साहित्य सम्मेलन में जयंती पर श्रद्धापूर्वक किए गए स्मरण।
RKTV NEWS/पटना(बिहार)05 जून। प्रकृति के मुग्धकारी रूप और सुषमा को काव्य में पिरोनेवाले कृतात्मा कवि थे कलक्टर सिंह ‘केसरी’। वे पिछली पीढ़ी के एक ऐसे कवि और विद्वान आचार्य हैं जिन्हें ‘प्रकृति-राग’ का अमर गायक माना जाता है। आधुनिक हिन्दी के काव्य-इतिहास में केसरी जी छायावाद और उत्तर-छायावाद के मिलन-बिन्दु हैं। उनके मनोहारी काव्य में, इन दोनों ही युगों की मधुरतम झंकार सुनाई देती है। वे एक सम्मोहक कवि ही नही, एक महान शिक्षाविद, साहित्यिक-सांस्कृतिक महोत्सवों के यशस्वी संयोजक-आयोजक और हिन्दी भाषा और साहित्य के कीर्तिशेष उन्नायक भी थे।
यह बातें शुक्रवार को बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में आयोजित जयंती एवं कवि-सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन-अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। उन्होंने कहा कि केसरी जी ने समस्तीपुर महाविद्यालय के संस्थापक-प्राचार्य और विश्वविद्यालय सेवा आयोग के सदस्य और फिर अध्यक्ष के रूप में अपनी प्रशासकीय निपुणता का भी परिचय दिया। बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के भी दो बार अध्यक्ष निर्वाचित हुए। वे सच्चे अर्थों में हिन्दी साहित्य के विशाल मंदिर के दिप्तिमान ‘स्वर्ण-कलश’ हैं, जिन पर बिहार को सदा गौरव रहेगा।
राँची विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो जंग बहादुर पाण्डेय ने कहा कि केसरी जी का साहित्यिक और शैक्षणिक अवदान अविस्मरणीय है। उनके छंदोबद्ध मर्म-स्पर्शी गीत नए कवियों के मार्ग-दर्शक हैं।
वरिष्ठ साहित्यकार प्रो सुनील कुमार उपाध्याय, सदानन्द प्रसाद, बाँके बिहारी साव, डा रणजीत कुमार, इंदु भूषण सहाय, चंदा मिश्र, सुनीता रंजन, प्रवीर कुमार पंकज, मनोज रंजन कुमार आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

