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खैरागढ़:इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय में ‘स्मृति देवीलाल सामर’ कार्यक्रम।

पद्मश्री स्व. देवीलाल सामर को दी गई श्रद्धांजलि।

खैरागढ़/छत्तीसगढ़ (रवींद्र पांडेय) 30 जुलाई। इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय के लोक संगीत विभाग में 30 जुलाई को प्रसिद्ध लोककलाविद्, लोकनाट्य एवं राजस्थानी रंगमंडल के प्रख्यात कलाकार प‌द्मश्री स्व. देवीलाल सामर के जन्म दिवस पर “स्मृति देवीलाल सामर” कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में कुलपति प्रो. डॉ. लवली शर्मा उपस्थित रहीं। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. डॉ. राजन यादव विभागाध्यक्ष लोक संगीत ने की। विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रभारी कुलसचिव डॉ. सौमित्र तिवारी उपस्थित थे। कार्यक्रम की संयोजक डॉ. दीपशिखा पटेल सहायक प्राध्यापक लोक संगीत विभाग रहीं।
सर्वप्रथम मां सरस्वती की प्रतिमा व स्व.देवीलाल सामर जी के तैलचित्र के समक्ष दीप प्रज्जवलित कर कार्यक्रम की शुरुआत की गई। इसके पश्चात अतिथियों का स्वागत किया गया। स्वागत पश्चात कार्यक्रम की संयोजक डाॅ. दीपशिखा पटेल ने पद्मश्री स्व. देवीलाल सामर जी के जीवनवृत्त पर प्रकाश डाला। इसके पश्चात लोक संगीत विभाग की छात्रा ईशा बघेल व छात्र हर्ष ने स्व.देवीलाल सामर के द्वारा लोक कलाओं तथा कठपुतली कला के संरक्षण को लेकर उनके योगदान की जानकारी प्रदान की। कुलपति डाॅ. शर्मा ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि आप सौभाग्यशाली हैं कि संगीत-कला के इस विश्वविद्यालय में शिक्षा ग्रहण करने का अवसर मिल रहा है। लोक संगीत विभाग में गाने-बजाने के साथ ही नृत्य की शिक्षा एक साथ मिल रही है। ऐसे कार्यक्रम से आप लोगों को साहित्यकारों को जानने का अवसर मिल रहा है। विद्यार्थियों को केवल यहीं तक सीमित नहीं रहना है, बल्कि निरंतर आगे बढ़ना है। प्रो. डाॅ. राजन यादव ने विद्यार्थियों से कहा कि हमें जहां भी शिक्षा अर्जित करने का अवसर मिले ग्रहण कर लेना चाहिए। इस कार्यक्रम के माध्यम से हमें साहित्यकारों के बारे में जानने का अवसर मिल रहा है। उन्होंने कहा कि एक विद्वान वक्ता को सुनना 500 पुस्तकें पढ़ने के बराबर है। इसलिए जितना हो सके साहित्यकारों के बारे में जानकारी रखिए। पद्मश्री देवीलाल सामर जी केवल राजस्थान के ही नहीं बल्कि हिन्दी बेल्ट के लोक साहित्य के बारे में भी कार्य किए हैं।
प्रभारी कुलसचिव डाॅ. सौमित्र तिवारी ने कहा कि अन्य विश्वविद्यालयों की अपेक्षा यहां के विद्यार्थी अनुशासित हैं। लोक नृत्य लोगों से जुड़ा होता है और लोगों के मध्य समन्वय स्थापित करने की क्षमता जिसमें होती है वही सफल हो पाते हैं। कार्यक्रम में लोक संगीत विभाग की छात्राओं द्वारा राजस्थान के प्रसिद्ध लोक नृत्य कालबेलिया की प्रस्तुति दी गई। वहीं अतिथि व्याख्याता डाॅ. परमानंद पांडेय के द्वारा नारी मन की भावना से ओतप्रोत छत्तीसगढ़ी गीत की प्रस्तुति दी गई।
कार्यक्रम के दौरान गायन पक्ष में डॉ. विधा सिंह राठौर, डॉ. परमानंद पांडेय, कु. ईशा बघेल, कु. साक्षी गढ़पायले , वाद्य संगत में डॉ. बिहारी तारम – बेंजो, डॉ. नत्थू तोड़े – हारमोनियम, रामचंद्र सरपे – ढोल, डॉ. राजकुमार पटेल – ढोलक, थानेश्वर – ढोलक, हर्ष चंद्राकर – मंजीरा व करण तारम – घुंघरू में रहे। अभिनव महोबिया, विनोद वर्मा, भुनेश्वर साहू, अनिल टंडन, खगेश पैकरा, खिलेश, सुखराम साहू, समीर चंद्र साहू का विशेष सहयोग रहा। कार्यक्रम के अंत में संगतकार डाॅ. नत्थू तोड़े के द्वारा आभार व्यक्त किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोक संगीत विभाग के शोधार्थीगण व विद्यार्थीगण उपस्थित रहे।

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