लगता है कि चले गए,
लेकिन नहीं…
छोड़ गए हैं—
जीवन की अनगिन स्मृतियाँ,
अपने कर्मों की अमूल्य कृतियाँ,
अव्यक्त भावनाओं की विरासत,
और अधूरे सपनों को
पूरा करने की जिम्मेदारी
दिमाग में भर गये
लगता है कि चले गए,
लेकिन नहीं…
समझना होगा
उनकी विरासत को,
अधूरे कार्यों को,
खिलाड़ियों के जज़्बे को,
कैंट और वैश्य समाज की भावनाओं को,
विभिन्न संगठनों में उनके योगदान को,
सेवा और समर्पण के भाव को,
जो वे अपने वारिसों और समाज को
सौंप गए।
लगता है कि चले गए,
लेकिन नहीं…
सुनना होगा
उनकी अमिट वाणी को,
उनके चर्चित व्यक्तित्व को,
समाजसेवी चरित्र को,
व्यवसायियों की आवाज़ को,
रामलीला की पावन परंपरा को,
कृष्णलीला के गौरवशाली इतिहास को,
युवाओं की शक्ति को,
हनुमान जी के प्रति उनकी अटूट भक्ति को,
जिनसे वे सबको सदा के लिए जोड़ गए।
लगता है कि चले गए,
लेकिन नहीं…
एक ऐसी शख्सियत,
जिसने मन, वचन और कर्म से
हर वादा निभा दिया।
जिन्होंने सिखाया कि जीवन
केवल अपने लिए जीने का नाम नहीं,
बल्कि सेवा, परोपकार और समर्पण से
समाज का हृदय जीतने का नाम है।
वे प्रेम का पाठ पढ़ा गए
लगता है कि चले गए,
लेकिन नहीं…
धार्मिक क्षेत्र हो या राजनीति का सफर,
खेल का मैदान हो या चिकित्सा का डगर,
बच्चों में जागृति हो या युवाओं का सहयोग,
वे न झुके, न रुके,
सदैव निडर होकर खड़े रहे।
वे जीवन का रास्ता दिखा गए…
लगता है कि चले गए,
लेकिन नहीं…
सेवा से प्रेम और प्रेम से पंकज खिलाया,
जनता की सद्भावना ने
“ललन” को “प्रेम पंकज” बनाया।
अपने सद्कर्मों से भोजपुर की पहचान बने,
समय और इतिहास बदलकर
माटी की शान बने।
वे प्रेम और मानवता का संदेश सुना गए…
लगता है कि चले गए,
लेकिन नहीं…
छोड़ गए हैं
अपनी अमिट स्मृतियाँ,
अपनी सारस्वत पहचान,
और समाजसेवा की वह ज्योति
जो आने वाली पीढ़ियों को
सदैव प्रेरित करती रहेगी।


