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आजमगढ़:”कोदंड” सिद्ध मंत्रों से अभिमंत्रित धनुष,राम की शक्ति एवं आत्मविश्वास का प्रतीक है:प्रमुख समाजसेवी एवं अंतर्राष्ट्रीय संयोजक अरविंद चित्रांश

RKTV NEWS/आजमगढ़ (उत्तर प्रदेश)19 अक्टूबर । कोदंड सिद्ध मंत्रों से अभिमंत्रित धनुष,रामराज्य की स्थापना,धर्म, न्याय,सेवा,शक्ति एवं आत्मविश्वास का प्रतीक है।
लक्ष्य इंटरनेशनल के राष्ट्रीय अध्यक्ष दिल्ली के एल० के० आनंद ने आजमगढ़ निवासी,गौरवशाली पूर्वांचल के प्रधान संपादक एवं प्रभारी,अंतरराष्ट्रीय भोजपुरी संगम भारत के अंतरराष्ट्रीय ऑर्गेनाइजर एवं प्रमुख समाजसेवी अरविंद श्रीवास्तव “चित्रांश” को शक्ति,सेवा और आत्मविश्वास का प्रतीक राम की शक्ति कोदंड धनुष द्वारा सम्मान करते हुए कहा कि सिद्ध मंत्रों से अभिमंत्रित,राम की शक्ति एवं आत्मविश्वास का प्रतीक कोदंड धनुष- धर्म की रक्षा करने की क्षमता और सत्य के प्रतीक के रूप में कार्य करता था। यह धनुष केवल एक हथियार नहीं था, बल्कि यह राम के शासन और न्याय के सिद्धांतों का प्रतिनिधित्व करता था।
पूर्वांचल के प्रमुख समाजसेवी एवं लोककला संरक्षक अरविंद चित्रांश ने कहा कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोदंड महोत्सव और हर घरों में शक्ति,सेवा और आत्मविश्वास का प्रतीक कोदंड का एक प्रतीकात्मक चित्र रहना चाहिए,जिससे सकारात्मक ऊर्जा प्रदान होगी। बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि भगवान राम के धनुष का नाम कोदंड था इसीलिए प्रभु श्रीराम को कोदंड कहा जाता था। कोदंड एक चमत्कारिक धनुष था जिसे हर कोई धारण नहीं कर सकता था। कोदंड नाम से भिलाई में एक राम मंदिर भी है जिसे ‘कोदंड रामालयम मंदिर’कहा जाता है।

देखि राम रिपु दल चलि आवा।
बिहसी कठिन कोदण्ड चढ़ावा।।

अर्थात शत्रुओं की सेना को निकट आते देखकर श्रीरामचंद्रजी ने हंसकर कठिन धनुष कोदंड को चढ़ाया।

।।सीता चरण चोंच हतिभागा। मूढ़ मंद मति कारन कागा।।
।।चला रुधिर रघुनायक जाना। सीक धनुष सायक संधाना।।
वह मूढ़ मंदबुद्धि जयंत कौवे के रूप में सीताजी के चरणों में चोंच मारकर भाग गया। जब रक्त बह चला तो रघुनाथजी ने जाना और धनुष पर तीर चढ़ाकर संधान किया। अब तो जयंत जान बचाने के लिए वह अपना असली रूप धरकर पिता इन्द्र के पास गया, पर इन्द्र ने भी उसे श्रीराम का विरोधी जानकर अपने पास नहीं रखा। तब नारदजी ने जयंत को भयभीत और व्याकुल देखा तो उन्होंने कहा कि अब तो तुम्हें इस बाण से प्रभु श्रीराम ही बचा सकते हैं। तब जयंत ने पुकारकर कहा- हे शरणागत के हितकारी, मेरी रक्षा कीजिए प्रभु श्रीराम*
लंका चढ़ाई के दौरान समुद्र द्वारा रास्ता ना देने पर श्रीराम ने कहा कि-
विनय न मानत जलधि जड़, गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब, भय बिनु होइ न प्रीति।।
लंका चढ़ाई के समय श्रीराम ने विनयपूर्वक समुद्र से मार्ग देने की गुहार लगाई। समुद्र से आग्रह करते हुए श्रीराम को तीन दिन बीत गए। लेकिन समुद्र का उस पर कोई प्रभाव नहीं हुआ, तब भगवान राम समझ गए कि अब अपनी शक्ति से उसमें भय उत्पन्न करना अनिवार्य है। वहीं लक्ष्मण तो पहले से ही आग्रह के पक्ष में नहीं थे, क्योंकि वे श्रीराम के बाण की अमोघ शक्ति से परिचित थे।

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