
नारी अपहरण !
सोचता हूँ आज पर बीते दिनों की, बात है याद आती;
क्यों न आज किसी डाकू के देह, दीमक लग जाती।
उनकी आँखों में, किसी लड़की के बदले, बाँस क्यों न घुस जाता;
और पाप का रूधिर, क्यों न आँखों से ढ़ल जाता।
जिनकी पापी नजरों में संजोया पाप नहीं बह पाता;
पर बाल्मीकि नहीं बन पाता। रावण बन जाता है,
वरण किसी का करें, हरण रोज सीता का होता है;
जंगल से नहीं, आज तो घरों के अंदर से होता है।
परीक्षा क्यों होगी उस अवला की, घर से निकाली जाती है;
ऋषि का आश्रम उसे न मिलता, दर-दर मारी जाती है।
आज का डाकू जंगल में नहीं, महलों में होता है,.
दीमक रहित घरों में रहकर, पापों पर कभी न रोता है।
पहले इन महलों को गिराओ, जो लूट से बना हो;
भगाओ इनको दूर भगाओ, जिनका फिर न ठौर ठीकाना हो।
शायद तब दीमक लग जाय, व आँखों में कुछ चुभ जाये;
पाप का काला रूधिर, तब शायद शुद्ध लाल बन जाये।
तब सब जगह आश्रम ही होंगे, सीता का हरण रूकेगा;
और खुशियाँ ही होंगी, व गगन धरती को चूमेगा।
स्वर्ण मृग की लालच को, सीता तुम्हें भी छोड़ना होगा;
अन्यथा अग्नि परीक्षा के बाद भी, न जाने कहाँ जाना होगा।

(उक्त कविता ख्यातिप्राप्त लेखक,कवि,व्यंग्यकार,समीक्षक, अनुवादक “डॉ कृष्ण दयाल सिंह”जो एक अवकाश प्राप्त डाक सेवा अधिकारी भी है, उनके साहित्य काल के शुरूआती दौर में 09 फरवरी 1998 को प्रकाशित की गई कविता संग्रह पुस्तक “यत्र-तत्र”से ली गई है और यह कवि की उक्त संग्रह की इक्कीसवीं रचना है। RKTV NEWS नित्य इनके संग्रहित पुस्तक से क्रमवार एक एक रचना प्रकाशित करेगी। इनकी कई रचनाएं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रहती है साथ ही इनके दर्जनों पुस्तक भी प्रकाशित हो चुके है, वर्तमान में बिहार राज्य के भोजपुर जिला अंतर्गत आरा के वशिष्ठपुरी में निवास करते है। सुझाव और संपर्क हेतु: 9570805395)


