
राष्ट्रीय बचत
है काल चक्र, ये पलटा खाता, निर्धन को धनवान, धनी को निर्धन तक बनवाता ।
इसीलिए तो पैसे की अंगड़ाई को, कुछ सिमिट-सिमिट कर रखना है; बुरे दिनों कुछ काम जो आये, बचा-बचा कर रखना है।
कभी न समझें बचत मात्र, कंजूसी से होता है; जो कंजूसी करता हरदम बरवस ही वह रोता है।
है जन्म बचत का हुआ जहाँ से, देते हैं उससे हम जोड़; खाये खर्चे जो बचे, तो जोड़िये करोड़ ।
इस लक्ष्य करोड़ को सामने रखकर, बस बचत किये ही जाना है; बुँद-बुँद से सागर है भरता, इस विधि को ही अपनाना है।
धन तो धरती का गौरव है, तो इसको धरती में नहीं गाड़े; बचत राष्ट्र का गौरव है, इसे अपव्य में नहीं मोड़े।
खाये खर्चे बाद अपव्य से जितना बच जाय, इसी का नाम बचत है;
इस मूल आधार को समझे, यही अपना बचत है, यही राष्ट्रीय बचत है।
चारवाक से दूर रहकर, कौटिल्य को अपनाये, उधार की आशा छोड़, राष्ट्रीय बचत अपनायें।
उड़कर तितली को पत्र-पेटी पर आने दो, बचत के पराग कणों को, बक्से में टपक जाने दो।

(उक्त कविता ख्यातिप्राप्त लेखक,कवि,व्यंग्यकार,समीक्षक, अनुवादक “डॉ कृष्ण दयाल सिंह”जो एक अवकाश प्राप्त डाक सेवा अधिकारी भी है, उनके साहित्य काल के शुरूआती दौर में 09 फरवरी 1998 को प्रकाशित की गई कविता संग्रह पुस्तक “यत्र-तत्र”से ली गई है और यह कवि की उक्त संग्रह की पैतालीसवी रचना है। RKTV NEWS नित्य इनके संग्रहित पुस्तक से क्रमवार एक एक रचना प्रकाशित करेगी। इनकी कई रचनाएं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रहती है साथ ही इनके दर्जनों पुस्तक भी प्रकाशित हो चुके है, वर्तमान में बिहार राज्य के भोजपुर जिला अंतर्गत आरा के वशिष्ठपुरी में निवास करते है। सुझाव और संपर्क हेतु: 9570805395)
