कविताई संस्था का भव्य होली मिलन समारोह संपन्न।

हास्य कवियों ने श्रोताओं को खूब गुदगुदाया।
आरा/भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)01 मार्च। होली के अवसर पर साहित्यिक संस्था कविताई- नवसृजन की धारा के बैनर तले चंदवा मोड़ स्थित रेनबो किड्स प्ले स्कूल में ‘कविताई फगुआ’ होली मिलन समारोह का आयोजन किया गया।
आयोजन की शुरुआत साहित्यकार प्रोफेसर बलिराज ठाकुर, प्रो नंदजी दूबे, पूर्व विधायक सिद्धनाथ राय, वरिष्ठ कवि जनार्दन मिश्र, संतोष श्रेयांश, डॉ विजय गुप्ता, डॉ कुणाल, डॉ नीलेश सिंह, डॉ जितेंद्र शुक्ल, वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद वात्स्यायन, कौशल कुमार एवं संजय शाश्वत ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया।
जिसके बाद गायिका आकांक्षा ओझा ने माँ सरस्वती की वंदना सुनाई। इसके बाद सभी आगत अतिथियों ने माँ सरस्वती को पुष्प अर्पित किया और सभी ने एकदूसरे को अबीर- गुलाल लगाया।
कविताई फगुआ के इस कार्यक्रम में विशुद्ध व पारम्परिक फगुआ गवनई हुई। दियरा क्षेत्र से आए हुए पारंपरिक गंवई गवनई के व्यास सिताराम यादव, नाल वादक ललितमोहन ओझा, नंदकुमार यादव, मदन मोहन पांडेय, गुड्डु ओझा, मदन पंडित, मनोज ठाकुर, हीराकांत ओझा, उमाकांत ओझा, राकेश ओझा, व अश्विनी पांडेय ने खूब जमकर फगुआ गायन किया। इस दौरान बंगला में उड़े ला अबीर… आज खेले होरी.. समेत कई फगुआ गीतों पर आयोजन में आए सभी लोग सुर मिलाते व झूमते नज़र आए।
बीच – बीच में हास्य एवं प्रेम की कविताओं ने भी श्रोताओं को आनंदित किया। एक तरफ वरिष्ठ कवि जनार्दन मिश्र, मधुलिका सिन्हा, जयमंगल मिश्र, दीपक सिंह निकुंभ, विकास पांडेय एवं चंदन सिंह ने प्रेम एवं श्रृंगार की कविताएं पढ़ीं, वहीं नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ नीलेश सिंह, राकेश गुड्डू ओझा एवं रूपेन्द्र मिश्र ने अपनी कविताओं से सबको ख़ूब हंसाया।
सभी को सम्मानित करते हुए पूर्व विधायक सिद्धनाथ राय ने कहा कि साहित्य की यह जिम्मेदारी है कि वह पुरानी पारंपरिक विधा को संजोए। कविताई संस्था यह काम बख़ूबी कर रही है। फगुआ गवनई ने झुमाया तो कवियों ने भी ख़ूब हंसाया। साहित्यकार प्रोफेसर नन्दजी दूबे ने कहा कि आजकल फगुआ की यह गायन शैली कहां नज़र आती है। नई पीढ़ी बस फिल्मी गानों के पीछे भाग रही। होली के नाम पर भौंडापन ज्यादा नज़र आता है। प्रो बलिराज ठाकुर ने कहा कि फगुआ सुनते हुए मैं अपने गांव की यादों में चला गया था। पारंपरिक गवनई सुनने का अलग हीं आनंद है।
वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद वात्स्यायन ने बताया कि वर्तमान पीढ़ी फगुआ व चईता गायन की पारंपरिक शैली से वाकिफ नहीं हो पा रही है। ऐसा आयोजन इस पीढ़ी के लिए जरूरी है। प्रो दिनेश प्रसाद सिन्हा ने कहा कि फगुआ गायन और कविताएँ दोनों बहुत अच्छी हुई। पहली बार ऐसा संगम देखने को मिला। यही सच्ची साहित्य की सेवा है।
संस्था की अध्यक्षा मधुलिका सिन्हा ने कहा कि यह आयोजन साहित्य और पारंपरिक गवनई को समायोजित कर किया गया। जो पुराने परम्परागत फगुआ गीत है वो लोग भूलते जा रहे है। इसीलिए हमलोगों ने उस गवनई को कराया। पूर्व निगम पार्षद सह समाजसेवी एवं संस्था के उपाध्यक्ष जीतेन्द्र शुक्ल ने बताया कि ऐसे कार्यक्रम हमारी पीढ़ियों को जोड़ते है और शिक्षा देते है। प्यार के त्यौहार होली में ऐसे आयोजन ज़रूरी है।
आयोजन में डॉ विजय गुप्ता, डॉ नीलेश सिंह, डॉ कुणाल कुमार, संरक्षक कौशल कुमार भी फ़गुआ में सुर मिलाते हुए झूमते रहे।
कार्यक्रम का संचालन रूपेन्द्र मिश्र एवं धन्यवाद ज्ञापन आशीष उपाध्याय ने किया। कार्यक्रम को सफल बनाने में शुभिका अंजलि, वामिका कौशल, आद्रिका कौशल, अभिषेक वात्स्यायन, राज का योगदान सराहनीय रहा।
इस दौरान वरिष्ठ कवि जनार्दन मिश्र, सृजनलोक के संपादक संतोष श्रेयांश, वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद वात्स्यायन, डॉ हरेंद्र ओझा, कौशल कुमार, संजय शाश्वत, कृष्णा यादव कृष्नेंदु, शशिकला दीक्षित, विकास सिंह, राहुल कुमार सिन्हा, विकास पांडेय, जयमंगल, दीपक सिंह निकुम्भ, दीपक पांडे, मनोज ओझा, राजू मिश्र, सन्नी पांडे, अर्पित शुक्ल, मनोज मिश्रा समेत कई लोग उपस्थित रहे।

