
RKTV NEWS/रवींद्र पांडेय 21 जुलाई।दोषी को ढूंढ़ना जटिल है। सालों लग जाते हैं। समय मूल्यवान है। दोषी को ढूंढ़ने में समय बर्बाद नहीं करूंगा। दोष मढ़कर काम चलाऊंगा। सारा दोष जमाने का है। अरे वही! सबका साथ वाला जमाना। साथ वालों से शिकायत कैसी! इस जमाने में अच्छा-बुरा कुछ भी ऊपर से नहीं आता। आता भी होगा, तो मुझे पता नहीं। मेरी सेटिंग अभी ऊपर तक हुई नहीं है।
इधर, कुछ गाड़ियां मुंह फुलाए मिलीं। उनको इथेनॉल से दिक्कत है। कहती हैं – कमजोरी महसूस होती है। थकान जल्दी आती है। फेफड़े से अजीब सी आवाजें आती हैं। सिर चकराता है।… वह तो चकराएगा जी! दिक्कत इथेनॉल में नहीं है। ज्ञान के अभाव में ऐसा होता है। ब्रह्मांड का एक सिद्धांत है। आप जैसा सोचते हैं, वैसा ही आपके साथ होता है। आपको लगता है कि इथेनॉल वाले पेट्रोल से माइलेज कम हो गया है, तो बिल्कुल हो जाएगा! जिसे ऐसा नहीं लगता, उसका कम नहीं होता। कुछ लोगों को लगता है कि इथेनॉल गन्ने से बनता है। इसलिए गाड़ी को शुगर की बीमारी हो जाती है। यह बीमारी जीवन भर के लिए आती है। अपने पीछे और कई बीमारियों को लाती है।… यह चिंता वाजिब है। पर यह बात वाजिब नहीं है। गन्ने से सबको तो शुगर की बीमारी लगती नहीं। शुगर के लिए गन्ने को कठघरे में नहीं ला सकते। दरअसल दिक्कत पेट्रोल की नहीं है। सोच की है। इसलिए पेट्रोल नहीं, सोच बदलिए। अब सोच बदलना थोड़ा मुश्किल लग सकता है। मैं आपको बहुत आसान उपाय बताता हूं। आप पार्टी बदल लीजिए। फिर देखिए चमत्कार! उसी पेट्रोल में आपकी गाड़ी का माइलेज एकदम दुरुस्त हो जाएगा।
उधर एक और हल्ला मचा है। चंदे की चोरी हो गई। भगवान का धन खा गए। अजीब बात है! न भगवान ने चंदा मांगा, न रसीद छपाई। न ही चोरी की कोई रपट लिखाई। जबरदस्ती में भगवान का नाम ले आए! सब जानते हैं कि भगवान तो भाव के भूखे होते हैं। अब लोगों ने भूख के भाव लगा दिए। भाव वाली वस्तुओं से उनकी भूख मिटाने चल पड़े। सोना-चांदी, हीरे-मोती। पूरी सृष्टि के स्वामी को देनेवाले आप कौन!… इंसान ने ही चंदा मांगा। इंसान ने चंदा दिया। इंसान ने चुराया। इंसान ने जांच बिठाई। इंसान जांच करेंगे। फिर कानून अपना काम करेगा। वह अपना काम ही करता है। आपका काम थोड़े ही न करेगा! आप अपना काम कीजिए। भगवान भी अपना काम कर रहे हैं। लीला करना भी उनका एक प्रिय काम है। वो कर रहे हैं। लीला को लीला की तरह देखिए। अच्छे भक्त बनिए। मैं तो भगवान से बहुत डरता हूं जी। पैदाइशी डरपोक। पानी में उतरने से डरता हूं। गंगा किनारे भी घाट की सीढ़ियों पर बैठकर लोटे से नहाता हूं। कैसे सबका भला करेंगी गंगा मइया।
कुछ लोग हर चीज के लिए सरकार को दोषी मान लेते हैं। मान लीजिए। क्या फर्क पड़ता है। पर मानने से पहले यह भी जान लीजिए। कितनी शक्तियां हैं सरकार के पास। आईएएस, आईपीएस, ज्ञानी-ध्यानी-विज्ञानी। कितना गिनाएं! कुछ गूगल भी कर लिया कीजिए। सब तो उसी के पास है। नए जमाने में आधे से ज्यादा विपक्ष भी तो उसी के पास है। जिनके पास भरोसे के दस दरबारी भी नहीं, वे हर दिन सरकार को ललकारते रहते हैं। वैसे यह अच्छी बात है। इसी को तो लोकतंत्र की खूबसूरती कहते हैं। लोकतंत्र में ‘लोक’ के अलावा कुछ भी परमानेंट नहीं। न पक्ष। न विपक्ष।
इसलिए लोक को बचाना होगा। लेकिन ‘लोक’ को ‘लोक’ ही बचा सकते हैं। लोक बचाने का काम ठेके पर देना ठीक नहीं।

