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भगवान विष्णु के 16वें अवतार हैं भगवान परशुराम : श्री जीयर स्वामी जी महाराज

RKTV NEWS/पीरो (भोजपुर)26 जुलाई।परमानपुर चातुर्मास्य व्रत स्थल पर भारत के महान मनीषी संत श्री लक्ष्मी प्रपन्‍न जीयर स्वामी जी महाराज ने प्रवचन करते हुए भगवान परशुराम के अवतार की कथा को विस्तार से बताए। स्वामी जी ने कहा कि भगवान परशुराम का अवतार थोड़ा कड़े स्वभाव के रूप में हुआ था। लेकिन भगवान परशुराम का विचार किसी के प्रति द्वेषभरा नहीं था। कहा जाता है कि भगवान परशुराम ने क्षत्रिय समाज को अहित पहुंचाया था। लेकिन सबसे पहले सभी लोगों को भगवान परशुराम की पूरी जीवन लीला को पढ़ना चाहिए।
क्योंकि भगवान परशुराम ने क्षत्रिय समाज के प्रति कभी भी किसी भी प्रकार का द्वेष पूर्ण भावना या विचार नहीं रखा था। भगवान परशुराम का जन्म भी विचित्र प्रकार से हुआ था। विश्वामित्र मुनि के पिता राजा गाधि की पुत्री से जमदग्नि ऋषि का विवाह हुआ था। उस समय राजा गाधि को कोई पुत्र नहीं था। मतलब उस समय विश्वामित्र जी का जन्म नहीं हुआ था। राजा गाधि की पुत्री रेणुका से जमदग्नि ऋषि का शादी हुआ था। राजा गाधि जो क्षत्रिय समाज से आते थे वह अपने पुत्री के विवाह के लिए एक शर्त रखे थे। उन्होंने शर्त रखा था कि जिनके पास भी 100 उजले रंग का घोड़ा होगा उन्हीं से हम अपनी पुत्री का विवाह करेंगे। वही इस बात की जानकारी जमदग्नि ऋषि को हुई। जिसके बाद जमदग्नि ऋषि उजाले घोड़े की खोज में लग गए।
वहीं जमदग्नि ऋषि 100 उजले रंग के घोड़े लेकर आए। वहीं रेणुका के पिता राजा गाधि के पास 100 घोड़े लेकर गए। जिसके बाद राजा गाधि की पुत्री रेणुका का विवाह जमदग्नि ऋषि से ब्राह्मण घराने में हुआ था। इस तरह से क्षत्रिय समाज की पुत्री रेणुका एवं ब्राह्मण समाज के पुत्र जमदग्नि ऋषि का विवाह हुआ।
बहुत दिन बितने के बाद भी जमदग्नि ऋषि को कोई संतान नहीं हुआ। इधर रेणुका के माता-पिता राजा गाधि को भी कोई संतान नहीं हुआ था। रेणुका ने अपने पति जमदग्नि ऋषि से कहा कि हम संतान की प्राप्ति करना चाहते हैं। मेरे साथ मेरे माता-पिता को भी अभी तक कोई संतान नहीं हुआ है। इसलिए उन लोगों को भी कोई पुत्र होता तो बहुत अच्छा होता। वही जमदग्नि ऋषि अपने सत्य संकल्प से भगवान की आराधना करते हुए अपने लिए संतान प्राप्ति एवं अपने सास ससुर को भी संतान प्राप्ति के लिए तपस्या साधना यज्ञ इत्यादि किए।
तब जमदग्नि ऋषि अपने सास ससुर और अपने लिए संतान प्राप्ति के लिए दो अलग-अलग फल प्राप्त किए।। जिसमें एक संतान ब्राह्मण के रूप में प्राप्ति के लिए था। जो कि जमदग्नि ऋषि और रेणुका के लिए था। वहीं दूसरा अपने ससुर के लिए क्षत्रिय पुत्र प्राप्ति के लिए अलग फल रखे। जो कि राजा गाधि और उनकी पत्नि के लिए था। अब रेणुका जो जमदग्नि ऋषि की पत्नी थी। उन्होंने क्षत्रिय माता-पिता के पुत्र प्राप्ति के लिए जो फल रखा गया था। वहीं फल रेणुका खा गई तथा जो फल ब्राह्मण पुत्र के जन्म के लिए रखा गया था वह राजा गाधि की पत्नी खा गई।
