
प्रेम!
क्या है प्रेम,
कैसा है प्रेम,
पूछते रह गये।
क्या हैं प्रेम,
सोचते रहे गये।
क्या है ,परिभाषा प्रेम की,
खोजते रह गये।
ना मिली थी, ना मिलेगी,
परिभाषा प्रेम की।
प्रेम तो बस शायद नाम है,
ऑंखो मे बस जाने का,
दिल में सम्मान का,
हमारे समर्पण का,
त्याग अंहकार का,
बलिदान स्वार्थ का ,
मन में चाहत का,
नेह लगाने का,
हमें तो लगता यही है प्रेम,
हो सकता है यहीं हो प्रेम,
यही हो प्रेम की परिभाषा,
जिसकी तलाश में ,
भटक रहा अखंड है।
भटक रहा अखंड है।

