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बागपत:अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस 18 मई पर विशेष:म्यूजियम की वीरान शांति ने मुझसे कई सवाल पूछे..

बागपत/ उत्तर प्रदेश (अमन कुमार)18 मई।दिल्ली की भागती-दौड़ती जिंदगी के बीच उस दिन एक ऐसी जगह भी थी, जहां इतिहास तो मौजूद था, लेकिन लोग गायब थे। बाहर मेट्रो स्टेशनों पर भीड़ थी, सड़कें वाहनों से भरी थीं, कैफे और मॉल युवाओं से गुलजार थे, लेकिन देश की विरासत को संभालकर रखने वाला एक संग्रहालय लगभग खाली पड़ा था। शायद वही दिन था, जब मैंने पहली बार महसूस किया कि हम आधुनिक तो हो रहे हैं, लेकिन अपनी स्मृतियों से दूर भी होते जा रहे हैं।
मैं अक्सर संग्रहालय घूमने जाता हूं। कई लोग हैरान होकर पूछते हैं कि आखिर म्यूजियम में ऐसा क्या मिलता है? लेकिन मेरे लिए संग्रहालय केवल पुरानी वस्तुओं को देखने की जगह नहीं हैं। वे ऐसी जगह हैं, जहां हमारी सभ्यता, हमारी मिट्टी और हमारे पूर्वजों की कहानियां चुपचाप खड़ी रहती हैं।
कुछ समय पहले मैं नई दिल्ली में आकाशवाणी के साथ इंटर्नशिप कर रहा था। वहां मैं सीख रहा था कि रेडियो कैसे काम करता है, कार्यक्रम कैसे बनते हैं और देशभर तक कैसे पहुंचते हैं। उसी दौरान एक प्रोग्राम एक्जीक्यूटिव ने मुझसे एक बात कही जिसने मेरी सोच बदल दी। उन्होंने कहा कि यदि किसी विषय को सच में समझना है तो केवल इंटरनेट या किताबों तक सीमित मत रहो, बल्कि उस जगह तक जाओ जहां उसकी कहानी सांस लेती हो। वहां तुम्हें केवल जानकारी नहीं, बल्कि अनुभव और प्रेरणा भी मिलेगी।

उनकी यह बात मेरे मन में बैठ गई।

एक दिन मैं तय समय से थोड़ा पहले नई दिल्ली पहुंच गया। मैंने इंटरनेट पर आकाशवाणी भवन के आसपास स्थित संग्रहालयों की जानकारी खोजी और राष्ट्रीय डाक टिकट संग्रहालय जाने का निर्णय लिया। मैं कई वर्षों से माय भारत का एक स्वयंसेवक हूं और अक्सर उससे जुड़ी टी-शर्ट, कैप या बैज पहनता हूं। उस दिन भी मैं माय भारत की टी-शर्ट पहनकर ही संग्रहालय पहुंचा था।
लेकिन वहां पहुंचकर जो मैंने देखा, उसने मुझे भीतर तक झकझोर दिया।
मैंने प्रवेश करते समय रिसेप्शन पर एंट्री करते समय उस दिन की विजिटर लिस्ट पर नजर डाली। पूरे दिन में केवल पांच लोगों ने उस संग्रहालय का भ्रमण किया था। मैं कुछ देर तक उसी सूची को देखता रहा। मन में बार-बार यही सवाल उठ रहा था कि आखिर हम अपनी विरासत से इतने दूर कैसे हो गए? बाहर दिल्ली दौड़ रही थी, लेकिन इतिहास के कमरे खाली पड़े थे। वहां मेरी टीशर्ट पर बागपत लिखा देखकर एक सुरक्षाकर्मी ने मुझसे बात की जो मूल रूप से मेरे जनपद की निवासी थी तो उन्होंने भी यही बताया कि संग्रहालय में कम ही लोग आते है।

वह पल मेरे लिए एक चेतावनी जैसा था। मुझे महसूस हुआ कि अगर हमारी पीढ़ी अपनी विरासत से कटती चली गई, तो आने वाले समय में इतिहास केवल किताबों तक सीमित होकर रह जाएगा। उसी दिन मेरे मन में चलो म्यूजियम चलें अभियान का विचार आया। उड़ान यूथ क्लब के अध्यक्ष के रूप में मैंने इस पहल की शुरुआत की और युवाओं को अपने आसपास के संग्रहालयों से जोड़ने का प्रयास शुरू किया। मुझे खुशी है कि इस अभियान के माध्यम से सैकड़ों युवाओं ने पहली बार संग्रहालयों का भ्रमण किया।

आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो महसूस होता है कि हमारे समाज में संग्रहालयों के प्रति रुचि लगातार कम होती जा रही है। युवा घंटों मोबाइल स्क्रीन पर दुनिया देख लेते हैं, लेकिन अपने शहर के संग्रहालय तक नहीं पहुंचते। हम विदेशी वेब सीरीज और काल्पनिक किरदारों पर चर्चा करते हैं लेकिन अपनी सभ्यता और अपने इतिहास से जुड़ी कहानियों को जानने का समय नहीं निकाल पाते।

मुझे आज भी दिल्ली का राष्ट्रीय हस्तशिल्प और हथकरघा संग्रहालय याद आता है, जहां मैं कई बार जा चुका हूं। वहां की कलाकृतियां, लोक संस्कृति और ग्रामीण भारत की झलक हर बार मुझे नई प्रेरणा देती है। लेकिन वहां का सन्नाटा हमेशा मुझे परेशान करता है। वहां शांति जरूर होती है, लेकिन वह सुंदर शांति नहीं होती। वह मुझे एक वीरान शांति जैसी महसूस होती है। ऐसा लगता है जैसे सदियों से संभालकर रखी गई वस्तुएं लोगों का इंतजार करते-करते थक गई हों।

