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खैरागढ़:हबीब तनवीर के प्रसिद्ध नाटक ‘मोर गांव के नाव ससुरार मोर नाव दमाद’ का सफल मंचन।

इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय के नाट्य विभाग की प्रस्तुति ने छत्तीसगढ़ी नाचा शैली की परंपरा को किया जीवंत।

कुलपति प्रो. डॉ. लवली शर्मा ने की शानदार प्रस्तुति की सराहना।

खैरागढ़/छत्तीसगढ़ (रवींद्र पांडेय) 27 सितंबर। इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय में कुलपति प्रो. डॉ. लवली शर्मा के संरक्षण में ‘मोर गांव के नाव ससुरार मोर नाव दमाद’ नाटक का मंचन हुआ। कार्यक्रम की मार्गदर्शक प्रो. मृदुला शुक्ल अधिष्ठाता कला संकाय रहीं। विशेष अतिथि के रूप में प्रभारी कुलसचिव डॉ. सौमित्र तिवारी उपस्थित रहे। नाटक ‘गांव के नाव ससुरार मोर नाव दमाद’ हबीब तनवीर द्वारा निर्देशित एक प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ी नाचा शैली का नाटक है, जिसने 1972 में बहुत वाहवाही लूटी थी। यह नाटक छत्तीसगढ़ की स्वदेशी नाट्य परंपरा से प्रेरित है और इसमें कलाकारों की प्रतिभा का महत्व दिखाया गया है।
इस नाटक की कथा वस्तु की ओर ध्यान दें, तो इसमें एक बूढ़े आदमी की चतुरता और एक लड़की की शादी किस प्रकार सिर्फ पैसों के लालच में किसी भी व्यक्ति से कर दी जाती है, दिखाया गया है। इसमें एक महिला के साथ हुई नाइंसाफी को दिखाया गया है, जो समाज को बहुत बड़ी सीख देती है। इस नाटक के नाटककार हबीब तनवीर हैं, जो भारत के मशहूर नाटककार, नाट्य निर्देशक, कवि और अभिनेता थे। इन्होंने मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ के लोकनाट्य नाचा को पूरी दुनिया में एक नई ऊंचाई प्रदान की है। नाचा के कलाकारों को बड़े से बड़ा मंच प्रदान करवाए हैं, जैसे आगरा बाजार, चरन दास चोर, बहादुर कलारीन।
उक्त नाटक की परिकल्पना एवं निर्देशन नाट्य विभाग के अतिथि व्याख्याता डॉ. प्रमोद कुमार पांडेय एवं डॉ. शिशु कुमार सिंह ने किया। संगीत परिकल्पना अतिथि व्याख्याता डॉ. परमानंद पांडेय की रही। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कुलपति ने कहा कि कम समय में दो अतिथि व्याख्याताओं द्वारा इस शानदार नाटक का आयोजन यह बताता है कि हमारे विश्वविद्यालय में बच्चों को बेहतर शिक्षा मिल रही है। सभी कलाकारों ने अपना पक्ष बेहतर निभाया है। उन्होंने इस नाट्य मंचन के लिए सभी कलाकारों को बधाई दी।
प्रभारी कुलसचिव डॉ. सौमित्र तिवारी ने बेहतर प्रस्तुति के लिए सभी को बधाई दी। प्रो. मृदुला शुक्ल ने आयोजन में उपस्थित एवं प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से नाट्य प्रस्तुति में योगदान के लिए सभी का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि सभी की अपनी-अपनी भूमिका होती है, तभी नाटक सफल हो पाता है। इस दौरान बड़ी संख्या में शिक्षकगण, शोधार्थी एवं विद्यार्थीगण उपस्थित रहे।

कलाकारों का परिचय

इस सफल मंचन को साकार करने वाले कलाकारों में मुख्य रूप से हर्ष गिरी भट्ट (बुढ़वा), चंद्रहास बघेल (बाप), दिशा चतुर्वेदी (मान्ती), रोहन जंघेल (झंगलू), रुपेश तेंदुलकर (मंगलू), अंशु बंगारी (शांति), समीर सोनी (देवार), भैरवी साहू (देवारीन) और अंकित सिंह (लड़का) शामिल रहे। पप्पू कुमार, दीपक साहू, आकाशी मेशराम, रुपाली, सूर्यप्रकाश और रोशन ने कोरस में अपना सहयोग दिया। तकनीकी दल में अनुराग प्रकाश पंडा ने मंच विन्यास और मेकअप का कार्य संभाला, जबकि मंच निर्माण गणेश साहू और अमित पटेल ने किया। प्रकाश विन्यास अमित कुमार पटेल का रहा। संगीत पक्ष में वेद प्रकाश रावटे (तबला), करन कुमार (बैंजो) और विकास गायकवाड (हारमोनियम) ने अपनी जुगलबंदी पेश की। मेकअप में भैरवी साहू ने भी योगदान दिया और कास्ट्यूम की जिम्मेदारी सोनल बागड़े की रही। गायन पक्ष को हर्ष चंद्राकर, सौम्या सोनी, कुमारी सुधा और राधा शर्मा ने अपनी आवाज से समृद्ध किया।

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