
आरा/भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)05 दिसंबर।शास्त्रीय संगीत और नृत्य हजारों वर्ष की प्राचीन भारतीय विधा है।यह कला आइटम नही बल्कि आर्ट का प्लेटफार्म है ,जिसे साधना और तपस्या से हासिल किया जाता है ।भाग दौड़ के जीवन में सबकुछ फास्ट हो गया है ।लिहाजा सुर की जगह फास्ट फूड की तरह नुकसान करने वाला शोर चारो ओर व्याप्त है । जीवन में अगर सुकून और ठहराव चाहिए तो शास्त्रीय संगीत सुनना होगा जो हमारे मन मस्तिष्क को आनंद देने के साथ साथ एकाग्रता प्रदान करता है ।उक्त बातें आरा की सुविख्यात कथक नृत्यांगना आदित्या श्रीवास्तव ने विश्व प्रसिद्ध हरिहर क्षेत्र सोनपुर मेला के मुख्य मंच से कही । अवसर था पर्यटन विभाग के मंच पर शिक्षा विभाग द्वारा आयोजित सांस्कृतिक सत्र का । इस अवसर पर नृत्यांगना आदित्या श्रीवास्तव ने कथक में परण जोड़ी आमद पर राधा कृष्ण के छेड़ छाड़ का प्रसंग, दो दर्जे की लायात्मक तिहाई पर सर्प की चाल, क़ाली परण के माध्यम से रक्तबीज वध के प्रसंग को प्रस्तुत कर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया । वही बंदिश की ठुमरी “गगरीया काहे फोड़ी बहिया मरोड़ी” पर अभिनय के माध्यम से राधा और कृष्ण के रास को दर्शाया । विभिन्न लयकारी व बोल पढ़न्त के अंदाज ने दर्शकों को खासा प्रभावित किया। बोल- टुकड़ा, तिहाई व परणों पर भाव अभिनय के सामंजस्य को देख दर्शकों ने खूब तालियां बजाई। तबले पर गुरु बक्शी विकास ने व गायन एवं हारमोनियम पर हरिशंकर वर्मा ने संगत से रंग बिखेरा। इस अवसर पर शिक्षा विभाग के कई अधिकारीगण, संगीत शिक्षक व दर्शक उपस्थित थे।
