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जग रुलाता है मां हंसाती है !

कवि सिद्धनाथ शर्मा ” सिद्ध”(वाराणसी)

जग रुलाता है मां हंसाती है !

तन्हाई में याद कभी जब आती है ।
तस्वीरों से बात मेरी हो जाती है ।।

मोबाइल का आज जमाना है आया ।
तस्वीरें हैं पास नहीं अब पाती है ।।

वो करती मिस काल अंधेरी रातों में ।
उठते -उठते मोबाइल कट जाती है ।।

खुशियों की परवाह मुझे कैसे होगी ।
ग़म आयी है हाथ हमारी थाती है ।।

हो जाती है भेंट कभी जब मेले में ।
होठों से आंचल दाबे शरमाती है ।।

करती थी मां प्यार कभी बाबू जी से ।
मां मेरी अनहोनी से घबराती है ।।

होता जब मायूस सुनाती मां किस्से ।
खुद रोती मां लेकिन हमें हंसाती है ।।

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