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पटना:वज्रपात एवं डूबने से होने वाली मृत्यु की रोकथाम हेतु राज्यस्तरीय कार्यशाला का सफल आयोजन।

राहत से आगे बढ़कर रोकथाम की ओर: जीवन बचाने के संकल्प के साथ राज्यस्तरीय मंथन”

“पंचायत से राज्य स्तर तक एकजुट पहल: वज्रपात एवं डूबने की घटनाओं को रोकने का सामूहिक संकल्प”

RKTV NEWS/पटना(बिहार )20 फरवरी। बिहार राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण द्वारा “वज्रपात एवं डूबने से होने वाली मृत्यु की रोकथाम” विषय पर एक दिवसीय राज्यस्तरीय कार्यशाला का आयोजन ज्ञान भवन, पटना में किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन एवं स्वागत संबोधन के साथ हुआ। उद्घाटन सत्र में सदस्य पी. एन. राय, नरेंद्र कुमार सिंह, प्रकाश कुमार, सचिव मो. वारिस खान तथा पूर्वी चंपारण के जिलाधिकारी सौरव जारवाल सहित आपदा प्रबंधन विभाग एवं प्राधिकरण के वरिष्ठ पदाधिकारी उपस्थित रहे। साथ ही विभिन्न जिलों से आए अपर समाहर्ता, सहायक आपदा प्रबंधन पदाधिकारी, अंचलाधिकारी, मुखिया प्रतिनिधियों, सामुदायिक स्वयंसेवकों एवं सुरक्षित तैराकी कार्यक्रम के मास्टर ट्रेनर्स ने भी सहभागिता की।
कार्यक्रम दो सत्रों में आयोजित किया गया। प्रथम सत्र की अध्यक्षता जिलाधिकारी सौरव जोरवाल ने की, जिसमें पूर्वी चंपारण जिला में डूबने से बचाव हेतु किए जा रहे प्रयासों एवं भावी संभावनाओं पर विस्तृत मंथन हुआ। द्वितीय सत्र की अध्यक्षता आपदा प्रबंधन विभाग के संयुक्त सचिव मो. नदीमुल ग़फ़्फ़ार सिद्दीकी ने की। इस सत्र में गया जिला से संबंधित वज्रपात से बचाव के उपायों, चुनौतियों एवं भविष्य की रणनीतियों पर विस्तार से चर्चा की गई।
इस अवसर पर राज्य के सभी जिलों से आए प्रतिनिधियों जिनमें अपर समाहर्ता, सहायक आपदा प्रबंधन पदाधिकारी, अंचलाधिकारी एवं मुखिया प्रतिनिधियों ने अपने-अपने क्षेत्रों की समस्याओं, अनुभवों एवं सुझावों को साझा किया, जिस पर व्यापक विचार-विमर्श किया गया। सभी वक्ताओं ने वज्रपात एवं डूबने की बढ़ती घटनाओं पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए इन्हें रोकथाम हेतु व्यवहार परिवर्तन, जनजागरूकता और संस्थागत तैयारी पर बल दिया गया।

वज्रपात: जागरूकता और तैयारी का विषय

वक्ताओं ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि वज्रपात से होने वाली अधिकांश मृत्यु समय रहते चेतावनी, सुरक्षित व्यवहार तथा सामुदायिक जागरूकता के माध्यम से रोकी जा सकती है। राज्य स्तर पर पूर्व चेतावनी प्रणाली , मोबाइल ऐप, एसएमएस अलर्ट तथा पंचायत स्तर तक सूचना प्रसार तंत्र को और सुदृढ़ करने पर बल दिया गया। कृषि कार्य में संलग्न किसान, खुले क्षेत्रों में कार्यरत श्रमिक तथा विद्यालयी बच्चों को लक्षित कर विशेष जागरूकता अभियान चलाने की आवश्यकता रेखांकित की गई।

डूबने की घटना: एक मौन त्रासदी, जिसे रोकना संभव

तकनीकी सत्र में प्रस्तुत आँकड़ों से स्पष्ट हुआ कि डूबने की घटनाओं में बच्चों एवं युवाओं की संख्या अत्यंत चिंताजनक है। यह समस्या केवल बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों तक सीमित नहीं, बल्कि गड्ढों, नहरों, तालाबों तथा अनियंत्रित नाव संचालन से भी जुड़ी हुई है।

