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सामाजिक समीकरण को छिन्न-भिन्न कर रहा वर्चस्ववाद का सिद्धांत।

अजय गुप्ता “अज्ञानी”

RKTV NEWS/अजय गुप्ता “अज्ञानी”,17 जून। दुनिया अब वर्चस्ववाद का शिकार हो गयी हैं चाहें आम इंसानी जीवन की बातें हो या बाहुबली राष्ट्र द्वारा कमजोर राष्ट्र पर शोषण नीति। हरेक मज़बूत इंसान व है राष्ट्र अपनी गलत मनसा को ही सही साबित करने के लिए आपनी धूर्तता नीति हो या चापलूस नीति इसे क़रीने से एक दूसरे पर अपने विचार थोपने का सफल असफल प्रयास करता रहता है। जिससे कहीं ना कहीं एक वर्ग कुण्ठित नाराज़ और शत्रु बन रहा हैं। विचार थोपने की चीज नहीं विचार स्वतंत्र है। इसे गंगा जैसा पवित्र व निर्मल होना चाहिए। जो सत्य है अखण्ड है कल्याणकारी हैं। उसे बिना किन्तु परन्तु के आमजन शिरोधार्य कर लेते हैं। मगर अपने निजी विचार को गलत मंशा से सबों पर बलात साम दाम दण्ड भेद से मनवा देना चाहते हैं तो वो स्थायी और दिर्घायु तो नहीं हो सकता है न। अमृत को विष बनाना आसान है मगर विष को अमृत तो नहीं बनाया जा सकता हैं ना। वर्चस्ववाद का सिद्धांत समाजिक समिकरण को छिन्न-भिन्न कर रहा हैं। सचेत और समझदार होना ज़रूरी हैं। वरना प्रकृति के पास तो नवनिर्माण करने की अपनी कला भी है और अपना अधिकार भी। जिसकी बानगी समय-समय पर आमजन के सामने प्रस्तुत तो हो ही रही हैं। महामारी, युद्ध , प्राकृतिक आपदा, दावानल, वडवानल, पहाड़ों का दरकना, बाढ, रेल-विमान दुर्घटनाएं, बादल फटना, अतिवृष्टी,आनावृष्टी, खाद्य संकट ,जल संकट यें सब मानवीय अतिवादिता का ही तो नतीजा हैं। फिर भी मानव अपनी गलती स्वीकारता नहीं करता ना ही कुटिलता छोड़ता हैं। खुद को खुश करने के लिए दूसरे को दुःख देने की कला मानव बखुबी जानता हैं। और दोषी हो कर भी निर्दोष साबित हो जाना भी मानव खूब जानता है। जितना भी बुरा हो रहा है उसकी जिम्मेवारी को मानव ने कभी स्वीकार नहीं किया। हमेशा दूसरे को ही दोष देता रहता है यही तो मानवीय फितरत है। बल (उर्जा) में विकास और विनाश दोनों तरह की क्षमता है बस देखना यही है कि मानव चेतेगा या मनमानी करता रहेगा एक दूसरे को नीचा दिखाता रहेगा और अपने आप को सुपर-मेसी (विशिष्ट) का मसीहा समझता रहेगा। और एक दिन यह हंसता खेलता संसार किसी के वर्चस्व के कारण आग के गोले में बदल जायेगा और धरती पर एक बार फिर वही बचेगा दोषी/निर्दोषी आमजन‌ और बाहुबलियों का बारुदी शव के राख जिस पर शायद फिर कभी जीवन का फूल नहीं खिलें। और धरती और ग्रहों सा सदा-सदा के लिए जीवन रहित हो जाएं।

कौन सुनेगा किसको सुनाऊं।
मानव की बदमाशियां।
मस्तक जो पठार हुआ।
स्पंदित नहीं करती सिसकियां।
चाह में इतना पागल हुआ।
पाप भी अच्छा लगता है।
मानव-पत्थर में संवेदनहीन कौन।
मनुज समझ नहीं पाता है।
आहों से जो निकल रही।
करूण-क्रंदन की लहरिरियां।
मन पीपासा भटक रहा।
पाने लालन की बोरियां।
जल रहा चहुंओर।
घर कहो या राष्ट्र हो।
मानव मन स्पंदित नहीं।
सून दर्दों की लोरियां।
सून दर्दों —–

(लेखक,साहित्यकार , कवि और सामाजिक चिंतक हैं। संपर्क:बाबू बाजार,आरा.8228828371)

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