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आरबीआई की आकस्मिक आरक्षित निधि की लूट।

 

RKTV NEWS/आलेख : एस. एस. अनिल(अंग्रेजी से अनुवाद : संजय पराते)08 जून।भारतीय रिज़र्व बैंक ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए केंद्र सरकार को अतिरिक्त मुनाफ़े के तौर पर 2,86,588.46 करोड़ रूपये हस्तांतरित करने का फ़ैसला किया है। यह फ़ैसला 22 मई, 2026 को आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा की अध्यक्षता में हुई बोर्ड की बैठक में लिया गया। यह इतिहास में अतिरिक्त मुनाफ़े का अब तक का सबसे बड़ा हस्तांतरण है। जहाँ पहले रिज़र्व बैंक द्वारा किए गए ऐसे बड़े हस्तांतरण को समाचार माध्यमों में काफ़ी प्रचार मिलता था, वहीं इस बार ऐसा नहीं हुआ। कुछ वित्तीय समाचार माध्यमों ने रिपोर्ट किया कि इससे देश को ऐसे समय में, जब वह वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं से गुज़र रहा है, काफ़ी आर्थिक सहारा मिलेगा। एक अन्य प्रमुख मीडिया घराने ने इसे “मुश्किल समय में (देश को) बचाने वाला” बताया है। वहीं, एक प्रमुख मलयालम दैनिक ने सरासर झूठ बोलते हुए दावा किया है कि आरबीआई द्वारा हस्तांतरित की गई राशि, केंद्रीय वित्त मंत्रालय द्वारा बजट में लाभांश आय के तौर पर अनुमानित राशि से बहुत कम थी ; इस तरह उसने केंद्र सरकार का बचाव किया।
पिछले बजट में, आरबीआई और दूसरे सरकारी वित्तीय संस्थानों (जिनमें सरकारी बैंक भी शामिल हैं) से कुल 3.16 लाख करोड़ रूपये की आय का अनुमान लगाया गया था। इसमें से अकेले आरबीआई से ही 2.87 लाख करोड़ रूपये मिल चुके हैं। पिछले वित्तीय वर्ष में सरकारी बैंकों का शुद्ध लाभ 1.98 लाख करोड़ रूपये और एलआईसी का लाभ 57,419 करोड़ रूपये रहा। आम बीमा कंपनियों और नाबार्ड समेत दूसरे सरकारी संस्थानों ने भी रिकॉर्ड शुद्ध लाभ दर्ज किया है। पिछले साल के योगदान को देखते हुए, इस बात की पूरी संभावना है कि ये संस्थान इस साल सरकार को लाभांश के तौर पर 40,000 करोड़ रूपये से ज़्यादा की रकम देंगे। इसका मतलब है कि सरकार को बजट में अनुमानित रकम से कहीं ज़्यादा लाभांश आय मिलना तय है — और इसी सच्चाई को देखते हुए मीडिया इस तरह की लीपापोती वाली नीति अपना रहा है।

रिज़र्व बैंक के मुनाफ़े को उसकी आरक्षित निधि के तौर पर रखा जाता है। आरबीआई की अतिरिक्त आय का हिसाब उसकी कुल कमाई से लगाया जाता है। इस कमाई में भारतीय/विदेशी सरकारी प्रतिभूतियों से मिलने वाला ब्याज, विदेशी निवेश, मौद्रिक नीति संचालन (रेपो और रिवर्स रेपो), विदेशी मुद्रा के लेन-देन से होने वाली आय, सरकारी बॉन्ड का मूल्य बढ़ने से होने वाला फ़ायदा और कमीशन शामिल होते हैं। इसमें से मुद्रा छापने और बांटने का खर्च, एजेंसी कमीशन, मौद्रिक नीति लागू करने का खर्च और देश के औद्योगिक और ग्रामीण विकास के लिए अलग रखे गए फंड जैसे खर्च घटा दिए जाते हैं। इस अतिरिक्त आय से अलग रखा गया पैसा ही रिज़र्व बैंक की आरक्षित निधि बनता है, जिसका मकसद देश की अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखना होता है। इसलिए, रिज़र्व बैंक इस आरक्षित निधि को बहुत सावधानी से संभालता है। अतिरिक्त मुनाफ़े का एक खास हिस्सा ‘आपातकालीन जोखिम सुरक्षा कोष’ के तौर पर रखा जाता है। आकस्मिक निधि के तौर पर अलग रखा गया पैसा देश की अर्थव्यवस्था में होने वाले बदलावों पर नज़र रखने और भविष्य में आने वाले संभावित अप्रत्याशित संकट से निपटने के लिए होता है। आकस्मिक निधि ही वह असली आरक्षित निधि (रिज़र्व) होती है, जो देश की अर्थव्यवस्था की सुरक्षा करती है। बाकी बची हुई रकम आरबीआई केंद्र सरकार को हस्तांतरित कर देता था। रिज़र्व बैंक लंबे समय से यही नीति अपनाता आ रहा था।

