आरा/भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)14 मई । सोमवार को श्री आदिशंकराचार्य भगवत्पाद की 2531 वीं जयंती के अवसर पर श्रीसनातन शक्तिपीठ संस्थानम् तथा सनातन-सुरसरि सेवा न्यास के संयुक्त तत्त्वावधान में फ्रेंड्स कॉलोनी कार्यालय पर पूजन-अर्चन और संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए आचार्य डॉ भारतभूषण पाण्डेय ने कहा कि जब पूरा विश्व नास्तिकता और अवैदिकता की चपेट में आकर दुःख भोगने लगा तब शिवावतार भगवान आदि शंकराचार्य का प्राकट्य हुआ था। उन्होंने मात्र बत्तीस वर्ष की अल्पायु में आर्यावर्त की यात्रा, सशक्त संगठन, भाष्य एवं स्तोत्र ग्रंथों का प्रणयन, शास्त्रों का प्रचार तथा अनेक पंथों का शोधन व समन्वयन कर साम्राज्यसेवित नास्तिक मत का उच्छेद कर दिया। आज विश्व में जो भी वैदिक चमत्कृति है और हमारा देश भारतवर्ष सशक्त राष्ट्र के रूप में खड़ा है,इसका सारा श्रेय भगवान आदि शंकराचार्य को ही जाता है। आचार्य ने कहा कि संपूर्ण वैदिक दर्शन को सत्यसहिष्णुता की क्रमिक अभिव्यक्ति के रूप में ढ़ाल कर नास्तिक और अवैदिक के भी क्रम से भगवत्प्रबोध का उन्होंने मार्ग प्रशस्त किया। मुख्य-वक्ता प्रो बलिराज ठाकुर ने कहा कि श्रीशंकराचार्य ने चारों दिशाओं में चार पीठ और चार आचार्यों के संरक्षण में धर्म, संस्कृति और समाज को व्यवस्थित तथा राजगद्दी को अनुशासित कर उसे सर्वहितकारी बनाया। प्रो ठाकुर और डॉ सत्यनारायण उपाध्याय ने श्री शंकराचार्य तथा सूरदास की जयंती पर विशेष प्रकाश डालते हुए कहा कि आचार्य शंकर से सूरदास तक कृष्ण भक्ति की दिव्य सरिता प्रवाहित हुई है।इनकी रचनाओं में दर्शन से भक्ति तक की यात्रा सहज संपन्न हो जाती है। शिवदास सिंह ने कहा कि शंकराचार्य का ऋणी रहकर ही देश और संस्कृति की रक्षा हो सकती है। इस अवसर पर शास्त्रीय गायक राकेश मिश्र ने शंकराचार्य रचित निर्वाणाष्टकम् तथा सूरदास जी द्वारा रचित श्रीकृष्ण लीला के पदों को प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ सत्यनारायण उपाध्याय और धन्यवाद ज्ञापन सचिव सत्येन्द्र नारायण सिंह ने किया।