आगे चलकर राजा गाधि के घर पर ब्राह्मण पुत्र विश्वामित्र के रूप में हुए। वहीं इधर जमदग्नि ऋषि एवं रेणुका से भगवान परशुराम का जन्म हुआ। भगवान परशुराम थोड़ा कड़े स्वभाव के रूप में अवतरित हुए। एक बार विश्वामित्र मुनि वशिष्ठ ऋषि के पास गए जहां पर वशिष्ठ ऋषि के द्वारा उचित सम्मान किया गया। विश्वामित्र मुनि ने पूछा ऋषिवर आपने इतना अच्छा सम्मान कैसे किया। वशिष्ठ ऋषि ने कहा कि मेरे पास एक ऐसी गाय है, जिसके माध्यम से सभी प्रकार के व्यंजन इत्यादि आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं।
जिसके कारण ही हम आपके इस प्रकार से आतिथ्‍य भाव किए हैं। अब विश्वामित्र मुनि कहने लगे कि उस गाय को मुझे दे दीजिए। वशिष्ठ ऋषि ने मना कर दिया। जिसके बाद विश्वामित्र मुनि राजा के पुत्र थे, क्षत्रिय स्वभाव के थे। वह वशिष्ठ ऋषि से युद्ध करने लगे। वशिष्ठ ऋषि के पास जो गाय थी, वह बहुत शक्तिशाली थी। वहीं गाय को जबरदस्ती जब विश्‍वामित्र मुनी लेकर जाने लगे, तब गाय के द्वारा वशिष्ठ ऋषि से कहा गया कि आप आज्ञा दीजिए, ताकि हम आपके आज्ञा के अनुसार आगे काम कर सके। वही वशिष्ठ ऋषि ने गाय को आज्ञा दिया कि आप यदि सक्षम है तो आप विश्वामित्र जी के स्वभाव का जवाब दीजिए। तब उस गाय के द्वारा विश्वामित्र मुनि के शक्ति को विहीन कर दिया गया।
गाय ने अपने तेज शक्ति के कारण विश्वामित्र मुनि जो राजा गाधि के पुत्र थे, उनके सभी सेना को भगा दिए। जिसके बाद विश्वामित्र मुनि भी वशिष्ठ ऋषि के समान तपस्वी ब्रह्मऋषि बनने की प्रतिज्ञा किए। जिसके बाद तपस्या इत्यादि करने लगे, ताकि वह भी वशिष्ठ ऋषि के समान ऋषि बन जाए।
इस प्रकार से कई बार विश्वामित्र मुनि वशिष्ट जी से युद्ध किए। युद्ध में वशिष्ठ ऋषि के कई पुत्र भी मारे गए। सब कुछ करने के बाद भी विश्वामित्र भूमि जब ब्राह्मऋषि नहीं बन पाए, तब एक दिन सोचे कि वशिष्ठ ऋषि को ही खत्म कर देना चाहिए। जिसके बाद वशिष्ठ ऋषि को मारने के लिए उनके घर के आसपास गए थे। तब तक वशिष्ठ ऋषि अपनी पत्नी से कह रहे थें कि विश्वामित्र मुनि काफी अच्छे तपस्वी है। जिनका तेज रात में भी दिव्य रूप में दिखाई पड़ता हैं। वहीं इस बात को विश्वामित्र मुनि सुने जिसके बाद उन्हें मन ही मन विचार हुआ कि वशिष्ठ ऋषि मेरी प्रशंसा कर रहे हैं। जबकि हम वहां पर नहीं हैं।
इसलिए वशिष्ठ ऋषि सच में उच्च कोटि के ब्रह्मऋषि हैं। उसी समय विश्वामित्र मुनि हिंसा का त्याग करके वशिष्ठ ऋषि के पास गए और उनके चरण को पकड़ लिए। तभी वशिष्ठ ऋषि ने कहा कि अब आप विश्वामित्र मुनि ब्रह्मऋषि बन गए हैं।
