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प्रेमचंद की परंपरा और पत्रकारिता का वर्तमान विषय पर हुई परिचर्चा!आज की पत्रकारिता में अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का नैतिक साहस हुआ है कम।

आरा/भोजपुर 31 जुलाई। प्रलेस, जलेस और जसम, आरा-भोजपुर के संयुक्त तत्वावधान में प्रेमचंद जयंती मनाई गई। इस अवसर पर परिचर्चा का विषय था ‘प्रेमचंद की परंपरा और पत्रकारिता का वर्तमान’। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो.रवीन्द्र नाथ राय, कवि -आलोचक जितेंद्र कुमार तथा वरिष्ठ पत्रकार गुंजन ज्ञानेंद्र सिन्हा ने संयुक्त रूप से की।
अपने वक्तव्य में प्रो रवींद्र नाथ राय ने मीडिया में पैदा हुए व्यक्तिवाद और अफवाहों की उपस्थिति का विश्लेषण किया। उन्होंने प्रेमचंद के हवाले से कहा कि पत्रकारों को निर्भीक होना चाहिए। अंधविश्वास की बजाय वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देना चाहिए। राजेंद्र यादव को उन्होंने प्रेमचंद की परंपरा का निर्भीक और दृष्टा पत्रकार कहा।
वरिष्ठ साहित्यकार जितेंद्र कुमार जी ने निष्क्रिय चर्चा की अपेक्षा निष्कर्ष की तलाश पर बल दिया। उन्होंने सच्चाई की पक्षधरता को पत्रकारिता की सबसे बड़ी शक्ति कहा।
कवि-आलोचक सिद्धार्थ वल्लभ ने विषय प्रवर्तन करते हुए बताया कि प्रेमचंद की परंपरा साहस और प्रतिरोध की परंपरा है। आज की पत्रकारिता में तकनीकी उन्नति तो हुई है लेकिन सच के साथ, अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का नैतिक साहस कम हुआ है। वरिष्ठ पत्रकार गुंजन सिन्हा ने पत्रकारिता के संकट को संपादकों की रीढ़ से जोड़ा और कहा कि पत्रकारिता समाज में बदलाव का एक टूल है और यह रातोंरात होने वाली प्रक्रिया नहीं है। आज का मीडिया सच नहीं दिखा रहा है बल्कि दिखाने का छल कर रहा है। बतौर संचालक सुमन कुमार सिंह ने प्रेमचंद और उनकी सामयिक चुनौतियों के सहारे वर्तमान पत्रकारिता पर प्रकाश डाला। विद्यार्थियों में प्रीतम ने प्रेमचंद की महिला स्वतंत्रता से जुड़ी संवेदना को सेवासदन उपन्यास के माध्यम से रेखांकित किया। अनिरुद्ध ने पत्रकारिता में रंगभेद की गंभीर चर्चा की। रूपाली ने वर्तमान सोशल मीडिया के फौरी लोकप्रियता के फार्मूले की आलोचना की। नीलांबुज सरोज ने प्रेमचंद की वैचारिकी में सांप्रदायिकता के विरुद्ध दृष्टि की ओर ध्यान दिलाया और वर्तमान पत्रकारिता में उसकी राजनीतिक उपस्थिति को रेखांकित किया। कवि ओमप्रकाश मिश्र ने प्रेमचंद के *महाजनी सभ्यता* नामक निबंध के जरिए वर्तमान पूंजीवादी समाज में हो रही पत्रकारिता की आलोचना की। राष्ट्रभक्ति की संकीर्ण होती जा रही परिभाषा को उन्होंने दुर्भाग्यपूर्ण बताया। सृजनलोक के संपादक- कवि संतोष श्रेयांस ने पत्रकारिता के क्षरण को नैतिक व सामाजिक अवमूल्यन से जोड़कर देखने की कोशिश की ।
कार्यक्रम में शिक्षिका तनुजा कुमारी, ममता दीप, प्रो. किरण कुमारी, के अलावा विद्यार्थियों में रिंकी सोनी, खुशबू स्पृहा , आनंद, सौरभ, रूपाली, धनंजय, अनिरुद्ध, प्रीतम , विजय कुमार भारती और कुमार गौरव सहित विभिन्न लोगों ने भी अपने-अपने विचार प्रकट किए। कार्यक्रम में आये लोगों का धन्यवाद ज्ञापन कवि जनार्दन मिश्र ने किया।

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