
भोपाल/मध्यप्रदेश(उषा सक्सेना) 22 जून।रहस्यवादी कवि संत कबीदास जी का जन्म ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा के दिन ब्राह्म मुहूर्त में लहर तारा तालाब में कमल पर हुआ था ।नीरू और नीमा जुलाहा जो किउस समय वहां स्नान करने गये थे उन्हें उठाकर ले आये ।वह नि:संतान थे अत:बड़े ही लाड़ प्यार से उनका लालन पालन हुआ । उनके अनुयायियों के अनुसार यह उनका समाज में समनवय स्थापित करने के लिये प्राकट्य था ।दूसरी कथा के अनुसार कबनारस की ही एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से उनका जन्म हुआ था जिसे वह त्याग कर गंगा के तट पर छोड़ आई थी ।वह उस समय स्नान करने गये नीरू और नीमा जुलाहा। दम्पत्ति को गंगा के तट पर सीढ़ियों मे पड़े मिले ।जिसे उठाकर वह अपने घर ले आये और बड़े प्यार से उनका पालन पोषण किया । एक जुलाहे के घर में उनकी संतान के रूप में पल कर उन्होंने उसी व्यवसाय को अपना कर उसीसे जीवन निर्वाह किया।
कबीरदास जी भक्तिकाल में बह रही निर्गुण धारा के रहस्यवादी कवि थे । उनकी रचनायें सिक्खों के आदि धर्म में भी पाई जाती हैं ।वह ईश्वर को एक सर्वोच्च सत्ता के रूप में मानकर उस पर विश्वास करते थे ।समाज में फैली हुई कुरीतियों , कर्मकांड और अंधविश्वास की निंदा करते हुये उनपर तीखा प्रहार किया । इस तरह सामाजिक बुराईयों की निंदा करते हुवे एक स्वस्थ समाज की स्थापना ही उनका मूल उद्देश्य था । वह एक अक्खड़ कवि थे जो सत्य कहने से नहीं चूकते। इसीलिए हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही धर्म वाले उनके अनुयायी हुये जिन्होंने कबीर पंथ को जन्म दिया ।श्रीरामानंद जी को उन्होंने अपना गुरू बनाया । रामानंद जी छोटी जाति वालों को दीक्षा नहीं देते थे । कबीरदा, जी अपनी धुन के पक्के।चाहे कैसे भी हो वह उनसे गुरूदीक्षा लेकर ही रहेंगे । इसके लिये वह रामानंद जी के गंगा स्नान के पहले ही उस घाट की सीढ़ियों पर ढाई साल का बच्चा बन कर लेट गये ।जब रामानंद जी का पैर उन पर पड़ा तो वह रोने लगे ।तब रामानंद जीने उनके रोने की आवाज सुनकर उन्हें अपने हाथों से ऊपर उठाया और अपना शिष्य बनाकर राम निम जपने को कहा । कहते हैं कि इस घटना के बाद रामानंद जी ने छोटी जातियों को भी उनसेनफरत करना छोड़कर उन्हें सम्मान दिया ।
कबीरदास जी की भाषा पचमेली सधुक्कड़ी भाषा है जिसमें राजस्थानी,हरियाणवी,पंजाबी ब्रजभाषा,अवधी और खड़ी बोली के शब्द पाये जाते हैं । इनके दोहों में और सबद में ब्रजभाषा की अधिकता है ।
कबीर साखी इनका सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ है जिसमें आत्मा और परमात्मा के विषय में बतलाया गया है।कबीर बीजक उनकी वाणी का संग्रह है ।
कबीर दोहावली में उनके दोहा सम्मिलित हैं ।
कबीर ग्रंथावली में दोहा और पद हैं ।इसके अतिरिक्त कबीर सागर सूक्ष्म वेद है जिसमें परमात्मा के विषय में विस्तृत ज्ञान है ।कुछ प्रसिद्ध दोहे:-
कांकर पाथर जोड़ के मस्जिद दई चिनाय।
ता चढ़ मुल्ला बाँग दे क्या बहरा हुआ खुदा ।।
पाथर पूजैं हरि मिलैं तो मैं पूजूं पहाड़।
तासें तो चक्की भली पीस खाय संसार ।।
बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर
पंछी को छाया नहीं ,फल लागे अति दूर।।
जाति न पूंछो साधु की पूंछ लीजिये ज्ञान।
मोल करो तलवार को पड़ी रहन दो म्यान।।
इस तरह सभी को ज्ञान देते उनके दोहेआज भी समाज में प्रचलित हैं।
