रीजनल एग्री पॉलिसी डायलॉग में जलवायु संकट, भूजल गिरावट और किसानों की आय बढ़ाने पर बनी रणनीति।

जिलाधिकारी अस्मिता लाल ने साझा किया बागपत का टिकाऊ खेती मॉडल, चिया सीड्स को बताया भविष्य की जरूरत।
RKTV NEWS/बागपत(उत्तर प्रदेश)14 मई।पश्चिमी उत्तर प्रदेश की पहचान रहे गन्ना बेल्ट बागपत में वर्षों से गन्ने की खेती के लिए पहचाने जाने वाले इस जिले में अब कम पानी, कम लागत और ज्यादा मुनाफे वाली फसलों पर गंभीर नीति चर्चा शुरू हो चुकी है। आज जनता वैदिक पीजी कॉलेज में आयोजित “सस्टेनेबिलिटी मैटर्स रीजनल एग्री पॉलिसी डायलॉग” में यही बदलती तस्वीर उभरकर सामने आई। यह कार्यक्रम जलवायु परिवर्तन, गिरते भूजल स्तर, खेती की बढ़ती लागत, फसल विविधीकरण और किसानों की आय को लेकर गहन मंथन का मंच बना। प्रशासनिक अधिकारियों, कृषि वैज्ञानिकों, एफपीओ प्रतिनिधियों, नीति विशेषज्ञों और किसानों ने एक साथ बैठकर इस बात पर चर्चा की कि आने वाले वर्षों में खेती को कैसे टिकाऊ और लाभकारी बनाया जाए।
कार्यक्रम में सबसे ज्यादा चर्चा बागपत में तेजी से बढ़ रही चिया सीड्स की खेती को लेकर रही। गन्ना प्रधान क्षेत्र में चिया जैसी सुपरफूड फसल को बढ़ावा देना अब केवल प्रयोग नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे भविष्य की खेती का मॉडल बताया जा रहा है। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जिलाधिकारी अस्मिता लाल ने कहा कि जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरणीय चिंता नहीं, बल्कि किसानों की आय और कृषि व्यवस्था से जुड़ा बड़ा संकट बन चुका है।
उन्होंने कहा कि यदि समय रहते खेती के तौर-तरीकों में बदलाव नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में पानी, मिट्टी और उत्पादन तीनों पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। डीएम ने कहा कि बागपत प्रशासन किसानों को ऐसी फसलों की ओर प्रेरित कर रहा है जो कम पानी में तैयार हों, मौसम की मार को बेहतर तरीके से झेल सकें और बाजार में बेहतर मूल्य दिला सकें। इसी सोच के तहत जिले में चिया सीड्स की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि किसानों को चिया की खेती के लिए बाहरी कृषि विशेषज्ञों से प्रशिक्षण दिलाया गया। बीज चयन से लेकर सिंचाई, पोषण प्रबंधन और बाजार तक की पूरी जानकारी किसानों को दी गई। प्रशासन ने केवल खेती तक सीमित न रहकर फॉरवर्ड और बैकवर्ड लिंकेज पर भी काम किया, ताकि किसानों को फसल बेचने और खरीदने में परेशानी न हो। डीएम अस्मिता लाल ने कहा कि बागपत जैसे गन्ना प्रधान जिले में अब इंटरक्रॉपिंग मॉडल तेजी से अपनाया जा रहा है। कई किसान गन्ने के साथ चिया उगा रहे हैं, जिससे एक ही खेत से अतिरिक्त आय का रास्ता खुल रहा है। चिया फसल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें पानी कम लगता है और खराब मौसम का असर भी अपेक्षाकृत कम पड़ता है। नीलगाय जैसी समस्या भी इस फसल में किसानों को कम परेशान करती है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में नीलगायों द्वारा फसलों को नुकसान पहुंचाना लंबे समय से बड़ी समस्या रहा है, ऐसे में चिया जैसी फसल किसानों के लिए राहत बनकर सामने आई है।
कार्यक्रम में यह बात प्रमुखता से सामने आई कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लगातार गिरता भूजल स्तर अब चिंता का बड़ा कारण बनता जा रहा है। गन्ना जैसी पारंपरिक फसलें किसानों की आय का मजबूत आधार रही हैं, लेकिन उनकी सिंचाई जरूरतें भी काफी अधिक हैं। ऐसे में कम पानी वाली फसलों की ओर बढ़ना भविष्य की आवश्यकता माना जा रहा है।
सस्टेनेबिलिटी मैटर्स के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर डॉ. नवनीत आनंद ने कहा कि अनियमित बारिश, बढ़ता तापमान और भूजल संकट उत्तर प्रदेश की कृषि को लगातार प्रभावित कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन का खतरा आज भी उतना ही गंभीर है जितना पहले था, लेकिन अब इसके प्रभाव खेतों में साफ दिखाई देने लगे हैं। उन्होंने कहा कि खेती को बचाने के लिए केवल उत्पादन बढ़ाने की सोच पर्याप्त नहीं होगी। अब ऐसी कृषि व्यवस्था विकसित करनी होगी जो पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ किसानों के लिए आर्थिक रूप से भी टिकाऊ हो।
