
‘माई’
लइकन के तनिको दरद होइ जाला।
माई के करेजवा तऽ तुरते पिराला।।
भुखिया से मुहवाँ जे तनिको झुराला।
माई के करेजवा तऽ तुरते पिराला।।
दाल-भात, दूध-दही जेवना खिआइके।
खटिया पे गुदगर लेवना बिछाइके।
निदिया बुलावे मीठी लोरिया सुनाइके।।
देहियाँ-थकनियाँ ना तनिको बुझाला।
माई के करेजवा तऽ तुरते पिराला।।
साँझ ना बिहान जाने, भोर-भिनसरिया।
निदिया में जागत रहेला सारी रतिया।
दिन-रात लइकन के करेला फिकिरिया।।
माई के जिनिगिया एही में बीति जाला।
माई के करेजवा तऽ तुरते पिराला।।
धीरे – धीरे माई जब बूढ़ होइ जाई।
उठले – बइठले में होई कठिनाई।
केतना हू माई कऽ ई देहियाँ झुराई।।
कुइयाँ असीसिया के नइखे झुराला।
माई के करेजवा तऽ तुरते पिराला।।
माई से न बड़ऽ केहू, जानेला जहनवाँ।
गोड़वा में माई के, बसेला चारो धमवाँ।
बड़ऽ होके, माई के ना दिहला धियनवाँ।।
माई जे हेराइल, ‘भान’, काहें पछताला।
माई के करेजवा तऽ तुरते पिराला।।


