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भोपाल:हिंदी के कार्यान्वयन और वर्चस्व पर हुआ विमर्श।

बैंकर्स साहित्य कला परिषद की हिंदी व्याख्यानमाला में विद्वानों ने रखे विचार।

भोपाल/मध्यप्रदेश ( मनोज कुमार प्रसाद) 26 सितंबर। विश्व संवाद केंद्र, भोपाल में बैंकर्स साहित्य कला परिषद द्वारा राजभाषा मास के अंतर्गत हिंदी व्याख्यानमाला ‘हिंदी विमर्श’ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में विभिन्न विद्वान वक्ताओं ने प्रशासन, शिक्षा, साहित्य और सामाजिक जीवन में हिंदी की स्थिति तथा उसके प्रभावी कार्यान्वयन के उपायों पर विचार व्यक्त किए।
कार्यक्रम की अध्यक्षता संस्था के अध्यक्ष गोकुल सोनी ने की। मुख्य अतिथि पूर्व मुख्य सचिव एवं मध्यप्रदेश के पूर्व चुनाव आयुक्त मनोज श्रीवास्तव रहे। साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ. विकास दवे, बाल कल्याण एवं बाल साहित्य शोध केंद्र के निदेशक महेश सक्सेना तथा रवींद्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय हिंदी केंद्र के निदेशक जवाहर कर्णावट विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। संचालन चंद्रभान राही ने किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ बांधवी सोनी की सरस्वती वंदना से हुआ। इसके बाद सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार यशवंत गोरे ने स्वागत भाषण दिया।
‘प्रशासनिक कार्यों में हिंदी की स्थिति एवं हिंदी का वर्चस्व स्थापित करने के उपाय’ विषय पर विचार रखते हुए मनोज श्रीवास्तव ने कहा कि प्रशासनिक सेवाओं की परीक्षाओं में हिंदी माध्यम से चयनित विद्यार्थियों की संख्या प्रारंभिक दौर में 900 में 45 थी, जो बाद में घटकर 11 रह गई। उन्होंने कहा कि पीएससी और यूपीएससी प्रशासनिक पदों पर चयन का प्रमुख माध्यम हैं। जब इन परीक्षाओं में अंग्रेजी को प्राथमिकता दी जाएगी तो प्रशासन में हिंदी का प्रभावी उपयोग कैसे बढ़ेगा। उन्होंने हिंदी के बीच बढ़ते अंग्रेजी प्रभाव की तुलना समुद्र मंथन के दौरान देवताओं के बीच कपटपूर्वक बैठे राहु के प्रसंग से की।
डॉ. विकास दवे ने कहा कि राजभाषा के प्रश्न पर हिंदी के सामने किसी भारतीय प्रांतीय भाषा की नहीं, बल्कि अंग्रेजी की चुनौती थी। उन्होंने हिंदी के पक्ष में मध्यप्रदेश के प्रतिनिधि के योगदान का उल्लेख करते हुए हिंदी के महत्व को रेखांकित किया।
महेश सक्सेना ने कहा कि अंग्रेजी का प्रभाव अब बड़े शहरों और बाजारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि छोटे-छोटे मोहल्लों और दुकानों तक दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि जगह-जगह अंग्रेजी सिखाने के बोर्ड दिखाई देते हैं, लेकिन हिंदी पढ़ाने की जानकारी देने वाले बोर्ड अपेक्षाकृत कम नजर आते हैं।
जवाहर कर्णावट ने कहा कि कई राज्यों में राजभाषा विभाग कार्यरत हैं, जबकि मध्यप्रदेश में राजभाषा विभाग को समाप्त कर दूसरे विभाग में मिला दिया गया है। उन्होंने कहा कि भाषा के विषय में सरकार को जागृत करना और हिंदी के लिए आवाज उठाना आवश्यक है।
अध्यक्षीय उद्बोधन में गोकुल सोनी ने कहा कि कुछ लोग राजभाषा मास, हिंदी पखवाड़े और हिंदी दिवस की आवश्यकता पर सवाल उठाते हैं, लेकिन ऐसे आयोजनों के माध्यम से देश में हिंदी के कार्यान्वयन पर विमर्श और जनजागरण का अवसर मिलता है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के बौद्धिक कार्यक्रम हिंदी के उत्थान के लिए आत्मावलोकन का अवसर प्रदान करते हैं।
अंत में मनोज गुप्त ‘मनोज’ ने आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम के आयोजन में अरुण गुप्ता, प्रदीप श्रीवास्तव, कैलाश मेश्राम, लक्ष्मीकांत जावणे, विपिन वाजपेयी, श्रीराम माहेश्वरी, होशियार सिंह पटेल सहित अन्य लोगों का सराहनीय योगदान रहा। इस अवसर पर डॉ. गौरीशंकर शर्मा ‘गौरीश’, हरिवल्लभ शर्मा, सीमा हरि शर्मा, रंजना शर्मा, बिहारीलाल सोनी, मनीष बादल सहित बड़ी संख्या में साहित्यकार उपस्थित रहे।

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