके बारे में सुभद्रा कुमारी चौहान ने लिखा है–

“बुंदेले हरबोलों के मुंह,
हमने सुनी कहानी थी ।
खुब लड़ी मर्दानी वह तो
झांसी वाली रानी थी ।”

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