लाखों करोड़ रुपये हथियाने के लिए बनाई गई विशेषज्ञ समितियां

बहरहाल, 2014 से देश में सत्ता में बैठी मोदी सरकार रिज़र्व बैंक के साथ भी ठीक वैसा ही रवैया अपना रही है, जैसा वह अन्य संवैधानिक संस्थाओं और सार्वजनिक क्षेत्र के साथ अपना रही है। केंद्र सरकार ने रिज़र्व बैंक के पास मौजूद आपातकालीन आकस्मिक आरक्षित निधि में भी दखल देना शुरू कर दिया। वित्त मंत्रालय ने यह तर्क दिया कि विकसित देशों के केंद्रीय बैंकों की तुलना में आरबीआई के पास आरक्षित निधि में बहुत अधिक नकदी है, इसलिए देश के विकास की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए एक बड़ी राशि केंद्र सरकार को हस्तांतरित की जानी चाहिए। बहरहाल, रिज़र्व बैंक का कहना था कि वित्तीय संकट से निपटने के लिए यह पैसा आरबीआई के पास ही रहना चाहिए। इस विवाद का स्थायी समाधान खोजने और आरबीआई की पूंजी आवश्यकताओं का सटीक आकलन करने के लिए, दिसंबर 2018 में पूर्व आरबीआई गवर्नर डॉ. बिमल जालान की अध्यक्षता में छह सदस्यीय विशेषज्ञ समिति नियुक्त की गई, ताकि एक नया ‘आर्थिक पूंजी ढांचा’ तैयार किया जा सके। जैसे मरीज़ की इच्छा के अनुसार डॉक्टर की सलाह हो, वैसे ही बिमल जालान समिति ने सिफारिश की कि आरबीआई की कुल संपत्ति का 5.5% से 6.5% के बीच आपातकालीन आकस्मिक निधि बनाए रखना पर्याप्त होगा। हाल के बजट में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों की दक्षता में सुधार के लिए घोषित ‘विकसित भारत के लिए बैंकिंग पर उच्च-स्तरीय समिति’ द्वारा भी इसी तरह की रिपोर्ट सौंपे जाने की संभावना है, जिसका उद्देश्य वित्तीय क्षेत्र पर केंद्र का पूर्ण एकाधिकार स्थापित करना है।

जालान कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर, आरबीआई अब वित्तीय वर्ष 2015-16 से सिर्फ़ 6.5% अलग रखने के बाद लाखों करोड़ रुपये केंद्र सरकार को हस्तांतरित कर रहा है। यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि पिछले वित्तीय वर्ष में अलग रखी गई रकम 7.5% थी।

अभी किए गए हतांतरण के महत्व को तभी समझा जा सकता है, जब हम यह देखें कि 2003 से 2014 के बीच, यानी मोदी सरकार के सत्ता में आने से पहले के 11 सालों में, आरबीआई ने केंद्र सरकार को कुल 2,06,102 करोड़ रूपये हस्तांतरित किए थे। वहीं, 2014 से 2026 के बीच, यानी मोदी सरकार के कार्यकाल में, यह हस्तांतरित की गई रकम 14,28,445 करोड़ रूपये तक पहुँच गई है। इसमें से, पिछले तीन वित्तीय वर्षों में ही आरबीआई ने केंद्र सरकार को 7,66,052 करोड़ रूपये की बड़ी रकम बिना किसी विरोध के हस्तांतरित की है।

“जान-पहचान से बढ़ती स्वीकार्यता”