एक बार हैहव वंश के राजा जमदग्नि ऋषि के आश्रम पर आए। जमदग्नि ऋषि के द्वारा हैहव वंश के राजा का बहुत ही अच्छे से स्वागत सत्कार किया गया। वहीं हैहव वंश के जमदग्नि ऋषि से पूछे कि आप इतना अच्छे से अपने कई व्यंजनों के साथ सत्कार कैसे किया। जमदग्नि ऋषि ने कहा मेरे पास एक गाय हैं जिसके पास ऐसी क्षमता है कि जो भी अतिथि आते हैं, उनके लिए सब कुछ आसानी से उपलब्ध हो जाता है। हैहव वंश के राजा ने कहा कि आप गाय मुझे दे दीजिए। लेकिन जमदग्नि ऋषि ने मना कर दिया।
जिसके बाद हैहव वंश के राजा ने जमदग्नि ऋषि का हत्या कर दिया। वही आगे इस बात की जानकारी भगवान परशुराम को हुई। तब भगवान परशुराम ने हैहव वंश के राजा सहित उनके साथ जितने भी क्षत्रिय समाज के लोग उनका साथ दे रहे थे, उन सभी लोगों का उचित जवाब दिए तथा अपने सत्य संकल्प से अपने पिता जमदग्नि ऋषि को फिर से जिंदा कर दिए। इस प्रकार से भगवान परशुराम ने उन्ही लोगों को दंड दिए जो लोग उनके पिता को परेशान किए थे तथा जो लोग भी हैहव वंश के राजा के गलत आचरण का साथ दिए थे। उन्ही लोगों के साथ थोड़ा कड़े स्वभाव में भगवान परशुराम ने उचित दंड दिया था।
इसलिए भगवान परशुराम कभी भी किसी वैसे क्षत्रिय समाज के लोगों जो निर्देश थे उनके लिए कभी भी कोई गलत व्यवहार नहीं किए थे। एक बार जमदग्नि ऋषि की पत्नी रेणुका जल लाने के लिए गई थी। वहां पर किसी चंचल स्वभाव की स्त्री और पुरुष के द्वारा चंचल स्वभाव देखा गया। कुछ देर के लिए रेणुका वहीं पर रह कर यह चीज देखने लगी। जिसके कारण उन्हें घर पर आने में देर हुई। जब रेणुका घर पर पहुंची तब जमदग्नि ऋषि ने कहा कि आपको आने में इतना देर क्यों हुआ। तब जमदग्नि ऋषि की पत्नी रेणुका ने कहा कि हम रास्ते में एक चंचल स्त्री पुरुष के स्वभाव को देखने लगे थे। जिसके कारण समय लग गया। तब जमदग्नि ऋषि ने अपने कई पुत्रों से कहा कि अपनी माता की हत्या कर दो।
लेकिन उनके आज्ञा का पालन किसी भी पुत्र ने नहीं किया। तब अपने पुत्र परशुराम से कहा कि अपनी माता की हत्या कर दो। वही भगवान परशुराम पिता की आज्ञा मानकर माता की हत्या कर दिए। फिर जमदग्नि ऋषि ने कहा कि अपने सभी भाइयों का भी हत्या कर दो, जिसने मेरे बात को नहीं माना था। भगवान परशुराम उन सभी भाइयों का भी हत्या कर दिए। इस बात से खुश होकर जमदग्नि ऋषि ने भगवान परशुराम से कहा कि वर मांगो। वही भगवान परशुराम ने अपने पिता जमदग्नि ऋषि से वर में मां को जिंदा करने का वरदान मांगा एवं अपने सभी भाइयों को भी जिंदा होने का वरदान मांग लिया।
जिसके बाद जमदग्नि ऋषि ने भी अपनी सहमति दे दी। भगवान परशुराम अपने सत्य संकल्प से अपनी माता और अपने सभी भाइयों को फिर से जिंदा कर दिए। इस प्रकार से भगवान परशुराम ने अवतार लेकर के इस धरा धाम पर लीला किया।

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