
चल सको तो चल..!
किताब नजरों की पढ़ सको तो चल।
रास्तें सुनसान है चल सको तो चल।
आदमी मिलते है कुछ इसी तरह के।
भीड़ में गर पेहचान सको तो चल।
कुछ आब़ बचे हैं आँखों या झील में।
मुश्किल है गर तलाश सको तो चल।
हैं बंजर जमीर भी जेहन भी केह लो।
शबनम गुलो पर तलाश सको तो चल।
अजीब मौसम है क़हर ना कह हरगिज।
तपन है ज्यदा गर सह सको तो चल।
कौन झाकता अब गिरेबान में अपना।
नफासत युग का समझ सको तो चल।
आदमी मिलेंगे पर सब आदमी से उपर।
गर बात यह तुम समझ सको तो चल।
भीड़ है गुंजाइश है बच कर तो निकल।
राहों में पत्थर मिलेंगे चल सको तो चल।
क़ुर्बान हुए या फ़ना कोई मशला नहीं।
गर दर्द तूँ सहन कर सको तो फिर चल।
फूल राहों में मिलेंगे यें मुमकिन तो नहीं।
गर तुम यूँ ख़ारो पर चल सको तो चल।
आईना है अब शर्मसार भी नहीं करता।
यूँ नकाब चेहरो के बदल सको तो चल।
वो अपना है रश्क़ भी रखेगा लाजमी है।
तूँ मंजिल अपना सवार सको तो चल।
वो रास्ता वो मौका कौन देता है इन दिनो।
बेशक पत्थरो को तूँ तराश सको तो चल।
वो आँसू जज्बातो के मायने कुछ भी नहीं।
जख्मो का तेजारत तूँ कर सको तो चल।
हँसी भी दौलत से यूँ तो कुछ कम नहीं।
छुपा कर तन्हा हँस सको तो फिर चल।
सारेयाम लूट जायेंगे चीर हो या मुस्कान।
गर सहेज कर तूँ फिर चल सको तो चल।
मय भी मयखाना भी झूम रही दुनिया भी।
ज़हर हो या ग़म हो गर तूँ पी सको तो चल।
याद रख फरियादो से मिला क्या जमाने में।
भरोसा बाजुओं पर रख चल सको तो चल।
ज़हर हो या ग़म———————-।



