
कोयल हुई मौन..!
कोयल हुई मौन,
बगुला हुआ वाचाल।
बृक्ष सब कट गए,
कौआ धरे आकाश।
घास-फूस तप जल मरा।
ताड़-खजूर मही इतरात।
विद्वान भयो अनोही,
मुरखन जात पुजात।
ईमानदारी सब ख़ार भयो,
भयो बेईमानन के जमात।
सौ दरवाजा खिड़की घर में,
पर्दा सब उड़ियात।
लाज-शरम सब छाड़ी के,
इज्जत की बड़की बात।
बिचार शून्यता गहना लागे,
बिचारवान शोक बुझात।
शोर सराबा सब जगह,
लोभ क्लेश के जड़।
आन लागयो आपनो,
आपन गैर बुझात।
मीन सरीखा जग मुआ,
बगुला भगत बुझात।
प्रेम सरोवर सूख चला,
मीन की उल्टी चाल।
कहे निगुरा बात है सीधी,
कौआ बैठा आमिआ ड़ार।
कोयल बैठे ताड़-खजूर,
फूदक-फूदक इतरात।
बात है की बातें कुछ ऐसी,
झूठ के मुहें बिहसत पान।
सच जे सगरी पनही खाए,
सुबकत-सुबकत जाए प्राण।
सुबकत-सुबकत———।

