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क्या बिहार में सुशासन जंगलराज में बदल रहा है ?

RKTV NEWS/अशोक दुबे,19 जुलाई।बिहार में “सुशासन” से “जंगल राज” की ओर लौटाव की चर्चा जमीनी तौर पर बढ़ रही है। हालांकि इस विषय में एकमात्र दृष्टिकोण नहीं है, लेकिन निम्न प्रमुख बिंदुओं से स्पष्ट होता है कि क्या हालात “जंगल राज” की तरफ बढ़ रहे हैं: हालात क्या हैं?

हिंसा व अपराध में तेज़ी

पटना के एक प्रमुख अस्पताल में आईसीयू में गोली चलने की घटना ने कानून-व्यवस्था की मौजूदा स्थिति पर गहरी चिंता पैदा कर दी है ।
व्यापारियों की हत्या, छात्र समूहों में हिंसक टकराव और पत्रकारों पर हमलों की खबरें राज्य में बढ़ रही हैं ।

राजनीतिक आक्रोश

विपक्ष और स्थानीय लोगों का कहना है कि नीतीश सरकार कानून व्यवस्था पूरी तरह कंट्रोल नहीं कर पा रही है, और “जंगल राज” की वापसी के संकेत दिख रहे हैं ।
तेजस्वी यादव लगातार “क्राइम बुलेटिन” जारी कर रहे हैं, जिसमें हत्या, डकैती, गोलीबारी आदि की घटनाएँ शामिल हैं ।

सरकारी बयान व प्रशासनिक प्रतिक्रियाएँ

डीजीपी विनय कुमार जैसे वरिष्ठ अधिकारियों ने अपराध वृद्धि को कृषि की फसल-रहित अवधि से जोड़कर किसानों पर सवाल उठाए हैं, जिससे असंतोष हुआ है ।
उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कहा कि व्यक्तिगत विवादों में हुई हत्या को रोकना मुश्किल है—यह टिप्पणी कानून व्यवस्था की कमज़ोरी पर प्रकाश डालती है ।

राजनीति का खेल

विपक्ष, विशेषकर राहुल गांधी, तेजस्वी यादव, मल्लिकार्जुन खड़गे आदि ने यह आरोप लगाया है कि नीतीश सरकार ने बिहार को “क्राइम कैपिटल” बना दिया है ।
प्रधानमंत्री और केंद्रीय नेता ‘जंगल राज’ शब्द का इस्तेमाल विपक्ष की आलोचना व चुनावी रणनीति में कर रहे हैं ।

क्या वाकई जंगल राज लौट रहा है?

1990‑2005 के शासन की तुलना में (जिसे आम तौर पर “जंगल राज” कहा जाता है), नीतीश शासन में न्याय व्यवस्था अधिक संस्थागत, पुलिस मशीनरी बेहतर और विकास संकेतकों में सुधार रहा है ।

आंकड़े क्या कहते हैं?

NCRB डेटा के अनुसार हाल के वर्षों में बिहार में अपराधों की दर में बढ़ोतरी देखी गई है। उदाहरण के लिए, 2022 में बिहार में IPC अपराधों में 23% की वृद्धि हुई—देश में सबसे अधिक ।

स्थानीय अनुभव

मध्य और उच्च मध्यम वर्ग, व्यापार और निजी स्कूल चलाने वाले लोग बता रहे हैं कि अपराध और भय की स्थिति बढ़ रही है, जिससे निवेशक घट रहे हैं और सामान्य नागरिक सुरक्षा से वंचित महसूस करते हैं ।

निष्कर्ष

जी हां, अगर हालिया घटनाओं, अपराध ग्राफ, सरकारी बयानों और विपक्षी आलोचना को देखें तो यह कहा जा सकता है कि बिहार की कानून-व्यवस्था हालाँकि पूरी तरह ढह नहीं गई, लेकिन प्रशासनिक और राजनीतिक नेतृत्व की क्षमता पर सवाल उठ रहे हैं।
“जंगल राज” जैसा पूर्ण राजनीतिक पतन तो नहीं हुआ है, लेकिन नियंत्रित अपराध, दिनदहाड़े हत्याएं, और जनसुरक्षा में गिरावट ने सुशासन की धरोहर को कमजोर कर दिया है।

अशोक दुबे

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