
RKTV NEWS/रांची(झारखंड )15 मई। बुधवार को डी ए वी ग्रुप द्वारा डी ए वी गांधीनगर में आयोजित त्रिदिवसीय शिक्षक दक्षता विकास कौशल कार्यशाला के अंतिम दिन व्याकरण की प्रयोजनीयता पर प्रमुख संसाधन सेवी के रूप में बोलते हुए रांची विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ जंग बहादुर पाण्डेय ने कहा कि संसार में सर्वाधिक पवित्रतम् वस्तु ज्ञान है। ज्ञान की सभी शाखाओं का अपना अपना महत्व है। बचपन में दादा कहा करते थे कि इतिहास पढ़ो मैं पूछता था क्यों ? वे कहां करते थे इति माने बीती हास माने कहानी अर्थात् मानव के व्यक्तित्व के विकास के लिए अतीत को बोध अपेक्षित है।कहते थे भूगोल पढ़ो , मैं पूछता था क्यों उनका उत्तर होता था भू माने पृथ्वी और गोल माने जानकारी।जिस पृथ्वी पर हमारा जन्म हुआ है ,उसके बारे में तो हमें जानना ही चाहिए।बाबा श्री कहते थे संस्कृत पढ़ो पूछने पर उतर देते थे संस्कृत विश्व की प्राचीनतम वैज्ञानिक भाषा है, इसमें प्राचीनतम ज्ञान विज्ञान संरक्षित और सुरक्षित है और इसी ज्ञान विज्ञान के कारण प्राचीन काल में भारत विश्व गुरु की संज्ञा से अभिहित था।कहा करते थे अर्थशास्त्र जरूर पढ़ो क्योंकि यह वह शास्त्र है जिसके बिना जीवन दूभर हो जाता है। संस्कृत की सुप्रसिद्ध सूक्ति है-
टका: ही कर्म:टका: हि धर्म:,टका:परमं पदम्।
यस्य गृहे टका:नास्ति स:टकटकायते।
अस्तु भाषा की बेहतरीन संप्रेषनीयता के लिए व्याकरण का ज्ञान परमावश्यक है: व्याकरण वह शास्त्र है जो हमें शुद्ध शुद्ध बोलना और लिखना समझाता है। इसीलिए संस्कृत के नीति परक श्लोक में व्याकरण की प्रयोजनीयता पर प्रकाश डालते हुए कहा गया है कि:-
यद्यपि बहुनाधीषं तथापि पठ पुत्र व्याकरणम्।
*स्वजनो श्वजनो मां भूत,सकलं शकलं,सकृत् शकृत्।
अर्थात् पिता ने काशी से सर्व शास्त्र में परांगत हुए पुत्र से पूछा,बेटा तूने क्या क्या पढ़ा।बेटे ने सभी शास्त्रों का नाम लिया; लेकिन व्याकरण की बात नहीं की।इस पर पिता को दुख हुआ और दुखी पिता ने पुत्र को व्याकरण की अनिवार्यता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि:-हे पुत्र!,यदि तुमने बहुत कुछ पढ़ लिया है, फिर भी व्याकरण अवश्य पढ़ो और यदि कुछ भी नहीं पढ़ा है तो भी व्याकरण अवश्य पढ़ो क्योंकि ऐसा न हो जाए कि स्वजन -आत्मीय की जगह श्वजन -कुत्ता,सकल संपूर्ण की जगह शकल खंड और सकृत् एक बार की जगह शकृत् विष्ठा लिखा जाए। क्योंकि ऐसा होने से तिरेसठ का संबंध छत्तीस तब्दील हो जायेगा। व्याकरण हमें भाषा की शुद्धता का ज्ञान कराता और संबंधों को प्रगाढ़ बनाता है।शब्द जीवित सत्ता है। बचेंगे शब्द तो बचेगी संस्कृति।इसीलिए इनका प्रयोग बहुत सावधानी से करना चाहिए।संत कबीर ने इसीलिए अपनी साखी में वाणी के सुप्रयोग की सलाह दी है:-
वाणी ऐसी बोलिए,मन का आपा खोया।
औरन को शीतल करै,आपुहि सीतल होय।
शब्द सम्हारे बोलिए, शब्द के हाथ न पांव।
एक शब्द औषधि करे,एक शब्द करे घाव।
इस शाश्वत अनुष्ठान में डी ए वी के जिन विद्वान प्राचार्यों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति से चार चांद लगाया उनमें डा एम के सिन्हा (डी ए वी कडरू)डा एस के मिश्र (बरियातु)डा एस के पाठक (टी सी आई गोविंद पुर)डा किरण यादव (डीएवी नीरजा) कमलेश कुमार (बरकाकाना) श्रीमती रेशु चौधरी (बचरा)डा पी के झा (गांधी नगर)डा ए के मिश्र (हिंदी शिक्षक हेहल)आदि प्रमुख हैं।
आगत अतिथियों का भव्य स्वागत डी ए वी के क्षेत्रीय निर्देशक डा एम के सिन्हा ने, संचालन डा बी एन मिश्र ने और धन्यवाद ज्ञापन डी ए वी गांधी नगर के विद्वान प्राचार्य डा पी के झा ने किया। शांति पाठ और राष्ट्र गान से पूर्णाहुति हुई।
