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शास्त्र के अनुसार धर्मपत्नी का बहुत बड़ा अधिकार बताया गया है : जियर स्वामी

बेटा और बेटियों का सही समय पर शादी करना चाहिए।
कलयुग में भगवान श्रीमन नारायण बद्री नारायण में करते हैं वास।
नर नारायण के रूप में अवतरित हुए हैं बद्री नारायण भगवान।
भगवान विष्णु का चौथा अवतार नर नारायण के रूप में हुआ।
भगवान का पांचवा अवतार कपिल देव भगवान के रूप में हुआ।
शादी विवाह में लड़का और लड़की का नाणी एक नहीं होना चाहिए।

RKTV NEWS/पीरो (भोजपुर)23 जुलाई।परमानपुर चातुर्मास्य व्रत स्थल पर भारत के महान मनीषी संत श्री लक्ष्मी प्रपन्‍न जियर स्वामी जी महाराज ने भगवान विष्णु के चौथे अवतार की कथा को विस्तार से समझाया। भगवान विष्णु का चौथा अवतार नर नारायण के रूप में हुआ था। भगवान श्रीमन नारायण ने लक्ष्मी जी से कहा देवी जी हम पृथ्वी पर नर नारायण के रूप में लीला करना चाहते हैं। इसीलिए आपको कुछ दिन तक बैकुंठ लोक में ही रहना होगा। लक्ष्मी जी ने कहा भगवन हम भी आपके साथ पृथ्वी पर चलेंगे।
भगवान श्रीमन नारायण नर और नारायण के रूप में अवतार लेने के लिए किसके यहां जन्म लिया जाए मन ही मन विचार कर रहे थे। तब भगवान ने ब्रह्मा जी के पुत्र धर्म के घर जन्म लेने का विचार किए।
शास्त्रों में धर्म के कई पत्नी के बारे में बताया गया है। जैसे कि मूर्ति, श्री इत्यादि । श्रीमन नारायण गुरु और शिष्य के रूप में नर नारायण के रूप में जन्म लेना चाहते थे। वहीं भगवान धर्म की पत्नी मूर्ति से गुरु और शिष्य के रूप में प्रकट हुए।
जिसके बाद भगवान तपस्या करने के लिए स्थान खोज रहे थे। वहीं केदार क्षेत्र में शिव जी के पास पहुंचे। जहां पर शिव जी से तपस्या करने के लिए उचित स्थान पूछे। वहीं शिव जी के द्वारा बद्री नारायण में भगवान जो नर नारायण के रूप में थे, उनको तपस्या करने के लिए स्थान बताया गया। आज भी बद्री नारायण में नर पर्वत और नारायण पर्वत के नाम से स्थान है। एक तरफ नर दूसरी तरफ नारायण के रूप में भगवान ब्रह्मचारी के रूप में तपस्या करने लगे। वहीं पर लक्ष्मी जी भी बद्री रूपी पेड़ के रूप में भगवान को छाया करने लगी। जिसके बाद वही भगवान श्रीमन नारायण के नर नारायण अवतार को बद्रीनारायण के नाम से जाना जाता हैं।
द्वापर युग में जब भगवान श्री कृष्ण जाने लगे, उस समय भगवान से पूछा गया भगवन आप तो जा रहे हैं, लेकिन आपका दर्शन कहां होगा। वही भगवान श्री कृष्णा ने कहा कि मुझे साक्षात कृष्ण रूप में आप लोग बद्री नारायण में मेरा दर्शन कर पाएंगे। वही आज भी भगवान श्रीमन नारायण का वास बद्री नारायण में हैं। धार्मिक ग्रंथ जैसे रामायण, श्रीमद् भागवत इत्यादि भगवान की लीलाओं का जहां पर चर्चा होता हो भगवान के जितने भी धाम हैं, वहां पर भगवान श्रीमन नारायण का साक्षात वास बताया गया हैं।
जब भगवान नर नारायण के रूप में अवतार लेने वाले थे, उस समय लक्ष्मी जी से आपस में चर्चा कर रहे थे, तभी भृगु जी को भगवान की परिक्षा लेने का मन हुआ। ब्रह्मा जी के पुत्र भृगु जी के द्वारा ब्रह्मा, शिव और विष्णु जी का परीक्षा लेने चल पड़े । जिसके बाद भृगु जी सबसे पहले ब्रह्मा जी के पास गए। जहां पर ब्रह्मा जी ब्राह्माणी के साथ बैठे हुए थे।
भृगु जी ब्रह्मा जी को कुछ गलत शब्द कहकर बोलने लगे। ब्रह्मा जी आपको अपनी पत्नी के साथ इस तरह से नहीं बैठना चाहिए। भृगु जी ब्रह्मा जी के ही पुत्र थे। भृगु जी के बातों को सुनकर ब्रह्मा जी क्रोधित हुए और मारने के लिए उठे। तब तक ब्राह्माणी ब्रह्मा जी को रोक ली। भृगु जी ने कहा हम आपकी परीक्षा ले रहे थे। आप परीक्षा में फेल हो गए। आगे शिव जी के पास भृगु जी पहुंचे। वहां पर भी शिवजी पार्वती जी के साथ बैठे हुए थे। भृगु जी के द्वारा शिव जी को भी यही बातें दोहराई गई।
जिसके बाद शिवजी क्रोधित हो गए। अपना त्रिशूल उठाकर मारने के लिए उठे। पार्वती जी के द्वारा शिव जी को रोका गया। पार्वती जी ने कहा भगवान भृगु जी आपके रिश्ते में भाई लगते हैं। इसीलिए उनकी बातों पर आप ध्यान मत दीजिए। क्षमा कर दीजिए। इस प्रकार से शंकर जी भी क्रोधित हो गए। तब भृगु जी ने कहा आप भी टेस्ट में फेल हो गए।
