RKTV NEWS/अतुल प्रकाश,01 मई 23 ।आज 1 मई मजदूर दिवस है, जनकवि अदम गोंडवी की कविता *वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है/ उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है* से अपनी बात की शुरुआत कर रहा हूं।
क्या अडानी-अंबानी जैसे पूंजीपतियों के भरोसे सबका साथ सबका विकास किया जा सकता है? मजदूर दिवस के अवसर पर यह यक्ष प्रश्न आज भयावह रूप से खड़ा है।
इस बार की अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस 2023 की थीम Act together to build a positive safety and health culture. अर्थात *”सकारात्मक सुरक्षा और स्वास्थ्य संस्कृति का निर्माण करने के लिए मिलकर कार्य करें”* है और क्या हम आजादी के बाद मजदूरों के लिए सकारात्मक और सुरक्षा का माहौल बना पाए हैं? स्वास्थ्य की बात तो दूर की कौड़ी है हमने मजदूरों को उसका मेहनताना भी नहीं दिया है।
क्या हमने सोचा है? कि मजदूरों का पसीना सूखने के पहले हमने उनकी पूरी मजदूरी दी है?
करोना काल में महानगरों से मजदूरों का पलायन का दृश्य आपने देखा ही होगा। लाखों लाख मजदूर महानगरों से पलायन कर गए। मजदूरों के रोजी-रोटी पर संकट आ गया। मजदूर दाने-दाने को मोहताज हो गए । हजारों हजार मजदूरों ने आत्महत्या कर लिया आखिर क्यों?
मजदूरों के बल पर महानगरों की और पूंजीपतियों की चमक दमक, सुख सुविधा बरकरार है आखिर उन्हें पलायन क्यों करना पड़ा? आज मजदूर दिवस पर हमें विचार करना होगा।
करोना काल के दृश्यों से स्पष्ट है कि आज का धनिक समाज एक भयानक ज्वालामुखी के मुख पर बैठकर रंगरेलियां मना रहा है और शोषितों, अभिवंचितों मजदूरों के मासूम बच्चे तथा करोड़ों शोषित लोग एक भयानक खड्ड की कगार पर चल रहे हैं। उनकी शिक्षा और स्वास्थ्य की चिंता कौन करेगा? पूंजीपति, सरकार या समाज?
महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस , क्रांतिकारियों के बौद्धिक नेता सरदार भगतसिंह, डॉ. भीमराव अंबेडकर और समाजवादी चिंतक डा0 राम मनोहर लोहिया, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी बाजपेई के सपनों का क्या होगा? जिन्होंने मेहनत कशों की उपेक्षा को समाज के लिए भयावह माना है। इन मेहनतकशों के जीवन स्तर को बगैर अच्छा करे देश की तरक्की के दावे व बातें सिर्फ पूंजीवाद का भौंड़ा व घिनौना प्रलाप है। भारत की वास्तविक शक्ति किसान और मजदूर हैं, इनकी समृद्धि के बगैर देश में खुशहाली आ ही नहीं सकती। इसकी ईमानदार कोशिशें सरकारों को करनी चाहिए क्योंकि -जब तक भूखा इन्सान रहेगा धरती पर तूफान रहेगा।