दरअसल संग्रहालय केवल भवन नहीं होते। वे जिम्मेदार समाज की पहचान होते हैं। वहां रखी हर वस्तु किसी वैज्ञानिक, इतिहासकार, कलाकार, खोजकर्ता या सभ्यता की कहानी कहती है। वे हमें बताते हैं कि हम कौन थे, कैसे विकसित हुए और हमें भविष्य किस दिशा में जाना है।

मैंने स्वयं महसूस किया है कि संग्रहालयों ने मेरे भीतर जिम्मेदार नागरिकता, नई सोच और नवाचार की भावना को मजबूत किया है। शायद यही कारण है कि मैं हमेशा युवाओं से कहता हूं कि यदि अवसर मिले तो एक बार मॉल की जगह म्यूजियम जरूर जाइए। वहां आपको अपने अस्तित्व और अपनी जड़ों से जुड़ने का एहसास मिलेगा।

माय भारत के स्वयंसेवक के रूप में भी मैंने महसूस किया है कि युवा म्यूजियम से जुड़कर परिवर्तन के वाहक बन सकते हैं। हमारा देश विकसित तब बनेगा जब युवा अपनी विरासत पर गर्व करना सीखेंगे और उसे अगली पीढ़ियों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी समझेंगे।

इसी संदर्भ में मुझे अपने जनपद बागपत का सिनौली और तिलवाड़ा याद आता है। वहां हुए उत्खनन में ऐसी ऐतिहासिक वस्तुएं मिलीं, जिन्होंने पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया। लोगों ने पहली बार महसूस किया कि भारत का इतिहास प्रमाणों से भरा हुआ सच भी है। लेकिन मुझे हमेशा एक बात खटकती है कि जिन गांवों की मिट्टी से यह इतिहास निकला, वहीं के अधिकांश लोग शायद उन वस्तुओं को कभी देख ही नहीं पाए होंगे, क्योंकि वे नई दिल्ली के संग्रहालयों में संरक्षित हैं।

मैं अक्सर सोचता हूं कि अगर उन वस्तुओं का एक हिस्सा बागपत में ही संग्रहित होता तो यहां के बच्चे और युवा अपनी विरासत को और गहराई से महसूस कर पाते। उन्हें लगता कि इतिहास कहीं दूर नहीं, बल्कि उनकी अपनी मिट्टी में मौजूद है। शायद तभी पंच प्रण में शामिल “विरासत पर गर्व” का मंत्र एक भावनात्मक अनुभव बन पाता।
कुछ समय पहले नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति बागपत की कालिंदी धारा पत्रिका ने सिनौली की कहानी को अपनी कवर स्टोरी बनाया। उसके बाद मेरे परिवार, मित्रों और युवा नेटवर्क सहित कई लोगों ने पहली बार विस्तार से जाना कि सिनौली का इतिहास कितना महत्वपूर्ण है। तब मुझे महसूस हुआ कि जब इतिहास संवाद का हिस्सा बनता है, तभी समाज उससे जुड़ता है।
आज जरूरत इस बात की है कि संग्रहालयों को केवल पुरानी चीजों की जगह कहे जाने की सोच बदली जाए। स्कूलों, कॉलेजों, युवा संगठनों और स्वयंसेवकों को इससे जोड़ा जाए। युवाओं के लिए हेरिटेज वालंटियर कार्यक्रम चलाए जाएं। स्थानीय इतिहास पर आधारित यात्राएं हों। क्योंकि यदि नई पीढ़ी अपनी जड़ों से कट गई, तो भविष्य कितना भी आधुनिक क्यों न हो, भीतर से खाली महसूस होगा। इस दिशा में बागपत प्रशासन द्वारा शुरू किए गए हेरिटेज ट्रेल के प्रयास में एक नई रोशनी छिपी है जो आगे बढ़कर संस्कृति और विरासत को संवाद एवं अनुभवात्मक शिक्षण से जोड़कर एक जीवंत रूप दे रही है।
मुझे आज भी संग्रहालयों की वह खामोशी बेचैन करती है। क्योंकि वहां इतिहास आज भी खड़ा है, बस उसके पास पहुंचने वाले कदम कम हो गए हैं।
जरूरत इस बात की है कि हम युवाओं को केवल करियर से नहीं बल्कि संस्कृति, इतिहास और जिम्मेदार नागरिकता से भी जोड़ें। स्कूलों से लेकर युवा संगठनों तक चलो म्यूजियम चलें जैसी पहलें एक नई सोच पैदा कर सकती हैं। क्योंकि जब कोई युवा किसी संग्रहालय में खड़ी हजारों साल पुरानी वस्तु को देखता है, तो वह केवल इतिहास नहीं देखता, बल्कि यह महसूस करता है कि वह भी इसी सभ्यता की निरंतर यात्रा का हिस्सा है।
मुझे आज भी उस दिन की विजिटर लिस्ट याद है, जिसमें केवल पांच नाम थे। लेकिन शायद वही पांच नाम मेरे भीतर एक ऐसा सवाल छोड़ गए, जिसका जवाब आज पूरा समाज खोज रहा है— क्या हम अपनी विरासत को सच में समझ पा रहे हैं?

लेखक के बारे में

अमन कुमार, उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा सर्वोच्च युवा सम्मान स्वामी विवेकानंद यूथ अवॉर्ड से सम्मानित एक युवा सामाजिक कार्यकर्ता है जो उड़ान यूथ क्लब के अध्यक्ष है तथा राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय महत्व के विभिन्न संस्थानों के साथ जुड़कर सामाजिक विकास में भागीदारी सुनिश्चित कर रहे है।

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