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अजुबा अर्थशास्त्र

अजुबा अर्थशास्त्र

बाजार मंदा,
पैदा, आमेजन में,
भाव स्थिर, लिंकन की नहीं, नव साम्राज्यवाद की ।

एक रंगे में,
पुआ पर नारियल, आग में,
भगवान के लिए स्वाहा,
परलोक बनेगा।

भूखा ताकता रहे टुकुर-टुकुर,
आँत जाँत सोता रहे,
दूध मुँह बच्चे के साथ रोता रहे, विलाप बाहर न जाये,
घंटा, शंख का कोलाहल कर
आरती कह,
बचा खुचा पैसा भी खींच ले,
अजुबा कर्म कांड़ी अर्थशास्त्र

साम्रज्यवादी शास्त्र,
देगा ही नहीं तनिक भर,
सामन्ती, मिले को भी
छीन ले मंत्रों के बल,
हर हाल में,
गरीब, मेहनतकश के हाथ
खाली के खाली ।

रचनाकार डॉ कृष्ण दयाल सिंह
(उक्त कविता डॉ कृष्ण दयाल सिंह रचित नाटक और कविता संग्रह यथावत से ली गई है,लेखक वर्तमान में आरा के वरिष्ठपुरी में निवास करते है,संपर्क:9570805395)

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