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तुलसी साहित्य अकादमी मुख्यालय भोपाल द्वारा “पावस काव्य गोष्ठी”

भोपाल/उत्तर प्रदेश 22 जुलाई।भोपाल तुलसी साहित्य अकादमी भोपाल द्वारा सृजन श्रंखला 34 के अन्तर्गत पावस काव्यगोष्ठी एवं यायावर साहित्यकार सुरेश पटवा एवं समर्पित साहित्य मनीषी घनश्याम मैथिल अमृत का सारस्वत अभिनंदन का आयोजन तुलसी साहित्य के केन्द्रीय कार्यालय के कार्यक्रम हाल में ग्वालियर से पधारे मुरारीलाल गुप्त गीतेश की अध्यक्षता तथा वरिष्ठ साहित्यकार व्यंग्यकार गोकुल सोनी जी के मुख्य आतिथ्य तथा कार्यक्रम के विशेष अतिथि मुरैना के वरिष्ठ साहित्यकार भक्त प्रहलाद जी रहे।
कार्यक्रम के प्रथम सत्र में माता सरस्वती जी के समक्ष दीप प्रज्वलन एवं पुष्प माल पहना कर पूजन अर्चन किया गया।श्रीमती दुर्गारानी श्रीवास्तव ने माँ वीणा की वंदना का पाठ किया।
मंचस्थ अतिथियों का स्वागत सत्कार करने के उपरांत वरिष्ठ लेखक एवं यायावर साहित्यकार श्री सुरेश पटवा जी जो अभी हाल ही में रामेश्वरम धाम की यात्रा करके लौटे हैं एवं घनश्याम मैथिल अमृत जी जो रेल कारखाने भोपाल से अपनी सेवाएं पूर्ण कर सेवानिवृत्त हुए हैं का पुष्पहार पहना एवं शाल -श्रीफल भेंटकर सारस्वत अभिनंदन किया गया।
संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉक्टर मोहन तिवारी आनंद ने सुरेश पटवा की उत्कृष्ट गद्य लेखक निरूपित किया और कहा कि घनश्याम मैथिल को भोपाल में साहित्यिक अवदान के लिए हमेशा याद किया जाता रहेगा। वरिष्ठ साहित्यकार गोकुल सोनी ने समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में विचार व्यक्त करते हुए कहा कि सुरेश पटवा द्वारा लिखित यात्रा वृतांत “सगरमाथा से समुंदर तक” और भारत में हिंदू चेतना की अनवरत यात्रा पर “हिंदू प्रतिरोध गाथा” नाम से पुस्तकें चर्चा में है। उनकी शोधपरक किताबें अत्यंत रोचक शैली में तथ्यात्मक विवेचन समेटे रहती हैं।

घनश्याम मैथिल नगर के साहित्यिक जगत में कुशल मंच संचालन, लघुकथा और कविताओं के लोकप्रिय लेखक के रूप में जाने जाते हैं। वे भारतीय रेल सेवा से अभी हाल में सेवानिवृत्त होकर पूर्ण कालिक साहित्य सेवा को समर्पित साहित्यकार हैं।

द्वितीय सत्र में 43 रचनाकारों ने पावन पर्व सावन पर केन्द्रित रचनाओं का पाठ किया।

सर्वप्रथम डा.शिव कुमार दीवान ने सावन के
सोने के झूले डले रेशम वाली डोर।
आनंद झूला झूलते,राधा नंदकिशोर।।

घनश्याम मैथिल ने सावन पर उत्कृष्ट दोहों का पाठ किया-
पावस ने पाती लिखी, जब धरती के नाम।
सागर से जल ला रहे,
भर भर के घनश्याम।।५

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि श्री प्रहलाद भक्त ने एक मुक्तक तथा कुछ छंद पढ़े-
पावस रितु पाय,बेहड़ में सांय सांय।
झींगुर दल मिल खेंचि रहे तान हैं।
टिटहरी टें टें कर उड़ती उमंग संग,
दादुर किनारे वै गाते जीत गान हैं।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि गोकुल सोनी ने मधुर गीत “मैं दीपक बन जलूं, तुम्हारे neh की बाती है। कितना भूलूं याद तुम्हारी आ ही जाती है।”

कार्यक्रम संचालक डा.अशोक तिवारी अमन ने पावस गीत पढ़ा-

जोर जोर से बादल गरजे, मौसम बरखा रानी,
कहीं गरजते कहीं बरते,
कैस करें किसानी।

चंद्र भान सिंह चंदर ने –
दिशायें महकीं बिखरी मखटी की सौंधी गंध।

डा.संगीता भारद्वाज ने –
आवाज तेरी कानों में बसी कहानी बनके।
दर्द उभरा हृदय की गहराई में रवानी बनके,गीत पढ़ा।
सुनीता शर्मा सिद्धि ने पढ़ा-
हमने प्रेम की बात करी तो,
हिंसा को स्वीकार किया।

पुरुषोत्तम तिवारी ने उत्तम गीत पाठ किया-
अम्बर की पाती पर अम्बुध ने गीत लिखा।
पावस के अम्बुद स्वर अक्षर का का गान किया।

प्रेम चंद्र गुप्ता जीने सुन्दर गजल पढ़ी-
रंज में इतना हंसला रखना।
हर बुराई से फासला रखना।।
महावीर सिंह ने पढ़ा-

मैं सूरज हूँ, मुझे तो वक्त पर ही डूबना होगा।
फलक चाँद तारों का चमकना भी जरूरी है।

तुलसी साहित्य अकादमी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा.मोहन तिवारी आनंद ने पावस ऋतु के दोहे पढ़े-
बिजुरी तू दे हौसला
पवन लगा दे पंख।
भैया का टीका करूँ
मेघ बजाए शंख।।
इस तरह 43 कवियों ने अपनी चुनिंदा रचनाओं का पाठ किया।कार्यक्रम संचालन डा.अशोक तिवारी अमन ने किया और डा.मोहन तिवारी आनंद राष्ट्रीय अध्यक्ष,तुलसी साहित्य अकादमी ने सभी का आभार व्यक्त कर धन्यवाद ज्ञापित किया।

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