दीपावली
भले किसी के लिए क्यों न हो
वैभव-प्रदर्शन का यह उत्सव,
सच में तो है यह दीपावली
एक राष्ट्रीय त्योहार प्रकाश पर्व।
चहुंओर दीपों से जगमगा उठा है
हमारा विशाल यह भारत देश,
एक ज्योति नवीन आभा-प्रभा लेकर
नव उमंग तरंग संग आया नूतन वर्ष।
अमावस्या की काली रात अंधेरी
मानव-मन-कालुष्य मिटाने का दिन,
पूर्वजों ने दिया एक अनुपम उपहार
शक्ति सरस्वती साथ लक्ष्मी पूजा का विधान।
तब तक लक्ष्मी का कोई मूल्य नहीं
जब तक श्रम-शक्ति से उपार्जित न हो,
धन वह केवल मिट्टी का ढेला है
करने वाला प्राण-स्पंदित ज्ञान-संचालित न हो।
यथार्थ लक्ष्मी-दर्शन होता खेत-खलिहानों में
अनंत गुण-शक्ति विकसित दिखे प्रत्येक कणों में,
हो पल्लवित पुष्पित फलित ग्राम्य उद्यानों में
हो उपयोग राष्ट्र समृद्धि जन कल्याणों में।
बना रहे भले श्री के साथ शक्ति का योग
ज्ञानहीन साधना व श्रम निष्फल हो जाते हैं,
प्रत्यक्ष है ज्ञान श्री का संचालक होता है
श्री शक्ति सरस्वती के अर्चन जीवन में चार चांद लगा देते हैं।
दीपावली के दिन हर झोपड़ी महलों में
मिट्टी के तन-दीप में हृदय-स्नेह जलता है,
जिंदगी की वर्तिका जगमग कर उठती है
‘लाभ ‘ कर्म भक्ति ज्ञान का संगम फूट पड़ता है।
रचनाकार:डॉ परमानन्द लाभ ,समस्तीपुर