पैनल चर्चा की अध्यक्षता कर रहे जनता वैदिक कॉलेज के डीन (कृषि) प्रो. जीपी सिंह ने कहा कि उत्तर प्रदेश आज देश के कुल गन्ना उत्पादन में 54 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी रखता है। यह उपलब्धि महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे बनाए रखने के लिए जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों को समझना और समय रहते समाधान तैयार करना जरूरी होगा। उन्होंने कहा कि सिंचाई दक्षता, जल संरक्षण, फसल विविधीकरण और मजबूत कृषि वैल्यू चेन पर अब अधिक काम करने की आवश्यकता है। यदि खेती को भविष्य के लिए सुरक्षित बनाना है तो पारंपरिक मॉडल के साथ आधुनिक और टिकाऊ कृषि व्यवस्था को भी अपनाना होगा।
कृभको के वरिष्ठ प्रबंधक वशिष्ठ कुमार नायक ने कहा कि बदलते मौसम में किसानों को गुणवत्तापूर्ण बीज, संतुलित पोषण और वैज्ञानिक खेती की ओर बढ़ना होगा। उन्होंने कहा कि अच्छी उपज के लिए बीज की गुणवत्ता सबसे महत्वपूर्ण है और किसानों को प्रमाणित स्रोतों से ही बीज खरीदना चाहिए।जिला कृषि अधिकारी बाल गोविंद यादव ने खेत तालाब योजना, ओडीओपी और कृषि अवसंरचना विकास जैसी योजनाओं की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सरकार अब जल संरक्षण और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न स्तरों पर काम कर रही है। कार्यक्रम के दौरान टिकाऊ खेती और नवाचार के क्षेत्र में बेहतर कार्य करने वाले कई प्रगतिशील किसानों को सम्मानित भी किया गया। किसानों ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि बदलते मौसम के बीच नई फसलें अब केवल विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बनती जा रही हैं।
कार्यक्रम में यह भी चर्चा हुई कि चिया सीड्स केवल खेती का विकल्प नहीं, बल्कि तेजी से बढ़ती “सुपरफूड इकॉनमी” का हिस्सा है। स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण देश और विदेश में चिया उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है। कार्यक्रम में सम्मानित किए गए कई प्रगतिशील किसानों ने कहा कि शुरुआत में नई खेती को लेकर गांवों में संकोच और आशंका थी, लेकिन अब बेहतर परिणाम देखने के बाद अन्य किसान भी रुचि दिखा रहे हैं। किसानों ने कहा कि यदि प्रशासन और बाजार का सहयोग इसी तरह मिलता रहा तो आने वाले समय में जिले में और अधिक किसान चिया जैसी फसलों को अपनाएंगे।
कार्यक्रम में कई किसानों ने कहा कि पहले खेती का मतलब केवल गन्ना और गेहूं तक सीमित था, लेकिन अब बदलते मौसम ने किसानों को सोच बदलने पर मजबूर कर दिया है। किसानों का कहना था कि यदि समय रहते नई खेती नहीं अपनाई गई तो आने वाले वर्षों में पानी और लागत दोनों बड़ी चुनौती बन जाएंगे। यही कारण है कि अब युवा किसान भी पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर सुपरफूड, इंटरक्रॉपिंग और वैल्यू एडेड खेती की ओर रुचि दिखा रहे हैं।
जिले में चिया सीड्स की खेती के शुरुआती परिणामों ने प्रशासन और किसानों दोनों का उत्साह बढ़ाया है। वर्तमान में जनपद के 87 किसान चिया की खेती से जुड़ चुके हैं और अब तक करीब 51,800 किलोग्राम चिया सीड्स का उत्पादन दर्ज किया गया है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि जिले की भूमि और जलवायु चिया फसल के लिए अनुकूल साबित हो रही है, जिसके चलते अपेक्षा से बेहतर उत्पादन मिला है। किसानों का भी कहना है कि पहली बार में ही इतनी अच्छी उपज ने उनके भरोसे को मजबूत किया है और अब आसपास के अन्य किसान भी इस खेती की ओर रुचि दिखाने लगे हैं।
पूरे कार्यक्रम में एक बात स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आई कि खेती का भविष्य अब केवल उत्पादन नहीं, बल्कि “सस्टेनेबिलिटी” यानी टिकाऊ विकास से जुड़ चुका है। बागपत में आयोजित यह रीजनल एग्री पॉलिसी डायलॉग केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि उस बदलती सोच का संकेत माना जा रहा है जिसमें खेती को जल, जलवायु, बाजार और किसानों की स्थायी आय से जोड़कर देखा जा रहा है। इस अवसर पर एसडीएम भावना सिंह, कृषि विशेषज्ञ, एफपीओ प्रतिनिधि, प्रगतिशील किसान और विभिन्न विभागों के अधिकारी उपस्थित रहे।

