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मेजर बलबीर सिंह ‘भसीन’ की जयंती पर साहित्य सम्मेलन एवं लघुकथा-गोष्ठी आयोजित!अत्यंत भावप्रवण कवि ,विद्वान ,आचार्य और आदर्श कुलपति थे मेजर बलबीर सिंह “भसीन”: डॉ अनिल सुलभ

पटना/बिहार 11अगस्त । प्रख्यात शिक्षाविद और साहित्यकार मेजर बलबीर सिंह ‘भसीन’ एक अत्यंत भाव-प्रवण कवि, मनोविज्ञान के विद्वान आचार्य और आदर्श कुलपति थे । उनकी ज़िंदादिली और निष्ठा अद्भुत थी। 84 वर्ष की आयु में भी वे पूरी तरह स्वस्थ थे और अपना सारा कार्य स्वयं कर लेते थे। वे पटनासिटी स्थित गुरुगोविंद सिंह महाविद्यालय में अनेक वर्षों तक प्राचार्य तथा मगध विश्वविद्यालय में प्रतिकुलपति और फिर प्रभारी कुलपति रहे। उनका कवि-हृदय सदैव अपने देश में एक सच्चे भारतीय की खोज में लगा रहा। ‘एक हिंदुस्तानी की खोज’ नामक उनकी कविता बहुत लोकप्रिय हुई थी।
यह बातें शुक्रवार को बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के ‘मेजर बलबीर सिंह ‘भसीन’ स्मृति-सभागार’ में आयोजित जयंती-समारोह और कवि-सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। उन्होंने कहा कि मेजर भसीन एक संवेदनशील कथाकार भी थे। उनकी आत्मा-कथा ‘एक सफ़र हिंदुस्तान से हिंदुस्तान तक’ विभाजन की पीड़ा का मार्मिक दस्तावेज है। पाकिस्तान के एक कस्बे से ज़िंदगी की रोमांचक लड़ाई जीत कर वो भारत आए थे। भारत-पाक विभाजन का कभी न भूलने वाला, भारतीय इतिहास का वह क्रूर अध्याय, मेजर भसीन की आत्म-कथा के हर एक पृष्ठ पर अंकित है।
डा सुलभ ने कहा कि उनकी काव्य-दृष्टि मानवतावादी थी, जिसका आश्रय अध्यात्म था। वे हृदय से आध्यात्मिक काव्य-पुरुष थे। वे उर्दू और पंजाबी में भी लिखा करते थे। ‘सिख मत’ नाम से उनकी एक पुस्तक उर्दू में प्रकाशित हुई थी, जो ‘सिख-दर्शन’ पर एक महत्त्वपूर्ण कृति मानी जाती है। पंजाबी में लिखी गई उनकी पुस्तक ‘मेरी कलम दी आतम हतया’ पर्याप्त चर्चा में रही। हाल ही में उनकी दो पुस्तकों, ‘एक सौ लघु कथाएँ’ तथा ‘जपजी साहिब और सुखमनी साहिब’ के हिन्दी पद्यानुवाद का लोकार्पण बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में किया गया था। साहित्य-सम्मेलन से उनका गहरा लगाव था और वे सम्मेलन के संरक्षक सदस्य भी थे।
सम्मेलन की कार्य समिति की सदस्य चंदा मिश्र की वाणी-वंदना से आरंभ हुए इस समारोह में सम्मेलन के उपाध्यक्ष डा शंकर प्रसाद, भारतीय प्रशासनिक सेवा के अवकाश प्राप्त अधिकारी बच्चा ठाकुर, सदानंद प्रसाद, डा पुष्पा जमुआर तथा तलत परवीन ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
इस अवसर पर आयोजित लघुकथा-गोष्ठी में, डा पूनम आनन्द ने ‘जुगाड़’, शीर्षक से, विभा रानी श्रीवास्तव ने ‘उधेड़बुन’, रौली कुमारी ने ‘यमराज’ कुमार अनुपम ने ‘थप्पड़’ तथा कुमारी स्मृति ‘कुमकुम’ ने ‘चायवाला’ शीर्षक से अपनी लघुकथा का पाठ किया। मंच का संचालन ब्रह्मानंद पाण्डेय ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन कृष्ण रंजन सिंह ने किया। सम्मेलन के प्रशासी पदाधिकारी सूबेदार नन्दन कुमार मीत, डा चंद्र शेखर आज़ाद, दिगम्बर जायसवाल, राहुल कुमार, डौली कुमारी, कुमारी मेनका, श्रीबाबू आदि प्रबुद्ध जन उपस्थित थे।

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