
ई० डी० कर्मचारी
अगर नहीं मैं ई० डी० होता, फिर तो ए० बी०, सी० डी० होता; मिहनता करता और जरा तो, हो सकता था डी० जी० होता।
छायी है एक घोर निराशा, दिखता नहीं तनिक भर आशा; जाते हैं हरदम बतलाये, और न घटती तनिक आशा।
मिलता नहीं है मुझको वेतन, भत्ते पर हैं काम चलाते; वार्षिक वृद्धि यहाँ नहीं है, मंहगी भत्ते पर ही हमें लुभाते।
मिलता उन्हें कमिशन से है, पर मिलता मुझे कमिटि से; मिलता मुझे क्या खाक, सोच है उनका घिसीपिटी जो।
दिन पर दिन हुआ मजबूर,. किये नहीं कुछ भी साबुर; नामों का परिवार नियोजन करके, बोले, अब तो मंजिल नहीं है दूर।
यह देश है गाँव देहातों का, जहाँ सौ मैं सत्तर रहते हैं; सत्तर की सेवा हम करते, फिर भी हम क्यों मरते हैं।
राज सुख जो भोग रहे हैं, शीत-ताप नियंत्रित घर में; उन पर भूत है चढ़ा मशीन का, कहते हैं देंगे घर-घर में।
है एक भूत ने पकड़ा मुझको, जकड़ लिया है जबड़ों में; सायकिल रोटी लगा है खाने, मुझे बताओ जबड़ों से।
सब करते हैं सैर-सपाटे, छुट्ठी लेकर पैसा लेकर; मैं जाता हूँ छुट्ठी पर बस, एक सखा को बंधक देकर ।
सीता का अपहरण हुआ था, जब पार किया था लक्ष्मण रेखा; हुआ हरण मेरे सेवा का, जब पार हुई छुट्टी की छमाही रेखा ।
रेखा के अंदर भी रेखा, अंदर में तीन माही रेखा; मिठी जगह ये अंदर वाली, शायद नहीं है सबने देखा ।
हरण नहीं, अपहरण नहीं, बस ये खाती है पिछली सेवा; राशि अनुग्रह को चट करती, कहती, कहाँ है तेरी पिछली सेवा।
वर्दी, चप्पल हमें न मिलता, धूप, जाड़ा, बरसात में; काम चलाने को बस मिलता, छाता और जल मात्र से।
होता काम है घंटों पर, पर भत्ता मिलता अंकों पर; यां शिखर बिन्दु पहले चालीस का, अब मिलता है अस्सी अंकों पर।
प्रदूषण के नाम पर, इम्तहान में हर बार ही छाने जाते; काश ! मंसूरी हम भी जाते, कभी न फिर-फिर छाने जाते।
बन्दुक की नाली से सुना है, न्याय निकलती थी; देखे तलवार की धार से, झाकती न्याय निकल पाती है।
तो मित्रों का नाम लेंगे, काम का दाम लेंगे; अन्याय पर लगाम देंगे, संघ को सलाम देंगे।
अपनी इस आवाज को, संसद तक पहुँचायेंगे; अपने बल पर, अपना हक, अब लेकर के दिखलायेंगे ।
कोई मास्टर हो रहा निछावर, मेरे झंडे को लहराने को; हम भी तत्पर हो रहे हैं अब तो, हर अपनी ही हक पाने को।
अमर रहे यह संघ, और एकता अमर रहे; दादा घोष तो अमर रहें, संघ सदा ही अमर रहे।

(उक्त कविता ख्यातिप्राप्त लेखक,कवि,व्यंग्यकार,समीक्षक, अनुवादक “डॉ कृष्ण दयाल सिंह”जो एक अवकाश प्राप्त डाक सेवा अधिकारी भी है, उनके साहित्य काल के शुरूआती दौर में 09 फरवरी 1998 को प्रकाशित की गई कविता संग्रह पुस्तक “यत्र-तत्र”से ली गई है और यह कवि की उक्त संग्रह की तेतालीसवीं रचना है। RKTV NEWS नित्य इनके संग्रहित पुस्तक से क्रमवार एक एक रचना प्रकाशित करेगी। इनकी कई रचनाएं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रहती है साथ ही इनके दर्जनों पुस्तक भी प्रकाशित हो चुके है, वर्तमान में बिहार राज्य के भोजपुर जिला अंतर्गत आरा के वशिष्ठपुरी में निवास करते है। सुझाव और संपर्क हेतु: 9570805395)