रिज़र्व बैंक की आरक्षित निधि से इतनी बड़ी रकम हस्तांतरित करने से अर्थव्यवस्था पर जो गंभीर आर्थिक असर पड़ सकते हैं, उन पर कोई गंभीर चर्चा नहीं हो रही है, या यूं कहें कि चर्चा करने की कोई तैयारी ही नहीं है। सोलहवें वित्त आयोग के अध्यक्ष और नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया ने कहा कि इस साल का ट्रांसफर सरकार के कुल खर्च के अनुपात में भी बहुत अहम है। उन्होंने कहा कि किसी खास खर्च के लिए किसी खास राजस्व को अलग रखना व्यावहारिक नहीं है, और ये सभी राजस्व बस भारत सरकार के कुल राजस्व पूल का हिस्सा बन जाते हैं।

जो आर्थिक प्रेक्षक मोदी सरकार का बचाव करने की उतावली दिखा रहे हैं, उनका तर्क है कि आरबीआई से मिलने वाला यह अतिरिक्त राजस्व सरकार की ‘संचित निधि’ में जाएगा और इसे अलग-अलग प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में खर्च किया जाएगा। उनका दावा है कि सरकार की खर्च करने की सबसे बड़ी प्राथमिकता यही रहेगी कि अधोसरंचना विकास के ज़रिए आर्थिक विकास को बढ़ावा दिया जाएं। इसके अलावा, उनका तर्क है कि पश्चिम एशिया में संकट के कारण अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने से उर्वरक सब्सिडी पर खर्च बहुत ज़्यादा बढ़ सकता है, और इस पैसे का इस्तेमाल उसे संभालने के लिए किया जा सकता है। उनका यह भी दावा है कि अगर ईंधन की कीमतें या महंगाई बहुत ज़्यादा बढ़ती है, तो इस फंड का इस्तेमाल गरीबों को सीधे नगद हस्तांतरण और दूसरी मदद देने के लिए किया जा सकता है। बहरहाल, पुराने अनुभव, तेल की कीमतों में मौजूदा उछाल, ज़रूरी चीज़ों की बढ़ती कीमतें और उसके बाद उत्तर भारत के औद्योगिक इलाकों — जैसे नोएडा, फरीदाबाद और रुद्रपुर — में महंगाई और मज़दूरों के शोषण के खिलाफ़ हुए विरोध-प्रदर्शन साफ तौर पर इन तर्कों की व्यर्थता दिखाते हैं।

रिज़र्व बैंक देश की अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखने के लिए आपातकालीन आकस्मिक आरक्षित निधि जैसे नामों से अपनी आरक्षित निधि बनाता है। केंद्र सरकार अब इसी आरक्षित निधि का इस्तेमाल कर रही है। इस तरह लाखों-करोड़ों रुपये लेने के बावजूद, केंद्र सरकार कारों के बंटवारे के फ़ॉर्मूले में बदलाव करके राज्य सरकारों की मदद करने के लिए कोई योजना नहीं ला रही है। चूंकि रिज़र्व बैंक की आरक्षित निधि देश के सभी नागरिकों की है, इसलिए आरबीआई को आपातकालीन आकस्मिक आरक्षित निधि में बची हुई सही रकम के बारे में सटीक जानकारी देनी चाहिए। इतना ही नहीं, केंद्र सरकार को जनता को यह भी बताना चाहिए कि पिछले कुछ सालों में आरबीआई के अधिशेष आरक्षित निधि से मिले पैसे को कैसे खर्च किया गया है। रिज़र्व बैंक की पूंजीगत आरक्षित निधि संकट के समय देश के लिए सुरक्षा कवच का काम करती है। सुरक्षा बनाए रखने के बजाय रोज़मर्रा के खर्चों के लिए आरक्षित निधि का इस्तेमाल करना सरासर फिजूलखर्ची है। इस ‘फिजूलखर्ची’ के खिलाफ आवाज़ उठनी चाहिए। यह एक नियमित आदत बनती जा रही है और लोगों का ध्यान इस ओर से हट रहा है, जबकि यह देश के वित्तीय क्षेत्र के अस्तित्व के लिए ही खतरा पैदा कर रही है।

संजय पराते
(लेखक बैंक एम्प्लाइज फेडरेशन ऑफ इंडिया — बेफ़ी के अध्यक्ष हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)

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