
RKTV NEWS/आरा (भोजपुर)11 मई। डॉ कृष्ण दयाल सिंह के नाटक एवं कहानी संग्रह” अनायास” पर राजेंद्र साहित्य परिषद् शेखपुरा,पटना के महासचिव बलभद्र कल्याण द्वारा प्रशंसा की गई है।
अनायास के बहाने कुछ “खास”
डा० कृष्ण दयाल सिंह की ‘त्रिविधा’ रचनाओं-नाटक, काव्य-एकांकी और कहानी की पुस्तक ‘अनायास’ संभवतः अनायास ही नहीं प्रस्तुत हुई है। समाज की कुछ विसंगतियों और मानव की अनेक दुष्प्रवृत्तियों को उजागार करने के प्रयास में ही यह पुस्तक प्रकाश में आई है। प्रस्तुत पुस्तक में गुलसिताँ, नेतागिरी और नववर्ष (एक संकल्प) तीन एकांकी नाटक तथा पहिल रोपना शीर्षक की एक कहानी के साथ, नियमों से स्वच्छंद छंदों में थैला–पैसा द्वन्द्व (काव्य-एकांकी) भी शामिल है। नाट्य-शास्त्र की कसौटी पर ये लघुनाटक कहाँ तक खरे उतरते हैं, यह नाट्य-समीक्षक बताएँगे। इन नाटकों में दृश्य-संयोजन तथा मंच-व्यवस्था के लिए भी कोई लेखकीय निर्देश नहीं हैं। पात्रों के वक्तव्य काफी लम्बे हैं, जिन्हें स्मरण करना या नेपथ्य से ‘प्रोम्पू’ करना भी संभव नहीं लगता। मेरे विचार से इन्हें कथोपकथन शैली मैं प्रस्तुत कहानी मानकर पढ़ा जा सकता है और लेखक की भावनाओं से अवगत हुआ जा सकता है।
प्रथम रचना गुलसिता में मानव-सेवा को समर्पित चिकित्सा विभाग के निम्नस्तरीय शोषण तथा कुछ दुर्लभ उपकारी व्यक्तियों का चित्रण है। नेतागिरी में डा० सिंह ने अपने विभागीय अनुभव तथा यूनियन बाजी के हथकंडों को बड़े तटस्थ भाव से कल्याणकारी दिशा में मोड़ने का संदेश दिया है।
पुस्तक के लेखक एक संवेदना संपन्न, सृजनशील और सात्विक रूप से अध्यवसायी व्यक्ति हैं। ये राजेन्द्र साहित्य परिषद के आजीवन सदस्य भी हैं। परिषद का उद्देश्य साहित्य का विकास और हिन्दी का प्रचार-प्रसार करना है। किसी रचना में भाव शब्द और भाषा की आवश्यकता होती है। साहित्य के सजग पाठक भावों और शब्दों की कमजोरी को नजर अंदाज कर दे सकते हैं, किंतु भाषागत त्रुटियों से उन्हें बहुत क्षोभ होता है।
डा० कृष्ण दयाल सिंह की यह दूसरी पुस्तक आपके सामने हैं। इनकी प्रथम पुस्तक ‘यत्र-तत्र’ कविता-संग्रह में कुछ भाषागत त्रुटियाँ रह गई हैं। प्रकाशन की शीघ्रता में लेखकीय अधैर्य के चलते पांडुलिपि की दूसरी प्रति, बिना संशोधन के ही प्रेस में दे दी गई। उक्त पुस्तक की छपाई तथा गेट-अप आदि बहुत अच्छा हुआ । विषय की विविधता भी सराही गई। किंतु कुछ भाषागत त्रुटियों के कारण हमें खेद का अनुभव होता है।
प्रस्तुत पुस्तक की पांडुलिपि और प्रुफ के संशोधन पर लेखक ने गंभीरता से ध्यान दिया है। अतः यह अपेक्षा की जाती है कि भाषागत भूलों से यह पुस्तक मुक्त होगी। मैंने डा० कृष्ण दयाल सिंह को परिषद् परिवार का सदस्य और अपना अनुज मानकर ही अपने विचार स्पष्ट रूप में व्यक्त किए हैं। संभवतः इसमें ‘सत्यं व्रयात, प्रियं बुष्यात’ का पालन नहीं हुआ हो। भाई कृष्ण दयाल जी क्षमा करेंगे ।
बलभद्र कल्याण
महासचिव
राजेन्द्र साहित्य परिषद्
शेखपुरा, पटना-८०० ०१४