आगे भृगु जी भगवान विष्णु जी के पास पहुंचे। जहां पर भगवान श्रीमन नारायण लक्ष्मी जी के साथ विश्राम कर रहे थे। लक्ष्मी जी भगवान का पैर दबा रही थी। भृगु जी जाकर के भगवान को भी अपशब्द कहने लगे। आपको यह शोभा नहीं देता है कि आप अपनी स्त्री के साथ इस प्रकार से विश्राम करें। कई प्रकार से भगवान श्रीमन नारायण को बातें भृगु जी के द्वारा कहा गया। जिसके बाद भृगु जी ने भगवान श्रीमन नारायण के छाती पर पैरों से प्रहार किया। उसके बाद भगवान श्रीमन नारायण भृगु जी के पैरों को दबाने लगे। भगवान श्रीमन नारायण ने कहा कि प्रहार करने से आपके पैर में दर्द हो रहा था। हम आपकी सेवा कर देते हैं।
इस प्रकार से बिना क्रोधित हुए भगवान भृगु जी के पैर को दबा रहे थे। भृगु जी ने कहा भगवान आप दुनिया में सबसे सर्वश्रेष्ठ हैं। आपकी ही पूजा सबसे पहले होनी चाहिए। इस प्रकार से किसी भी पूजा पाठ में सबसे पहले भगवान विष्णु जी का ही संकल्प किया जाता है।
आगे स्वामी जी ने धर्म पत्नी के बारे में भी बताया भगवान श्रीमन नारायण के हृदय में वास करने वाली लक्ष्मी जी जो बराबर भगवान के वक्ष स्थल में वास करती है। जिन्हें धर्मपत्नी के नाम से भी जाना जाता है। धर्मपत्नी किसे कहा जाता है। जो अपने पति के मर्यादा में रहकर धर्म संस्कृति के साथ जीवन जीती है, उसे धर्मपत्नी कहा जाता है। जो धर्म की पत्नी होती है उसे भी धर्मपत्नी कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार पति के अच्छे कर्मों का 50% फल पत्नी को बिना कुछ किए मिल जाता है। यदि पति गलत काम करते हैं तो उसका एक परसेंट भी पत्नी को दोष नहीं लगता है।
क्योंकि पत्नी धर्मपत्नी होती है। इसीलिए धर्म का हिस्सा उसे मिल जाता है। लेकिन पत्नी पाप पत्नी नहीं होती है। इसीलिए पति के द्वारा किए गए पापों में पत्नी का हिस्सा नहीं होता है। वैसे व्यावहारिक भाषा में पति को अंग्रेजी में हस्बैंड के नाम से भी जाना गया है। हस्बैंड का मतलब जो पत्नी हंस कर खुशी से पति के साथ मर्यादा में जीवन जीती है, उसे भी धर्मपत्नी कहा गया है। लेकिन आजकल हस्बैंड को गलत तरीके से परिभाषित किया जाता है।
स्वामी जी ने बेटा और बेटियों के विवाह पर भी चर्चा किए। उन्होंने कहा कि लड़कियों का शादी 20 से 25 वर्ष के बीच कर देना चाहिए। चाहे आप अपने बच्चियों को उच्च शिक्षा देना चाहते हैं, फिर भी शादी कर देना चाहिए। उसके बाद भी आप पढ़ाना चाहते हैं तो आप जरूर पढ़ाइए। लेकिन वैवाहिक मर्यादा का भी एक समय होता है। आज उच्च शिक्षा के नाम पर लोग अपने लड़कियों का शादी 30 वर्ष के बाद 35, 40 वर्ष पार कर रहे हैं। जो आगे वंश विस्तार में बाधा बनता है।
इसीलिए चाहे लड़का हो या लड़की हो 20 से 25 वर्ष से अधिक से अधिक 30 वर्ष तक जरूर कर देना चाहिए। आज समाज में समय से शादी नहीं करने के कारण लड़के और लड़कियां अपने मन से विवाह कर लेते हैं। जिससे माता-पिता का अरमान टूट जाता है। समाज संस्कृति में एक गलत संदेश जाता है। जिससे माता-पिता के मान-सम्मान को भी ठेस पहुंचता है। इसीलिए वैवाहिक मर्यादा पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। विवाह करते समय लड़का और लड़की का नाडी एक नहीं होना चाहिए। विवाह करते समय गोत्र कूल खानदान पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
भगवान का पांचवा अवतार कपिल देव के रूप में हुआ। कर्दम ऋषि जो भगवान की तपस्या करने जा रहे थे। उस समय भगवान ने कहा कि आप शादी विवाह करके तपस्या इत्यादि कीजिए। कर्दम ऋषि ने कहा हम ब्रह्मचारी रह कर ही तपस्या करेंगे। क्योंकि हमें भगवान को प्राप्त करना हैं।
तब भगवान ने कहा कि हम आपके पुत्र के रूप में जन्म लेना चाहते हैं तो आप विचार कीजिए कि आप तपस्या करके हमें पाना चाहते हैं या खुद के रूप में पाना चाहते हैं। वही कर्दम ऋषि विवाहित मर्यादा के अनुसार जीवन जीने का फैसला किए। जिसके बाद कर्दम ऋषि का विवाह मनु महाराज की पुत्री के साथ हुआ। वही मनु महाराज की पुत्री देवहोती का विवाह कर्दम ऋषि के साथ हुआ। आगे चलकर कर्दम ऋषि की नौ पुत्री का जन्म हुआ। जिसके बाद 10वें पुत्र के रूप में भगवान कपिल देव जी का जन्म हुआ।

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