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आपातकाल निश्चय ही भारतीय लोकतंत्र पर एक धब्बा था : शिवानंद तिवारी

RKTV NEWS/पटना( बिहार) 26 जून।पूर्व मंत्री और सांसद रहे राजद के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी ने देश में आपातकाल को लेकर भाजपा द्वारा इसे काला दिवस के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर मनाए जाने को लेकर एक राजनीतिक बयान प्रसारित करते हुए लिखा है की आपातकाल निश्चय ही भारतीय लोकतंत्र पर एक धब्बा था. देश की जनता ने कांगरेस पार्टी को इसकी कड़ी सजा दी. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तक को जनता ने माफ़ नहीं किया. 77 के लोकसभा चुनाव में उनको भी पराजित होना पड़ा. लेकिन भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ की आपात काल में क्या भूमिका थी इसको भी ओझल नहीं किया जाना चाहिए.
स्मरण होगा कि जनता से आपातकाल का समर्थन हासिल करने के लिए इंदिरा जी ने 20 सूत्री कार्यक्रम घोषित किया था. आज मोहन भागवत जी संघ प्रमुख हैं . जिन दिनों आपातकाल लगा था उन दिनों बाला साहेब देवरस जी संघ के प्रमुख थे. वे भी मीसा के अंतर्गत नज़रबंद थे. जैसे ही इंदिरा जी ने 20 सूत्री कार्यक्रम की घोषणा की वैसे ही बालासाहब ने श्रीमती गांधी को पत्र लिखा और कहा कि वे बीस सूत्री कार्यक्रम से पूर्णतया सहमत हैं. अगर सरकार संघ पर से प्रतिबंध हटा लेती है और हमारे स्वयं सेवकों को रिहा कर देती है तो हम पूरे मन और निष्ठा से बीस सूत्री के समर्थन में अभियान चलायेंगे.
आपातकाल में जेल से रिहाई के लिए किन लोगों ने सबसे ज़्यादा माफ़ीनामों पर दस्तख़त किया इसकी भी जाँच की जाए तो आज जो लोग आपातकाल की निंदा कर रहे हैं उनकी क़लई उतर जाएगी.
भारतीय संविधान में आपातकाल लगाने की व्यवस्था है. उसका दुरुपयोग किया गया. लेकिन अभी क्या हो रहा था! देश में तनाव और भय का वातावरण बना हुआ था. जैसे फ़िल्मी बॉस अपने प्रतिद्वंद्वी को धमकाने और उसके मन में भय पैदा करने के लिए अपने गुर्गों को भेजता था उसी अंदाज़ा में इडी, सीबीआई और इनकम टैक्स वालों को भेजा जा रहा था. एक समुदाय विशेष के विरूद्ध प्रधानमंत्री सहित अन्य द्वारा नफ़रत फैलाया जा रहा था. अबकी बार चार सौ पार! किसलिए ! ताकि संविधान को बदल कर इस देश को हिंदू राष्ट्र बनाया जा सके. सोलकन सब सहक गया है. इनको रास्ते पर लाने के लिए मनुस्मृति लागू करना ज़रूरी है. आज से पचास वर्ष पूर्व लगाये गये इमरजेंसी के विरूद्ध प्रधानमंत्री जी के इशारे पर भाजपाई सांसद नारा लगाते उपहास के पात्र नज़र आ रहे थे ।
लेकिन देश के मतदाताओं ने इनके सपने को चूरचूर कर दिया. हमारे अवतारी प्रधानमंत्री जी का सुर दो दिन में ही बदल गया. वाराणसी हारते हारते जीते. इसके लिए देश के करोड़ों गरीब गुरबा दलित, आदिवासी, पिछड़े और महिला बधाई के पात्र हैं।

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