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केंद्रीय सचिव अमित अग्रवाल ने वैश्विक कल्याण के लिए सस्ती दवाओं के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाने के लिए प्रधानमंत्री के आह्वान पर बल दिया।

पीएलआई योजना से असाध्‍य रोगों के उपचार की लागत करोड़ों से घटकर लाखों में आई।

सरकार नई अनुसंधान और नवाचार योजना के अंतर्गत असाध्‍य रोगों और विशिष्‍ट दवाओं को प्राथमिकता देगी।

RKTV NEWS/ नई दिल्ली 21 अगस्त।रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के औषधि विभाग के सचिव अमित अग्रवाल ने कल फिक्की सभागार में असाध्‍य रोग सम्मेलन 2025 के उद्घाटन सत्र को संबोधित किया। यह सम्मेलन “विशेष देखभाल को संभव बनाना: उपलब्धता, सुगम्यता, जागरूकता” विषय पर आयोजित किया गया था।
श्री अग्रवाल ने अपने संबोधन में आयोजकों की सराहना करते हुए कहा कि उन्‍होंने एक ऐसे विशेष विषय के महत्व पर ध्यान केंद्रित किया है जिस पर लम्‍बे समय से पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है। उन्होंने कहा कि हालांकि असाध्‍य बीमारियां व्यक्तिगत रूप से असाध्‍य लग सकती हैं, लेकिन सामूहिक रूप से ये लगभग हर बीस में से एक व्यक्ति को प्रभावित करती हैं अर्थात जनसंख्या का लगभग 5 प्रतिशत और यह इन रोगों को एक प्रमुख जन स्वास्थ्य चिंता का कारण बनाता है। उन्होंने कहा कि असाध्‍य बीमारियों की चुनौती को मानवीय दृष्टिकोण और समावेशन के प्रश्न के रूप में देखा जाना चाहिए न कि केवल एक चिकित्सा या तकनीकी समस्या के रूप में।
दिव्यांगजनों के प्रति प्रधानमंत्री के समावेशी दृष्टिकोण का उल्‍लेख करते हुए श्री अग्रवाल ने सरकार, उद्योग और शिक्षा जगत एवं नागरिक समाज से रोगियों और देखभाल कार्मिकों के समक्ष आने वाले बहुआयामी बोझ को कम करने की दिशा में कार्य करने का आह्वान किया। प्रधानमंत्री के स्वतंत्रता दिवस संबोधन का उल्लेख करते हुए, उन्होंने याद दिलाया कि हमें दुनिया की फार्मेसी के रूप में जाना जाता है और वर्तमान में अनुसंधान एवं विकास में निवेश करना समय की मांग है। इसके साथ-साथ हमें मानवता के कल्याण के लिए सर्वोत्तम और सबसे सस्ती दवाइयां भी उपलब्ध करानी चाहिए।
महत्वपूर्ण नीतिगत उपायों की जानकारी देते हुए अमित अग्रवाल ने बताया कि फार्मास्यूटिकल्स के लिए उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना के अंतर्गत असाध्‍य रोगों को एक प्रमुख क्षेत्र के रूप में शामिल किया गया है। परिणामस्वरूप असाध्‍य रोगों के लिए आठ दवाओं को समर्थन दिया गया है, जिनमें गौचर रोग के लिए एलिग्लस्टैट भी शामिल है, जिसके उपचार की लागत सालाना 1.8-3.6 करोड़ रुपये से घटकर 3-6 लाख रुपये हो गई है। अन्य समर्थित उपचारों में विल्सन रोग के लिए ट्राइएंटाइन, टायरोसिनेमिया टाइप 1 के लिए निटिसिनोन और लेनोक्स-गैस्टॉट सिंड्रोम के लिए कैनाबिडियोल आदि शामिल हैं। उन्होंने कहा कि उपचार लागत में इस तरह की महत्‍वपूर्ण कमी लक्षित नीतिगत हस्तक्षेपों की परिवर्तनकारी क्षमता को दर्शाती है।
श्री अग्रवाल ने कॉर्पोरेट जगत को अपनी कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) पहलों और रोगी सहायता कार्यक्रमों में असाध्‍य रोगों से ग्रस्त रोगियों को शामिल करने के लिए प्रोत्साहित किया क्योंकि इससे प्रभावित परिवारों पर भारी वित्तीय और भावनात्मक बोझ पड़ता है। उन्होंने सभी हितधारकों से अपनी नीतियों, विनियमों, वित्तपोषण मॉडलों और कार्यक्रमों के डिज़ाइन का मूल्यांकन समावेशिता के दृष्टिकोण से करने का आग्रह किया। उन्होंने असाध्‍य रोग ग्रस्त समुदाय की विशिष्ट आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए विशेष उपायों या नियामक छूटों के विकल्‍प तलाशने का सुझाव दिया।
श्री अग्रवाल ने अपने संबोधन का समापन करते हुए कहा कि वे दिन भर के विचार-विमर्श से प्राप्त सिफारिशों और नीतिगत अंतर्दृष्टि की प्रतीक्षा कर रहे हैं तथा उन्होंने असाध्‍य बीमारियों के लिए भारत के नीतिगत ढांचे को मजबूत करने के लिए वैश्विक सर्वोत्तम कार्य प्रणालियों से सीखने में गहरी रुचि व्यक्त की।

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