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देवघर पुस्तकमेला में “साहित्य का स्वरुप” विषय पर संगोष्ठी का आयोजन।

RKTV NEWS/देवघर (झारखंड)25 जनवरी।महाविद्या देवघर द्वारा आयोजित सांस्कृतिक एवं आस्था की ऐतिहासिक नगरी देवघर में विगत 11 जनवरी 2025 से चले आ रहे पुस्तक मेला में समायोजित विभिन्न संगठनों द्वारा कार्यक्रमों की श्रेणी में 19 जनवरी को अखिल भारतीय साहित्य परिषद; बिहार एवं झारखंड के तत्वावधान में इंजीनियर सर एस.पी.सिंह के आतिथ्य में राजकीय शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय, देवघर में “साहित्य का स्वरुप” विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन हुआ!
संगोष्ठी की अध्यक्षता प्रोफेसर डॉक्टर वैद्यनाथ मिश्र/संस्कृत विभागाध्यक्ष (जयप्रकाश विश्वविद्यालय छपरा) ने किया!सरस्वती वंदना के साथ सभा का श्री गणेश हुआ!तदुपरान्त अपने अध्यक्षीय भाषण में श्री वैद्यनाथ मिश्र ने प्रबोधित किया कि साहित्य वैदिक काल में लिखे गए हमारे वेद है जो निश्चित तौर पर लोक मंगल की भावना से भरे हुए संसार के सबसे पुराने साहित्य हैं!
इंजीनियरिंग सर एस.पी.सिंह ने साहित्य में मंगल तत्वों का वर्णन करते हुए कहा कि जब साहित्य में लोक के साथ मंगल शब्द संयुक्त हो जाता है तो वह मनुष्य के साथ-साथ भूमंडल के समस्त निर्जीव तथा संजीव प्राणियों के कल्याण का आकांक्षी बन जाता है साहित्य हमारे जीवन मूल्यों, संस्कृति, संस्कारों इत्यादि सभी लोकमंगल घटकों का एक सच्चा संवाहक, संप्रेषक और परिचायक है !साहित्य में लोकमंगल की भावना का सर्वोच्च स्थान होना चाहिए! परंतु वर्तमान में साहित्य में लोकमंगल की भावना की न्यूनता हो गई है!
डॉक्टर वीरेंद्र कुमार दत्ता/ प्राध्यापक- हिंदी विभाग (आर.एन. ए. आर.महाविद्यालय,समस्तीपुर) ने कहा कि आज अर्थ का युग है!ऑर्थोपार्जन के लिए विज्ञापनों के माध्यम से गलत गलत शब्दों का प्रयोग करके साहित्य के स्वरूप को विकृत किया जा रहा है!
साहित्य में दर्शन का प्रबोधन देते हुए प्रोफेसर डॉक्टर किरण बर्नवाल;
प्राध्यापक दर्शनशास्त्र विभाग (जे.एस. डिग्री कॉलेज मिहिजाम; झारखंड ने कहा कि समाज दर्शन, व्यक्ति दर्शन, राष्ट्र दर्शन इत्यादि साहित्य के केंद्र बिंदु होते है! साहित्य में दर्शन का उद्देश्य तत्वों का विश्लेषण करना होता है !तत्वमीमांसा,ज्ञान- मीमांसा, सौंदर्य इत्यादि ज्ञान प्राप्ति के माध्यम हैं! दर्शन निष्पक्ष बौद्धिक और सर्वांगीण ज्ञान की प्राप्ति का तार्किक प्रयास है! परंतु दर्शण सिर्फ तर्क ही नहीं करता बल्कि यह कालखंड के छिपे रहस्यों को जानता है और बताता भी हैं !
वही विमलेंदु कुमार सिंह ने बताया कि आज का साहित्य फिल्में हैं! साहित्य और फिल्म कला और मनोरंजन जगत के महत्वपूर्ण माध्यम है!सिनेमा और साहित्य समाज की समस्याओं,संवेदनाओं और सांस्कृतिक मूल्यों को प्रतिबिंबित करते मैं! कथानक, संवाद और भाषा के आधार पर चलायमान छवि साहित्य के साथ अच्छा संबंध स्थापित कर लेती हैं!
सभा के संयोजक डाॅ.रवीन्द्र ‘शाहाबादी’/सदस्य-केंद्रीय कार्य समिति/ (अखिल भारतीय साहित्य परिषद)ने बताया कि साहित्य के स्वरूप को वामपंथियों ने सबसे अधिक विकृत किया है !आज मानव समाज और संपूर्ण राष्ट्र उनके साहित्य से चिंतित है !
डॉ जनार्दन सिंह/संपादक; भोजपुरिया अमन, देवरिया(उत्तर प्रदेश) ने कहा कि साहित्य वह अभिव्यक्ति है जो संस्कृति को विस्तारित और प्रसारित करती है !यह वह कला है जो अर्थ तत्व से संयुक्त है!
गीत ,कविता ,कहानी ,उपन्यास , नाटक, संस्मरण इत्यादि के द्वारा साहित्य अपने स्वरूप का रेखांकन करके संसार की सभी विधाओं के विकास की गति और उनके प्रवाह को बताता है !
डॉक्टर भक्ति नाथ झा ने वैदिक काल में साहित्य के स्वरूप का चित्रण करते हुए भोजन मंत्र के विषय में बताया कि भोजन करने से पहले भोजन मंत्र का उच्चारण अत्यंत ही शुभ होता है यह शरीर को हर प्रकार की ऊर्जा से युक्त करता है और भोज्य के सभी दोषों का हरण करता है!
अखिल भारतीय साहित्य परिषद के पीरो/भोजपुर इकाई के अध्यक्ष प्रोफेसर कमल कुमार सिंह/ प्राध्यापक-भोजपुरी विभाग (महात्मा गांधी महाविद्यालय ,लहराबाद/पीरो-भोजपुर; ने भोजपुरी भाषा में अत्यंत ही मार्मिक और साहित्यिक सैनिकों के प्रति एक कविता प्रस्तुत किया तथा सुरेन्द्र सिंह ‘अंशु’/ महामंत्री-अखिल भारतीय साहित्य परिषद;भोजपुर/आरा(बिहार) ने अपनी कविता के माध्यम से साहित्य के संपूर्ण गुणों को अभिव्यक्त किया !अपनी कविता के माध्यम से अंशु कवि ने बताया कि संसार की प्रत्येक वस्तु चाहे वह निर्जीव हो या संजीव प्रत्येक में अपने स्वरूप का चिंतन और स्वयं में प्रत्येक के स्वरूप का चिंतन करना तथा जिससे विश्व मंगल की भावना उदित हो और जो वसुधैव कुटुंबकम के हमारे चिर पुरातन घोष से त्रिलोक को अनुकंपित करें वैसी रचनाएं प्रस्तुत करके हम कलाकारों को चाहिए की हम समाज को उस तरफ अग्रमुख कर सकें जहां सर्वे भवंतु सुखिन: सर्वे भवंतु निरामया—-का मंगल घोष हो!
मंच का संचालन डॉक्टर उमाशंकर साहू/प्राध्यापक- आर.एन. ए. आर. महाविद्यालय,समस्तीपुर तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉक्टर रविंद्र शाहाबादी ने किया राष्ट्रगान के साथ सभा का समापन किया गया।

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