पटना/बिहार (राकेश मंगल सिन्हा) 31 जुलाई। पटना के बालकिशुनगंज स्थित एस आर पी कालेज मे महान साहित्यकार, लेखक, समालोचक तथा उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में डॉ राजेंद्र प्रसाद राय, प्राचार्य अजय कुमार, वरिष्ठ शिक्षक लक्ष्मण कुमार, डॉ रमाशंकर, डॉ नवनीत सिन्हा, डॉ वैद्यनाथ सिंह, बबीता सिंह, निशा वर्मा, अजीत, शशि, सुधीर, मोहित सहित बड़ी संख्या में छात्र एवं लोग उपस्थित थे। अध्यक्षता डॉ राजेंद्र प्रसाद राय और संचालन वरिष्ठ शिक्षक लक्ष्मण कुमार ने किया। इस अवसर पर वक्ताओं ने मुंशी प्रेमचंद के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए उनके विरासत को आगे बढ़ाने पर बल दिया। संचालन करते हुए वरिष्ठ शिक्षक लक्ष्मण कुमार ने कहा कि कायस्थ कुल के गौरव, हिंदी साहित्य जगत के सम्राट और कलम के सिपाही मुंशी प्रेमचंद का नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। साहित्य जगत में वे मुंशी प्रेमचंद के नाम से विख्यात हुए। उनका जन्म 31 जुलाई 1880 में हुआ था। मुंशी प्रेमचंद हिंदी और उर्दू के सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यासकार, विचारक और कहानीकार थे। उन्होंने सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, निर्मला, गबन, कर्मभूमि, गोदान आदि उपन्यास और कफन, पूस की रात, पंच परमेश्वर, बड़े घर की बेटी, बूढ़ी काकी, दो बैलों की कथा जैसी 300 से अधिक कहानियां लिखीं। उन्होंने अपने जमाने की लगभग सभी प्रमुख हिंदी और उर्दू पत्रिकाओं जमाना, सरस्वती, माधुरी आदि में भी लेखन कार्य किया। उन्होंने हिंदी समाचार पत्र जागरण और साहित्यिक पत्रिका हंस का संपादन और प्रकाशन भी किया। उन्होंने गांधीजी के आवाहन पर सरकारी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया था। उस समय वे गोरखपुर स्थित वर्तमान नॉर्मल स्कूल में उप विद्यालय निरीक्षक के पद पर पदस्थापित थे। मुंशी प्रेमचंद के साहित्य का लक्ष्य सामंती व्यवस्था और महाजनी सभ्यता से छुटकारा पाना था। वे आर्थिक गुलामी को मनुष्य की सबसे बड़ी त्रासदी मानते थे। उनका मानना था कि स्वतंत्रता संग्राम का लक्ष्य स्वराज और आजादी की प्राप्ति है लेकिन असली आजादी तभी मिलेगी जब देश का किसान,गरीब और मजदूर वर्ग आर्थिक गुलामी से मुक्त होगा।


