
ज़िंदगी..!
” ज़िंदगी ” तू इतनी मुश्किल ना बन
कि तुझे अच्छे से जी ना सकूँ ।
मत कर खड़े मुश्किल सवाल
कि पास हो ही ना सकूँ ।
जीना चाहती हूँ सरलता से
पर तू हर कदम पर चुनौती
लिए खड़ी है ।
टूटने लगी हूँ अब थोड़ा
सम्भलना मुश्किल ना कर ।
सुकून की कुछ साँस तो लेने दे
फुर्सत से थोड़ा तो जीने दे ।
तू हर कदम पर प्रतियोगिता
लिए खड़ी है
कैसी आपदा मुझ पर पडी है ।
अपने रूठ रहे है , रिश्ते छूट
रहे हैं
कितना भी संभालू पर शिकस्त
ही मिल रही है ।
कुछ ऐसे तू चल रही है ।
कुछ सबक लिए हैं अपनों से
कुछ सबक टूटे सपनों से ।
अब किसी से ज्यादा उम्मीद
ना रखूंगी
जितना बनता है उतना ही झुकूंगी ।
अब हार ना मानूंगी , अब तुझे
संभालूँगी ।
हर चुनौती का सामना दृढ़ता
से करूंगी
” ज़िंदगी ” अब तुझे सरल मैं
करूंगी ।
साभार “शब्दों की सरिता” मंच

