
मुस्कराहटें
यों जो कुछ भी जितना घूम रहा है ब्रह्मांड में
या न जाने जितना कुछ एक अणु में
और जितना घूम रहे हैं हम
उससे ज़्यादा घूम रहा है हमारे भीतर
गाँव और शहर
गलियाँ और चौराहे
दिन और रात
जीवन और मृत्यु…
हम जितना जानते हैं
उतना ही नहीं जानते
इसी जानने और न जानने के बीच
चमकता है जीवन
हम अपने ज्ञान में जितना बोलते हैं
हमारे अज्ञान पर हमारी चुप्पियाँ मुस्कुराती हैं
प्रकाश और आँख के बीच
एक सहज समन्वय
जो साक्षी है मुस्कराहटों के
काश! ऐसा ही
ध्वनियों और कानों के बीच
भी हो सके समन्वय संतुलन मात्र
आज इन्हीं मुस्कुराहटों की उम्मीद हैं
जीवन को जीवन में भरते हुए
