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‘अक्षरा’ साहित्य महोत्सव : भारतीय साहित्येतिहास में नारी स्वरों की पुनर्प्रतिष्ठा

कोलकाता/पश्चिम बंगाल(मनोज कुमार प्रसाद)11 जून।’अक्षरा’, साहित्य में महिलाओं की भूमिका पर केंद्रित एक विशेष साहित्यिक कार्यक्रम का आयोजन तोषाली लिटरेचर सोसाइटी द्वारा भुवनेश्वर में किया गया। कार्यक्रम का संयोजन पूर्व आईएएस अधिकारी प्रदीप बिस्वाल और प्रख्यात साहित्यिक परेश पटनायक ने किया, जिसमें प्रतिष्ठित विद्वान, लेखक और सांस्कृतिक चिंतक एक मंच पर एकत्र हुए।
साहित्य महोत्सव का उद्घाटन पूर्व राज्य सूचना आयुक्त परमिता सत्पथी ने किया, जिन्होंने नैतिक सार्वजनिक विमर्श को आकार देने में साहित्य की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया। मुख्य वक्तव्य रानू उनियाल ने दिया, जिन्होंने भारतीय साहित्य के इतिहास-लेखन पर एक सूक्ष्म और विचारोत्तेजक व्याख्यान प्रस्तुत किया, जिसमें विशेष रूप से महिला लेखन और मानक आख्यानों में उनके हाशियाकरण पर जोर दिया गया।
महोत्सव की मुख्य अतिथि हिंदी विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल की कुलपति एवं इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय में अंग्रेजी की प्रोफेसर, प्रो. नंदिनी साहू ने समकालीन समय में साहित्य की सामाजिक प्रासंगिकता पर एक विद्वतापूर्ण और सहज संबोधन दिया। उनके वक्तव्य ने जेंडर स्टडीज़ को विमेंस स्टडीज़, मैस्कुलिनिटी स्टडीज़, क्वीयर स्टडीज़, भारतीय ज्ञान परंपरा, अनुवाद में भारतीय साहित्य, विश्व साहित्य, लोक परंपराओं, साक्षी साहित्य, सांस्कृतिक अध्ययन, पाठ्यक्रम निर्माण और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) से प्रभावशाली ढंग से जोड़ा तथा भारत में साहित्यिक अध्ययन के अंतःविषयक भविष्य की ओर संकेत किया।
कार्यक्रम का एक प्रमुख आकर्षण प्रदीप बिस्वाल, परेश पटनायक और नमिता रानी पांडा द्वारा संपादित ‘तोशाली एंथोलॉजी ऑफ लव पोएम्स’ का लोकार्पण रहा, जिसे श्रोताओं ने बड़े उत्साह के साथ सराहा।
महोत्सव में प्रमुख रूप से ओडिया लेखिकाओं द्वारा सारगर्भित विचार-विमर्श भी प्रस्तुत किया गया, जिनमें विजयलक्ष्मी रथ, सरोजिनी साहू, चिरश्री इंद्रसिंह, प्रज्ञा प्रवर्तिका दाश, जयंती रथ, चिन्मयी नंदा, अपर्णा मोहंती, स्नेहप्रभा दास, नमिता लक्ष्मी जगदेव, संघमित्रा भांजा, महुआ सेन, प्रवासिनी महाकुड़, लोपामुद्रा मिश्रा और सरिता प्रुष्टी शामिल थीं।
‘अक्षरा’ एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और अकादमिक हस्तक्षेप रहा, जिसने महिला साहित्यिक योगदानों पर विमर्श किया और समाज में साहित्य की परिवर्तनकारी भूमिका की पुनः पुष्टि की।
कार्यक्रम में भाग लेने वाले कुछ अन्य प्रतिष्ठित प्रतिभागियों में डॉ. गौरहरि दास, प्रो. गोपा रंजन मिश्रा, भास्कर परिच्छा, दीपक सानंत्राय आदि शामिल थे।

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