आजाद भारत में भारत के संविधान के दायरे रहकर विभिन्न मजदूर संगठन मजदूरों के अधिकारों के लिए आवाज उठाते हैं। ज्यादातर मजदूर संगठन राजनैतिक दलों और प्रबन्ध तंत्र पर निर्भर हो गये हैं तथा मजदूरों से, उनकी असल दिक्कतों को दूर करने के प्रयासों से दूर होते चले गये हैं। तमाम मजदूर संगठन होने के बावजूद संगठित क्षेत्र के मजदूरों का मात्र दस फीस दी हिस्सा ही मजदूर संगठनों से जुड़ा है। असंगठित क्षेत्र के करोड़ों मजदूरों के हितों के लिए सिर्फ छोटे स्तर पर कुछ ही स्वयं सेवी संस्थायें कार्यरत हैं। भारत में श्रमिकों के अधिकारों का पालन नहीं किया जा रहा है। समाजवाद के दबाव में श्रमिकों को जो विधिक अधिकार प्राप्त हैं, उनकी परवाह मिल मालिक और प्रबन्ध तंत्र तनिक भी नहीं करता। विकास का हर पत्थर मजदूरों के खून पसीने से सना होने के बावजूद मजदूरों का स्वयं का जीवन विकास से कोसों दूर हैं।
मजदूरों की जिन्दगी दयनीय, अभाव-ग्रस्त तथा दर्द में लिपटी हुई है। मजदूरों की इसी पीड़ा को महसूस करते 8 अप्रैल, 1929 को कोर्ट में दिये अपने बयान में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने कहा था कि अंत में वह कानून अर्थात औद्योगिक विवाद विधेयक, जिसे हम बर्बर और अमानवीय समझते हैं, देश के प्रतिनिधियों के सरों पर पटक दिया गया और इस प्रकार करोड़ों संघर्षरत भूखे मजदूरों को प्राथमिक अधिकारों से भी वंचित कर दिया गया और उनकी आर्थिक मुक्ति का एकमात्र हथियार भी छीन लिया गया। जिस किसी ने भी कमर तोड़ परिश्रम करने वाले मूक मेहनतकशों की हालत पर हमारी तरह सोचा है, वह शायद स्थिर मन से यह सब नहीं देख सकेगा।
बलि के बकरों की भांति शोषकों -और सबसे बड़ी शोषक स्वयं सरकार है- की बलिवेदी पर आये दिन होने वाली मजदूरों की इन मूक कुर्बानियों को देखकर जिस किसी का दिल रोता है वह अपनी आत्मा की चीत्कार की उपेक्षा नहीं कर सकता। मानवता के प्रति हार्दिक सद्भाव तथा अमिट प्रेम रखने के कारण उसे व्यर्थ के रक्तपात से बचाने के लिए हमने चेतावनी देने के इस उपाय का सहारा लिया है और उस आने वाले रक्तपात को हम ही नहीं, लाखों आदमी पहले से देख रहें हैं। क्रांति को स्पष्ट करते हुए अपने बयान में इन्होंने कहा कि क्रान्ति से हमारा अभिप्राय है- अन्याय पर आधारित मौजूदा समाज-व्यवस्था में आमूल परिवर्तन। समाज का प्रमुख अंग होते हुए भी आज मजदूरों को उनके प्राथमिक अधिकार से वंचित रखा जा रहा है और उनकी गाढ़ी कमाई का सारा धन शोषक पूंजीपति हड़प जाते हैं। दूसरों के अन्नदाता किसान आज अपने परिवार सहित दाने-दाने के लिए मोहताज हैं। दुनिया भर के बाजारों को कपड़ा मुहैया करने वाला बुनकर अपने तथा अपने बच्चों के तन ढ़कने भर को भी कपड़ा नहीं पा रहा है। सुन्दर महलों का निर्माण करने वाले राजगीर, लोहार तथा बढ़ई स्वयं गन्दे बाड़ों में रहकर ही अपनी जीवन लीला समाप्त कर जाते हैं।
इसके विपरीत समाज के जोंक शोषक पूंजीपति जरा-जरा सी बातों के लिए लाखों का वारा-न्यारा कर देते हैं। यह एक भयानक असमानता और जबरदस्ती लादा गया भेदभाव दुनिया को एक बहुत बड़ी उथल-पुथल की ओर लिए जा रहा है। यह स्थिति अधिक दिनों तक कायम नहीं रह सकती।
अदानी-अंबानी जैसे पूंजीपतियों के भरोसे सबका साथ सबका विकास नहीं किया जा सकता ।
( लेखक – अतुल प्रकाश, पेशे से सिविल कोर्ट आरा में अधिवक्ता हैं अखिल भारतीय जनहित परिवार के संचालक हैं)