प्रमुख सुझाव

• खतरनाक जलाशयों का जोखिम मानचित्रण।
• चेतावनी बोर्ड एवं बैरिकेडिंग की अनिवार्यता।
• नावों का अनिवार्य पंजीकरण।
• विद्यालयों में तैराकी एवं प्राथमिक बचाव (सीपीआर) प्रशिक्षण का संस्थागत समावेशन।

विशेषज्ञों ने बल दिया कि केवल तैरना जानना पर्याप्त नहीं, बल्कि सुरक्षित बचाव तकनीक एवं सीपीआर प्रशिक्षण का व्यापक प्रसार आवश्यक है।

पंचायतों की केंद्रीय भूमिका

कार्यशाला में सर्वसम्मति से यह विचार उभरा कि ग्राम पंचायत स्तर पर सशक्त हस्तक्षेप के बिना इन आपदाओं पर प्रभावी नियंत्रण संभव नहीं है। पंचायतों को वित्तीय एवं तकनीकी संसाधनों से सशक्त कर स्थानीय जोखिम आधारित कार्ययोजना तैयार करने का प्रस्ताव रखा गया।

संसाधन उपलब्ध, प्रभावी उपयोग आवश्यक

राज्य आपदा शमन कोष एवं राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष के अंतर्गत उपलब्ध वित्तीय संसाधनों के प्रभावी उपयोग पर विशेष बल दिया गया।

प्राथमिकता के प्रमुख क्षेत्र निम्न निर्धारित किए गए

क्षमता निर्माण

• जनजागरूकता

• संरचनात्मक सुरक्षा उपाय
• प्रशिक्षण एवं मॉक ड्रिल

प्राधिकार सदस्य पी. एन. राय ने कहा कि वज्रपात एवं डूबने की घटनाओं की रोकथाम हेतु पंचायत स्तर तक ठोस हस्तक्षेप आवश्यक है। चेतावनी तंत्र सक्रिय होने के बावजूद घटना का हो जाना हमारे समक्ष व्यवहार परिवर्तन की चुनौती को दर्शाता है। उन्होंने पंचायतों को विशेष दायित्व एवं वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराने की दिशा में चल रहे प्रयासों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि डूबने की घटनाओं में लगभग 70 प्रतिशत पीड़ित बच्चों का होना अत्यंत चिंताजनक है। अतः विद्यालय-आधारित प्रशिक्षण, जोखिम मानचित्रण एवं संरचनात्मक सुरक्षा उपायों को प्राथमिकता दिए जाने जाने एवं वर्ष 2026–2030 के लिए दीर्घकालिक रणनीति बनाकर सतत प्रयास करने का आह्वान किया।
सदस्य नरेंद्र कुमार सिंह ने कहा कि पंचायत से राज्य स्तर तक के प्रतिनिधियों का एक मंच पर एकत्र होना अत्यंत सकारात्मक पहल है। आपदा प्रबंधन की अवधारणा 2005 के बाद राहत-केंद्रित दृष्टिकोण से आगे बढ़कर समग्र प्रबंधन में परिवर्तित हुई है, फिर भी वज्रपात एवं डूबने से होने वाली मृत्यु चिंताजनक है। उन्होंने नावों के अनिवार्य पंजीकरण, क्षमता अनुरूप संचालन तथा अनुदान भुगतान प्रक्रिया को सरल एवं समयबद्ध बनाने पर बल दिया तथा ग्राम स्तर तक प्रभावी जनजागरूकता को सबसे बड़ी आवश्यकता बताया।सदस्य शंभू दत्त झा ने कहा कि प्राकृतिक आपदाएँ पूर्णतः रोकी नहीं जा सकतीं, परंतु सुरक्षा उपायों से जनहानि अवश्य कम की जा सकती है। उन्होंने पूर्व तैयारी (Proactive Approach) को आपदा प्रबंधन की सफलता की कुंजी बताया।
समापन सत्र में वर्ष 2026 से आगे दीर्घकालिक रणनीति के अंतर्गत जिला एवं पंचायत स्तर पर विशेष कार्ययोजना तैयार करने का संकल्प लिया गया। लक्ष्य केवल राहत प्रदान करना नहीं, बल्कि “जीवन बचाने की संस्कृति” विकसित करना है।

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